Love Story: सफर में मिला हमसफर, 2 घंटे लेट थी बनारस की ट्रेन, दिवाली की रात शुरू हुई प्यार की कहानी

Love Story: सफर में मिला हमसफर, 2 घंटे लेट थी बनारस की ट्रेन, दिवाली की रात शुरू हुई प्यार की कहानी


Love Story: हर रात हम आपके लिए लेकर आते हैं एक नई लव स्टोरी, जिसमें प्यार की मिठास है, रिश्तों की अहमियत है और जिंदगी को देखने का एक नया नजरिया भी. कभी एक छोटी-सी गलतफहमी दो लोगों को दूर कर देती है, तो कभी किसी अजनबी की एक अच्छी बात दिल में खास जगह बना लेती है. हमारी आज की कहानी भी ऐसे ही दो लोगों की है, जिनकी मुलाकात दिवाली की रात एक लेट चल रही ट्रेन में होती है.

अदिति अपने घर वाराणसी जा रही है और साहिल अपने सफर पर है. दोनों के बीच शुरू हुई एक छोटी-सी बातचीत कब भरोसे और खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत बन जाती है, यही इस कहानी का दिलचस्प मोड़ है.

सफर में मिला हमसफर

दिवाली में अब बस एक दिन बाकी था. दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर लोगों की भीड़ थी. कोई हाथों में मिठाई के डिब्बे लिए घर जाने की जल्दी में था, तो कोई अपने परिवार के आने का इंतजार कर रहा था. इसी भीड़ में अदिति भी बैठी अपनी ट्रेन का इंतजार कर रही थी.

वाराणसी की रहने वाली अदिति एक प्राइवेट कंपनी में काम करती थी. ऑफिस की छुट्टियां मिलते ही उसने घर जाने का टिकट बुक कर लिया था. लेकिन उसकी ट्रेन करीब दो घंटे लेट थी और अब रात के 12 बजे दिल्ली पहुंचने वाली थी. अकेले सफर करने की वजह से वह पहले ही थोड़ी असहज थी. ऊपर से इतनी रात में स्टेशन पर इंतजार करना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था.

तभी उसके फोन पर मां का मैसेज आया, ‘बेटा, ट्रेन में बैठते ही बता देना. और स्टेशन पहुंचकर भी फोन करना.’

अदिति ने जवाब दिया, ‘हां मां, आप चिंता मत करना.’

कुछ देर बाद ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी. अदिति ने अपना बैग संभाला और कोच में चढ़ गई. अपनी सीट ढूंढते हुए वह थोड़ी उलझन में पड़ गई, क्योंकि सामने वाली सीट पर एक लड़का बैठा था, जिसका टिकट भी उसी सीट के आसपास का था.

‘एक्सक्यूज मी, ये सीट 32 है?’ अदिति ने पूछा.

लड़के ने टिकट देखकर कहा, ‘हां, आपकी सीट ऊपर वाली है. आप अदिति हैं न? मैं साहिल. लगता है इस सफर में हम सीट के पड़ोसी हैं.’

अदिति हल्का-सा मुस्कुराई और अपना सामान रखने लगी.

ट्रेन चल पड़ी. खिड़की के बाहर दिल्ली की रोशनी धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी. कुछ देर तक दोनों चुप रहे. फिर साहिल ने पूछा, ‘आप भी दिवाली पर घर जा रही हैं?’

‘हां, वाराणसी. आप?’

‘मेरा घर भी वाराणसी में है. नौकरी नोएडा में करता हूं. इस बार सोचा कि दिवाली घरवालों के साथ ही मनाऊंगा.’

यह सुनकर अदिति हंस पड़ी. ‘मतलब इतने दिनों से एक ही शहर में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुई और अब घर जाते हुए एक ही ट्रेन में मिल गए.’

‘शायद कुछ मुलाकातों का समय पहले से तय होता है,’ साहिल ने मुस्कुराकर कहा.

बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो पता ही नहीं चला कि कब रात गहरी हो गई. दोनों ने अपनी नौकरी, घर की यादों और दिवाली की तैयारियों के बारे में बातें कीं. साहिल की एक बात अदिति को खास लगी. वह बार-बार अपने छोटे भाई का जिक्र कर रहा था, जिसके लिए उसने रास्ते में ही एक वीडियो गेम खरीदने की योजना बना रखी थी.

‘तुम्हें अपने घरवालों की बहुत फिक्र रहती है,’ अदिति ने कहा.

साहिल ने जवाब दिया, ‘घर से दूर रहने पर समझ आता है कि त्योहार सिर्फ छुट्टी का नाम नहीं हैं. ये वो मौके हैं जब हम अपने लोगों के पास लौटते हैं.’

अदिति को अपनी मां की याद आ गई. वह हर साल दिवाली पर उसके पसंदीदा काजू कतली के डिब्बे का इंतजार करती थीं. दोनों की बातें अब सहज हो चुकी थीं. सफर की शुरुआत में जो अजनबीपन था, उसकी जगह एक अच्छा-सा भरोसा आ गया था.

सुबह होने से पहले ट्रेन वाराणसी पहुंच गई. प्लेटफॉर्म पर उतरते ही अदिति ने अपने पिता को फोन किया. वे स्टेशन के बाहर उसका इंतजार कर रहे थे. साहिल ने उसका बैग नीचे उतारने में मदद की और पूछा, ‘घर तक लेने कोई आया है न? इतनी सुबह अकेले निकलने की जरूरत नहीं है.’

‘हां, पापा बाहर हैं,’ अदिति ने कहा.

साहिल ने उसे बाहर तक पहुंचाया. अदिति के पिता को देखकर वह थोड़ा पीछे हट गया, ताकि वे आराम से उससे मिल सकें. जाने से पहले अदिति ने कहा, ‘तुमसे मिलकर अच्छा लगा. सफर इतना लंबा था, लेकिन पता ही नहीं चला.’

साहिल मुस्कुराया, ‘मुझे भी. और हां, घर पहुंचकर अपनी मां को बता देना कि तुम ठीक से पहुंच गई हो.’

अदिति घर पहुंची तो दिवाली की तैयारियों के बीच भी उसके मन में उस सफर की बातें घूम रही थीं. उसने साहिल को मैसेज किया, ‘घर पहुंच गई. मां ने कहा है कि तुम्हें भी दिवाली की शुभकामनाएं दूं.’

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

साहिल का जवाब आया, ‘उन्हें मेरी तरफ से भी शुभकामनाएं. और अगर तुम्हें ठीक लगे, तो कभी कॉफी पर मिल सकते हैं. इस बार ट्रेन की टाइमिंग का इंतजार नहीं करना पड़ेगा.’

अदिति मुस्कुराई. उसने लिखा, ‘बिल्कुल. लेकिन अगली बार ट्रेन लेट होने का बहाना नहीं चलेगा.’

दिवाली के बाद दोनों मिले. बातचीत फिर शुरू हुई, इस बार बिना ट्रेन के शोर और स्टेशन की भीड़ के. धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होने लगी. साहिल को अदिति की साफगोई पसंद थी और अदिति को साहिल का जिम्मेदार स्वभाव.

कुछ महीनों बाद, जब साहिल ने अदिति से अपने रिश्ते को एक नाम देने की बात कही, तो अदिति ने मुस्कुराकर कहा, ‘तुम्हें पता है, उस रात मैं सिर्फ घर पहुंचने की सोच रही थी. मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि रास्ते में कोई ऐसा भी मिल सकता है, जिसके साथ आगे का सफर तय करने का मन करेगा.’

साहिल ने जवाब दिया, ‘शायद हमसफर वही होता है, जिसके साथ मंजिल से ज्यादा रास्ता अच्छा लगने लगे.’

अदिति ने उसका हाथ थामने के बजाय बस मुस्कुराकर हामी भर दी. उसे यकीन हो गया था कि यह रिश्ता किसी फिल्मी इत्तेफाक से ज्यादा है. यह दो ऐसे लोगों की शुरुआत थी, जिन्होंने एक-दूसरे को वक्त दिया, भरोसा किया और छोटी-छोटी बातों में एक-दूसरे की अहमियत समझी.

कहानी से सीख

कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत मुलाकातें तब होती हैं, जब हम उनकी उम्मीद भी नहीं कर रहे होते. लेकिन किसी अजनबी को अपना हमसफर बनाने के लिए सिर्फ एक मुलाकात काफी नहीं होती. भरोसा, सम्मान, बातचीत और एक-दूसरे को समझने की कोशिश ही किसी रिश्ते को खूबसूरत बनाती है.



Source link