Doosra Movie Review: एक अधूरा सिनेमाई प्रयोग है ‘दूसरा’, फिल्म में कहां रह गई सबसे बड़ी चूक?

Doosra Movie Review: एक अधूरा सिनेमाई प्रयोग है ‘दूसरा’, फिल्म में कहां रह गई सबसे बड़ी चूक?


नई दिल्ली. अभिनय देव के डायरेक्शन में बनी ‘दूसरा’ एक अलग और बोल्ड सिनेमाई एक्सपेरिमेंट है. यह फिल्म 1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत के भारत को दो मुख्य बातों से दिखाती है- इंडियन क्रिकेट टीम का ऐतिहासिक बदलाव और राजस्थान के एक छोटे से गांव में रहने वाली एक युवा लड़की तारा का सामाजिक संघर्ष. डॉक्यू-फिक्शन फॉर्मेट का इस्तेमाल करते हुए यह फिल्म देश के आत्मविश्वास और महिला सशक्तिकरण को एक साथ जोड़ने की कोशिश करती है, लेकिन अपनी गहरी सोच के बावजूद यह दर्शकों को पूरी तरह से बांध नहीं पाती है.

कहानी
फिल्म ‘दूसरा’ 1990 के दशक के आर्थिक और सामाजिक माहौल पर आधारित है, जब भारत में लिबरलाइजेशन, राजनीतिक उथल-पुथल और मैच-फिक्सिंग हो रही थी. कहानी तारा (प्लंबिता बोरठाकुर) पर केंद्रित है, जो एक पारंपरिक राजस्थानी परिवार की बेटी है. उसका परिवार पुरुष प्रधान सोच में बहुत डूबा हुआ है. उसके पिता (अंकुर विकल) और भाई उसे किसी भी तरह की आजादी नहीं देते. उसे अपनी पढ़ाई छोड़कर घर के काम करने और पुरुषों की सेवा करने के लिए मजबूर किया जाता है. साथ ही, फिल्म उस समय के भारतीय क्रिकेट के माहौल को भी दिखाती है. 2002 में लॉर्ड्स में हुई नेटवेस्ट ट्रॉफी में सौरव गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम की ऐतिहासिक जीत, जिसे भारतीय क्रिकेट की ‘गुलाम मानसिकता से आजादी’ का प्रतीक माना जाता है, कहानी का दूसरा अहम हिस्सा है. फिल्म इन दो धागों को जोड़ने की कोशिश करती है. एक तरफ इंडियन क्रिकेट टीम पुरानी कॉलोनियल सोच को तोड़कर जीतती है, जबकि दूसरी तरफ तारा अपने घर की सोशल और जेंडर की रुकावटों को तोड़कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती है. हालांकि, यह आइडियोलॉजिकल कनेक्शन, कागज पर गहरा और जबरदस्त होने के बावजूद स्क्रीन पर उतना आसान नहीं लगता.

एक्टिंग
कास्ट की परफॉर्मेंस काफी हद तक ऑथेंटिक है, जो फिल्म के डॉक्यू-ड्रामा फ्लेवर को बनाए रखने में मदद करती है.

प्लाबिता बोरठाकुर: तारा के लीड कैरेक्टर के तौर पर प्लाबिता ने बहुत ही नेचुरल और इंप्रेसिव परफॉर्मेंस दी है. वह अपनी आंखों और चेहरे के एक्सप्रेशन से ऐसी लड़की की मुश्किल, डर और अंदर के विद्रोह को बड़ी सेंसिटिविटी से दिखाती हैं. उनका कैरेक्टर ऑडियंस से कनेक्ट करता है.

अंकुर विकल: तारा के कंजर्वेटिव और सख्त पिता के तौर पर अंकुर विकल ने शानदार काम किया है. उनके डायलॉग और बिहेवियर में साफ तौर पर उस सख्ती को दिखाया गया है जो गांव के इंडिया में पेट्रियार्कल सिस्टम को दिखाती है.

समिधा गुरु: तारा की मां के रोल में, समिधा गुरु ने एक ऐसी औरत का रोल किया है जो खुद जुल्म की शिकार है और जाने-अनजाने में वही नियम अपनी बेटी पर भी थोपती है. उनकी एक्टिंग नेचुरल है.

अन्य कास्ट: फिल्म में क्रिकेट एनालिस्ट, जर्नलिस्ट और असल जिंदगी के लोगों के इंटरव्यू हैं, जिससे यह परफॉर्मेंस से ज्यादा डॉक्यूमेंट्री जैसा लगता है.

डायरेक्शन
अभिनय देव, जिन्हें ‘डेल्ही बेली’ और ‘ब्लैकमेल’ जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है, ने इस बार बिल्कुल अलग और एक्सपेरिमेंटल स्टाइल चुना है. मेनस्ट्रीम इंडियन सिनेमा में डॉक्यू-फिक्शन फॉर्मेट बहुत कम देखने को मिलता है. अभिनय देव का विजन बेशक तारीफ के काबिल है- किसी खेल के टर्निंग प्वाइंट को किसी इंसान और देश की सोच से जोड़ना एक अनोखा आइडिया है. लेकिन, डायरेक्शन के लेवल पर फिल्म अपनी दिशा खो देती है.

बैलेंस की कमी: डायरेक्टर तारा की पर्सनल कहानी और क्रिकेट के डॉक्यूमेंट्री सबूतों के बीच सही बैलेंस बनाने में फेल हो जाते हैं.

डॉक्यूमेंट्री पर ज्यादा जोर: फिल्म के दूसरे हाफ में असली क्रिकेट कमेंटेटर और एक्सपर्ट की बातें इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि तारा की मेन कहानी बैकग्राउंड में चली जाती है. इससे फिल्म का ड्रामा और इमोशनल कनेक्शन कमजोर हो जाता है.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसका माहौल बनाने में अहम रोल निभाती है.

90 के दशक का विजुअल टोन: कैमरावर्क 1990 के दशक के गांव के राजस्थान और उस जमाने के भारत के माहौल को पूरी तरह से दिखाता है. रंगों का चुनाव और लाइटिंग उस जमाने के ठहराव और संघर्ष को दिखाते हैं.

असली और मनगढ़ंत चीजों का मिक्स: असली क्रिकेट फुटेज और ड्रामा वाले सीन के बीच का बदलाव टेक्निकली तो ठीक है, लेकिन कई बार वे दर्शकों के फ्लो में रुकावट डालते हैं.

आंगन और बंद कमरे के शॉट्स: तारा के घर के अंदर के शॉट्स बहुत समझदारी से फ्रेम किए गए हैं ताकि घुटन और कैद का एहसास हो.

म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड के हिसाब से है, लेकिन वे खास यादगार नहीं हैं.

बैकग्राउंड स्कोर: बैकग्राउंड में इस्तेमाल की गई आवाजें और धुनें 1990 के दशक को जिंदा करने की कोशिश करती हैं, लेकिन वे कहानी को रफ्तार देती हैं.

साउंड इफेक्ट: जब क्रिकेट के मैदान का रोमांच दिखाया जाता है, तो बैकग्राउंड स्कोर तेज हो जाता है, जिससे देशभक्ति और जोश की भावना पैदा होती है. हालांकि, इमोशनल सीन में म्यूजिक और गहरा हो सकता था.

कमियां
जबरदस्ती की समानता: क्रिकेट टीम की जीत और तारा के निजी संघर्ष को जोड़ने की कोशिश जबरदस्ती की हुई लगती है. दोनों कहानियां एक साथ चलती हैं, लेकिन आपस में ऑर्गेनिकली नहीं मिलतीं.

पेस की दिक्कतें: डॉक्यूमेंट्री और फिक्शन के बीच लगातार बदलाव से फिल्म की पेस धीमी हो जाती है. ड्रामा का फ्लो अक्सर रुकता है.

तारा के किरदार को नजरअंदाज करना: फिल्म के दूसरे हिस्से में, क्रिकेट डॉक्यूमेंट्री इतनी हावी हो जाती है कि दर्शक तारा के संघर्ष और उसके नतीजे से कट जाते हैं.

डायलॉग उपदेश देने वाले: कई जगहों पर, सोशल मैसेज देने की कोशिश में डायलॉग बहुत ज्यादा उपदेश देने वाले हो जाते हैं.

अंतिम फैसला
‘दूसरा’ सोचने पर मजबूर करने वाली और लीक से हटकर बनी फिल्म है. यह फिल्म उन दर्शकों को पसंद आ सकती है जो स्पोर्ट्स हिस्ट्री, 90 के दशक की यादों और एक्सपेरिमेंटल सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं. हालांकि, एक पूरी और एंटरटेनिंग फिल्म के तौर पर यह अपने मुख्य मकसद से थोड़ी पीछे रह जाती है. आइडिया जितना गहरा और गहरा था, स्क्रीन पर उसका असर उतना ही कम था. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार.



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