रांची के डॉ. अशोक कुमार के पास अनुभव की लंबी पूंजी है, लेकिन क्लासरूम में वह खुद को एक सामान्य विद्यार्थी ही मानते हैं. उनकी यह वापसी केवल डिग्री हासिल करने की कहानी नहीं, बल्कि जिंदगी के हर पड़ाव पर सीखते रहने के जज्बे की मिसाल है. डॉ अशोक कुमार बताते हैं कि वह रोज क्लास अटेंड करते हैं. वे कहते हैं, मेरे पास सारी सुविधाएं हैं, फिर भी मैं सामान्य छात्र की तरह कॉलेज आता हूं. अगले 2 साल तक मैं इस कॉलेज का विद्यार्थी हूं, यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी है कि मैं यहां पूर्व अधिकारी की तरह नहीं, एक छात्र की तरह पहुंचूं.
बता दें कि 68 वर्ष के डॉ अशोक कुमार ने कोल इंडिया के जीएम, प्राइवेट कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर तक की नौकरी की, 4 लाख की सैलरी वाली नौकरी को ठोकर मारी और फिर रांची विश्वविद्यालय के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट में PG में एडमिशन ले लिया. आज वह आम युवाओं के साथ बेंच पर बैठकर क्लास करते हैं. डॉ. अशोक कुमार कहते हैं कि कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों को बेहतर तरीके से लाभान्वित कर कैसे काम कराया जाए, उनका मनोबल कैसे बढ़ाया जाए, इसी को गहराई से समझना था. इसलिए उन्होंने साइकोलॉजी सब्जेक्ट चुना है.
कोल इंडिया के पूर्व जीएम, अब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी
डॉ. अशोक कुमार की कहानी किसी सामान्य विद्यार्थी की तरह नहीं है. उन्होंने अपने करियर में कोल इंडिया में जनरल मैनेजर से लेकर एक बड़ी निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर तक की जिम्मेदारी निभाई. नौकरी के दौरान उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया और अपने अनुभव से संस्थानों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया. लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी उनका सीखने का क्रम नहीं रुका. वर्ष 2025 में निजी कंपनी की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया. इसी वर्ष उन्होंने रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर यानी पीजी में नामांकन लिया. आज वह आम विद्यार्थियों की तरह कॉलेज आते हैं, क्लास में बैठते हैं और हर दिन पढ़ाई करते हैं. वे कहते हैं कि उनके लिए यह केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि खुद को और बेहतर बनाने का एक अवसर है.
चार लाख की नौकरी छोड़कर पढ़ाई क्यों चुनी?
डॉ. अशोक कुमार बताते हैं कि नौकरी के दौरान उन्हें कर्मचारियों के साथ काम करने का लंबा अनुभव मिला. वह समझना चाहते थे कि किसी संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों को बेहतर तरीके से कैसे समझा जाए और उनसे किस तरह बेहतर काम लिया जा सकता है. इसी उद्देश्य से उन्होंने मनोविज्ञान विषय को चुना. उनका मानना है कि कर्मचारियों के व्यवहार, उनकी मानसिक स्थिति और उनकी कार्यक्षमता को समझना किसी भी संस्थान के लिए बेहद जरूरी है. डॉ. अशोक कहते हैं कि उनके पास तमाम सुविधाएं हैं, लेकिन जब वह कॉलेज आते हैं तो खुद को किसी पूर्व अधिकारी के रूप में नहीं देखते. वह अगले दो वर्षों तक इस कॉलेज के विद्यार्थी हैं और उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि वह एक विद्यार्थी की तरह ही यहां आएं और पढ़ाई करें. उनके लिए चार लाख रुपये की नौकरी छोड़ना किसी नुकसान का फैसला नहीं था. यह उस इच्छा को पूरा करने का रास्ता था, जो लंबे समय से उनके मन में थी.
खगड़िया से कोल इंडिया के जीएम तक का सफर
डॉ. अशोक कुमार मूल रूप से बिहार के खगड़िया के रहने वाले हैं. वर्ष 1975 में उन्होंने बिहार से मैट्रिक की परीक्षा पास की. इसके बाद 1977 में रांची के साइंस कॉलेज से इंटर की पढ़ाई पूरी की. उन्होंने साइंस कॉलेज में फिजिक्स ऑनर्स में दाखिला लिया, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं की. इसके बाद एनआईटी में दाखिला लिया और इंजीनियरिंग की राह पकड़ी. उन्होंने आईईएस की लिखित परीक्षा भी पास की. वर्ष 1985 में उन्होंने सीएमपीडीआई ज्वाइन किया. इसके बाद मेघालय में रीजनल स्टडीज, रांची मुख्यालय और महानदी कोलफील्ड्स में काम किया. महानदी कोलफील्ड्स में वह डिप्टी जीएम बने और आगे चलकर जनरल मैनेजर के पद तक पहुंचे. वर्ष 2018 में कोल इंडिया से रिटायर होने के बाद भी उनका करियर नहीं रुका. इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने की इच्छा थी और उन्हें केआईटीएस से ऑफर भी मिला. इसी बीच निजी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर नौकरी मिली. आगे चलकर वह सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एडवाइजर भी बने. वर्ष 2025 में उन्होंने इस नौकरी को भी छोड़ दिया.
परिवार का साथ, पत्नी भी करना चाहती थीं पीजी
डॉ. अशोक कुमार बताते हैं कि उनकी पढ़ाई में परिवार का पूरा सहयोग है. उनके दोनों बेटे विदेश में रहते हैं. उन्होंने भी पिता को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया. उनकी पत्नी भी उनके साथ पीजी करना चाहती थीं, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वह दाखिला नहीं ले सकीं. ऐसे में डॉ. अशोक को अकेले ही क्लास में आना पड़ता है. पिछले एक वर्ष से नौकरी नहीं होने के बावजूद वह अपनी पेंशन से पढ़ाई और घर का खर्च चला रहे हैं. उनका कहना है कि पेंशन उनके लिए पर्याप्त है और पढ़ाई के लिए उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हो रही है. कॉलेज में उनके सहपाठी भी उनकी मदद करते हैं. शुरुआती दिनों में जॉय नाम के विद्यार्थी ने उन्हें पढ़ाई समझने और कॉलेज के माहौल में ढलने में काफी सहयोग किया. अब सभी विद्यार्थी साथ मिलकर पढ़ाई करते हैं.
विभागाध्यक्ष बोले, पढ़ने की कोई उम्र नहीं
रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज हसन भी डॉ. अशोक कुमार के इस फैसले को प्रेरणादायक मानते हैं. उनका कहना है कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती. नई शिक्षा नीति की विशेषता भी यही है कि कोई व्यक्ति किसी भी उम्र में पढ़ाई कर सकता है. इस उम्र में दाखिला लेने वाले लोग सामान्य तौर पर नौकरी के लिए नहीं, बल्कि अपनी रुचि और शौक को पूरा करने के लिए आते हैं. उन्होंने बताया कि मनोविज्ञान विभाग की प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है. इससे पहले भी विभाग में रिटायर्ड कर्नल और कार्यरत कर्नल जैसे लोग दाखिला ले चुके हैं.
अनुभव की पूंजी के साथ नई शुरुआत
डॉ. अशोक कुमार की कहानी यह बताती है कि जिंदगी में किसी मुकाम पर पहुंचने के बाद सीखने की प्रक्रिया खत्म नहीं होती. एक ओर उन्होंने कोल इंडिया में बड़े पदों पर काम किया, दूसरी ओर अब वह कॉलेज की कक्षाओं में बैठकर नई चीजें सीख रहे हैं. उनके लिए पढ़ाई केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि अपने अनुभव को और बेहतर बनाने का जरिया है. 68 साल की उम्र में उनकी यह पहल उन लोगों के लिए भी संदेश है, जो किसी कारण से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके या जिंदगी की व्यस्तताओं में अपने सपनों को पीछे छोड़ आए. डॉ. अशोक कुमार की कहानी कहती है कि अगर मन में सीखने की इच्छा हो तो उम्र, पद और जिम्मेदारियां किसी नई शुरुआत के रास्ते में बाधा नहीं बनतीं.