इनकी रफ्तार इतनी सटीक होती है कि यह अंतरिक्ष में सबसे भरोसेमंद घड़ी की तरह काम करते हैं. अंतरिक्ष में ऐसे पल्सर बहुत ही दुर्लभ हैं जो किसी दूसरे न्यूट्रॉन तारे का चक्कर लगा रहे हों.
नैशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी ऑफ चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के खगोलविद जिनलिन हान ने कहा, ‘अंतरिक्ष में ऐसे केवल 30 डबल न्यूट्रॉन स्टार सिस्टम मौजूद हैं.’ उन्होंने बताया कि अगर इन तारों की कक्षा छोटी हो तो वहां रिलेटिविस्टिक प्रभाव बहुत ज्यादा मजबूत हो जाते हैं.
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चीनी टेलीस्कोप फास्ट ने इस दुर्लभ बाइनरी सिस्टम को कैसे ढूंढ निकाला?
इस नए बाइनरी सिस्टम की खोज चीन के 500 मीटर अपर्चर वाले स्फेरिकल रेडियो टेलीस्कोप यानी फास्ट ने की है. यह सिस्टम पृथ्वी से लगभग 4200 से 6500 प्रकाश वर्ष की दूरी पर मिल्की वे के डिस्क में मौजूद है. वैज्ञानिकों की टीम ने साल 2020 में एक बड़े सर्वे के दौरान इसे पहली बार देखा था. इस सिस्टम का मुख्य पल्सर तारा एक सेकंड में करीब 43 बार घूमता है. इन दोनों तारों के बीच की दूरी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी से सिर्फ दोगुनी है.
जिनलिन हान ने कहा, ‘हमारी टीम अब तक लगभग 900 पल्सर खोज चुकी है. कई फॉलो-अप ऑब्जर्वेशन के बाद यह सिस्टम बेहद असाधारण साबित हुआ है.’ इसका सबसे आकर्षक पहलू इसका केवल 2.36 घंटे का छोटा ऑर्बिटल पीरियड है. यह अंतरिक्ष में ज्ञात दूसरा सबसे छोटा ऑर्बिटल पीरियड वाला न्यूट्रॉन स्टार सिस्टम बन गया है.
आइंस्टीन के बताए किन तीन गुप्त प्रभावों को वैज्ञानिकों ने सच होते देखा?
वैज्ञानिकों ने 2020 से 2025 के बीच फास्ट टेलीस्कोप से इस सिस्टम की 17 बार सघन निगरानी की. इस दौरान तारों के ऑर्बिट से आने वाले रेडियो पल्स के समय में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को मापा गया. इस सटीक डेटा से आइंस्टीन की थ्योरी के तीन अहम प्रभाव सामने आए.
इस अनोखे जोड़े का वजन ब्रह्मांड के बाकी न्यूट्रॉन तारों से कम कैसे निकला?
इन तीनों प्रभावों के सटीक कैलकुलेशन से दोनों तारों का अलग-अलग वजन निकालना मुमकिन हो पाया. डेटा से पता चला कि मुख्य पल्सर का वजन हमारे सूर्य से 1.3 गुना ज्यादा है. वहीं इसके साथी तारे का वजन सूर्य के द्रव्यमान का केवल 1.19 गुना है. जिनलिन हान ने कहा, ‘सभी ज्ञात डबल न्यूट्रॉन स्टार सिस्टम में इस जोड़े का कुल वजन सबसे कम है.’ साथी तारा अब तक मिले सबसे हल्के न्यूट्रॉन तारों में से एक दर्ज किया गया है.
सुपरनोवा विस्फोट के सिमुलेशन मॉडल बताते हैं कि इससे हल्का न्यूट्रॉन तारा बनना लगभग नामुमकिन है. किसी भी दो प्रभावों से तारों का मास निकाला जा सकता है. तीसरे प्रभाव ने एक स्वतंत्र जांच के तौर पर पुष्टि की कि दोनों तारों का वजन बिल्कुल वही निकलता है.
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8.2 करोड़ साल बाद जब यह दोनों तारे टकराएंगे तो स्पेस में क्या तबाही मचेगी?
दोनों तारों की कक्षा लगातार सिकुड़ रही है क्योंकि इनसे लगातार ग्रेविटेशनल तरंगों के रूप में ऊर्जा बाहर निकल रही है. खगोलविदों का अनुमान है कि यह दोनों तारे आज से करीब 8.2 करोड़ साल बाद एक दूसरे से टकरा जाएंगे. इस भीषण टक्कर से स्पेस-टाइम के फैब्रिक में भयंकर तरंगें पैदा होंगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस विलय के बाद 2.26 सोलर मास का एक नया और भारी न्यूट्रॉन तारा बन सकता है.
हालांकि यह भी संभव है कि यह टकराव इतना प्रचंड हो कि यह पूरा मलबा सीधे एक ब्लैक होल में बदल जाए. इससे पहले साल 2017 में लीगो और वर्गो डिटेक्टर ने ऐसे ही दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से निकली तरंगों को पकड़ा था. इस नई खोज ने उस ऐतिहासिक घटना के विज्ञान को और गहराई से समझने का रास्ता साफ किया है.
क्या स्पेस-टाइम को मरोड़ने वाला फ्रेम ड्रैगिंग प्रभाव भी जल्द पकड़ में आएगा?
वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि इस अत्यधिक दबाव वाले सिस्टम में आइंस्टीन की थ्योरी में कोई छोटी खामी मिल सकती है. भौतिक विज्ञानी लंबे समय से ऐसी खामी तलाश रहे हैं ताकि नई फिजिक्स के दरवाजे खुल सकें. जिनलिन हान ने कहा, ‘डेटा को समझाने के लिए जनरल रिलेटिविटी पूरी तरह जरूरी साबित हुई. दुर्भाग्य से हम आइंस्टीन की ग्रेविटी थ्योरी को गलत साबित नहीं कर सके.’
अब यह टीम आने वाले दशकों तक इस पल्सर की लगातार निगरानी करने की योजना बना रही है. वैज्ञानिक इसके जरिए फ्रेम ड्रैगिंग प्रभाव को पकड़ना चाहते हैं. फ्रेम ड्रैगिंग वह प्रभाव है जिसमें कोई तेजी से घूमती हुई भारी वस्तु अपने आसपास के स्पेस-टाइम को मरोड़ देती है. इस प्रभाव को नापने से न्यूट्रॉन तारे के भीतरी कोर में मौजूद घनत्व का सबसे बड़ा रहस्य हल हो सकेगा.