Kishangarh Ka Mela: 210 गांव, बालाजी की परिक्रमा और लहरिया बांधने की परंपरा, जानें किशनगढ़ के ऐतिहासिक मेले की पूरी कहानी

Kishangarh Ka Mela: 210 गांव, बालाजी की परिक्रमा और लहरिया बांधने की परंपरा, जानें किशनगढ़ के ऐतिहासिक मेले की पूरी कहानी


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बालाजी की परिक्रमा, लहरिया बांधने की परंपरा; किशनगढ़ के ऐतिहासिक मेले की कहानी

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Kishangarh Ka Mela : अजमेर के किशनगढ़ में 125 साल पुराना बालाजी मंदिर है. मान्यता है कि प्रथम विश्व युद्ध में जाने से पहले महाराजा मदन सिंह ने यहां मन्नत मांगी थी, जिसके पूरा होने पर उन्होंने हर साल मेले की परंपरा शुरू की. परिक्रमा पूरी करने के बाद श्रद्धालु बालाजी महाराज के नाम का लहरिया बंधवाते थे. यह परंपरा मेले की पहचान बन गई.

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अजमेर. अजमेर जिले के किशनगढ़ के मुख्य बाजार में बालाजी का 125 वर्ष पुराना मंदिर मौजूद है. यह मंदिर अपनी मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है. बताया जाता है कि यहां किशनगढ़ के महाराजा मदन सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध में जाने से पहले धोक लगाई थी और मन्नत मांगी थी कि अगर वह युद्ध जीतकर लौट आएंगे, तो यहां भव्य मेले का आयोजन शुरू करवाएंगे. जब वह जीतकर लौटे, तो उसी दिन से यहां हर वर्ष मेले का आयोजन किया जाने लगा, जो आज तक जारी है.

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि महाराजा मदन सिंह के समय बालाजी महाराज का स्थान एक चबूतरे के रूप में था. बताया जाता है कि प्रथम विश्व युद्ध में जाने से पहले महाराजा ने यहीं बालाजी महाराज के समक्ष युद्ध जीतकर लौटने और मेले की परंपरा शुरू करवाने का संकल्प लिया था. जब महाराजा युद्ध में विजय प्राप्त कर लौटे, तो उन्होंने किशनगढ़ उपखंड के 210 गांवों तक मेले का संदेश पहुंचाने के लिए आदेश जारी करवाया. इसके बाद भादवा सुदी तेरस पर मेले का आयोजन शुरू हुआ, जो आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ जारी है.

210 गांवों के लोग लहरिया लेकर पहुंचते थे
पुजारी आगे बताते हैं कि पहले मेले में किशनगढ़ उपखंड के 210 गांवों से लोग लहरिया लेकर बालाजी महाराज के दर्शन करने पहुंचते थे. उस दौर में मेले का प्रमुख आकर्षण बालाजी महाराज की परिक्रमा और शक्ति परीक्षण हुआ करता था. विभिन्न गांवों के लोग परिक्रमा में हिस्सा लेते थे और जो दल पहले विजय प्राप्त कर लौटता, उसे आगे स्थान मिलता था. इसके बाद दूसरे गांवों के लोग क्रम से शामिल होते थे.

महाराज के नाम का लहरिया बंधवाते हैं भक्त
पुजारी बताते हैं कि उस समय प्रेम, भाईचारे और शारीरिक ताकत को विशेष महत्व दिया जाता था. परिक्रमा पूरी करने के बाद श्रद्धालु बालाजी महाराज के नाम का लहरिया बंधवाते थे. यह परंपरा मेले की पहचान बन गई. समय के साथ आयोजन की व्यवस्था में बदलाव आया, लेकिन लहरिया बांधने की परंपरा आज भी ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाती है.

महाराजा के दरबार से एसडीएम तक पहुंची परंपरा
पुजारी आगे बताते हैं कि पहले किशनगढ़ के महाराजा के दरबार की ओर से श्रद्धालुओं को लहरिया बांधा जाता था. समय के साथ यह जिम्मेदारी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ गई. अब किशनगढ़ के उपखंड अधिकारी, जिन्हें क्षेत्र का प्रथम नागरिक भी कहा जाता है, इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं. पुजारी बताते हैं कि उनके परिवार की छठी पीढ़ी मंदिर में सेवा कर रही है. परिवार में गोविंद दास, जौहरी दास, मोती दास, भेरू दास, बनवारी लाल और उसके बाद बृजेश कुमार तक सेवा की यह परंपरा चली आ रही है.



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