MBBS Course Fees: नीट में 11 लाख से ज्यादा पास, फिर भी खाली हैं MBBS की सीटें, करोड़ों की फीस बनी सिरदर्द


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MBBS Course Fees: 35 लाख रुपये तक सालाना फीस के चलते तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस की 824 सीटें खाली रह गईं. नीट पास कर लेने के बावजूद स्टूडेंट्स ने इन मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं लिया. इसकी वजह हाई फीस बताई जा रही है.

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11 लाख से ज्यादा पास, फिर भी खाली हैं MBBS की सीटें, भारी फीस बनी सिरदर्दZoom

MBBS Course Fees: मिडिल क्लास परिवारों के लिए एमबीबीएस की फीस भर पाना आसान नहीं है

नई दिल्ली (MBBS Course Fees). डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले लाखों स्टूडेंट्स नीट परीक्षा की तैयारी में दिन-रात एक कर देते हैं. इस साल भी 11 लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स नीट यूजी की न्यूनतम कटऑफ पार करके काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल हुए. हालांकि काउंसलिंग के आखिरी दौर यानी ‘स्ट्रे वैकेंसी राउंड’ में बेहद चौंकाने वाला डेटा सामने आया. देश के कई राज्यों में मेडिकल सीटें भर गई हैं लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस की 824 सीटें खाली रह गईं.

इन एमबीबीएस सीटों के खाली रहने की कोई टेक्निकल वजह नहीं है. इसका कारण भारी फीस बताई जा रही है. इन चुनिंदा डीम्ड यूनिवर्सिटीज में MBBS की सालाना फीस 23 लाख से 35 लाख रुपये तक है. 4.5 साल के इस कोर्स के दौरान सिर्फ ट्यूशन फीस में ही करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ जाएंगे. मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) के आंकड़ों के मुताबिक, स्ट्रे राउंड की शुरुआत में देशभर में 3,426 सीटें खाली थीं, जिनमें से कई भर गईं लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी के कई बड़े कॉलेजों का हाल बेहाल रहा.

किन मेडिकल कॉलेजों में सबसे ज्यादा सीटें खाली रहीं?

चेन्नई के श्री सत्य साई मेडिकल कॉलेज में 75% सीटें खाली पड़ी हैं. डीम्ड यूनिवर्सिटीज और महंगे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में सीटों के खाली रहने का सबसे बुरा असर तमिलनाडु और पुडुचेरी के कुछ चुनिंदा संस्थानों पर पड़ा है. नीचे लिस्ट में दिए गए हर मेडिकल कॉलेज में 250 सीटें थीं, लेकिन भारी भरकम फीस के कारण स्टूडेंट्स वहां जाने से कतराते नजर आए:
  • श्री सत्य साई मेडिकल कॉलेज (चेन्नई): यहां सबसे ज्यादा 75% यानी 188 सीटें खाली रह गईं.
  • मीनाक्षी मेडिकल कॉलेज (कांचीपुरम): यहां 47% यानी 117 सीटें नहीं भर पाईं.
  • महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज (पुडुचेरी): इस संस्थान में 37% यानी 92 सीटें खाली रहीं.
  • श्री बालाजी मेडिकल कॉलेज (क्रोमपेट): यहां भी 33% यानी 82 सीटों पर कोई एडमिशन नहीं हुआ.
  • एसआरएम (SRM), सविता और चेट्टीनाड जैसे नामी-गिरामी मेडिकल संस्थानों में भी बड़ी संख्या में सीटें खाली पड़ी हैं.

35 लाख तक है एमबीबीएस की फीस

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटी में सालाना फीस 23 लाख से 35 लाख रुपये तक है. इसके उलट, भारत के बाकी हिस्सों में औसत फीस लगभग 22.68 लाख रुपये है. महाराष्ट्र की डीम्ड यूनिवर्सिटी की औसत फीस 24.58 लाख और कर्नाटक की 20.85 लाख रुपये है. कंसल्टेंट्स का कहना है कि कोर्स की अवधि के दौरान तमिलनाडु-पुडुचेरी और अन्य राज्यों की फीस में लगभग 21 लाख रुपये का भारी अंतर है. इसीलिए स्टूडेंट्स ने इन कॉलेजों से मुंह मोड़ लिया.

कटऑफ में भारी गिरावट के बावजूद खाली रहीं सीटें

एक तरफ जहां एमबीबीएस की फीस बहुत ज्यादा होने से सीटें खाली रह गईं, वहीं जिन कॉलेजों ने अपनी फीस में थोड़ी राहत दी, वहां कटऑफ रैंक धड़ाम से नीचे गिर गई. उदाहरण के लिए, श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च में एडमिशन की क्लोजिंग कटऑफ रैंक 7.3 लाख से लुढ़क कर सीधे 10.68 लाख पर आ गई. इससे पता चलता है कि स्टूडेंट्स कम स्कोर के बावजूद एडमिशन तो चाहते थे, लेकिन वे अपनी जेब पर पड़ने वाले भारी बोझ से डर रहे थे.

फीस पर ‘कैप’ लगाने की मांग

इस स्थिति को लेकर अब राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं. डीएमके के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने इन संस्थानों को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि ये ‘फीस के भूखे संस्थान’ हैं और केवल मुनाफाखोरी कर रहे हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से डीम्ड यूनिवर्सिटीज की ट्यूशन फीस पर तत्काल अधिकतम सीमा यानी ‘कैप’ लगाने की मांग की है. इससे मेडिकल की पढ़ाई केवल अमीर बच्चों का विशेषाधिकार बनकर नहीं रहेगी.

क्या आगे कोई उम्मीद बची है?

  • मॉप-अप राउंड की संभावना: वर्तमान में एडमिशन की ऑफिशियल प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है. लेकिन अगर सरकार या स्वास्थ्य मंत्रालय स्टूडेंट्स और कॉलेजों के हित को देखते हुए कोई विशेष ‘मॉप-अप राउंड’ आयोजित करने का फैसला लेता है तो इन खाली सीटों को भरने का एक और मौका मिल सकता है.
  • एस्पिरेंट्स के लिए सीख: जो स्टूडेंट्स अगले साल फिर नीट यूजी की परीक्षा देंगे या जिनका 2027 में पहला अटेंप्ट होगा, उनके लिए यह बड़ा सबक है. उन्हें समझना चाहिए कि केवल मेडिकल कॉलेज का नाम देखकर फॉर्म नहीं भरना चाहिए, बल्कि बजट और फाइनेंशियल प्लानिंग को भी अपनी प्रायोरिटी लिस्ट में सबसे ऊपर रखना जरूरी है.



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