Dholpur News: आखिर क्यों मनाया जाता है टेसू-झांझी महोत्सव? महाभारत काल की इस प्रेम कहानी से जुड़ी है मान्यता

Dholpur News: आखिर क्यों मनाया जाता है टेसू-झांझी महोत्सव? महाभारत काल की इस प्रेम कहानी से जुड़ी है मान्यता


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Dholpur News: धौलपुर सहित संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में टेसू-झांझी महोत्सव की रौनक शुरू हो गई है. कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला यह पांच दिवसीय लोकपर्व महाभारत काल के वीर बर्बरीक और उनकी प्रेमिका झांझी की अधूरी प्रेम कहानी व विरह से जुड़ा हुआ है. बाजारों में टेसू-झांझी की बिक्री शुरू हो गई है और बच्चों में इसे लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है. डिजिटल दौर के बावजूद यह प्राचीन लोक परंपरा आज भी ब्रज संस्कृति की सौंधी महक और स्मृतियों को जीवंत रखे हुए है.

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Dholpur News: ब्रज क्षेत्र में टेसू-झांझी महोत्सव की धूम, महाभारत काल से जुड़ी है प्रेम कहानी

धौलपुर: धौलपुर जिले के साथ-साथ संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में शारदीय नवरात्र और विजयदशमी के समापन के साथ ही टेसू-झांझी महोत्सव का रंग जमना शुरू हो गया है. धौलपुर शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक के बाजारों, दुकानों और ठेलों पर मिट्टी से बने टेसू और झांझी की बिक्री जोरों पर है. कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला यह पांच दिवसीय लोकपर्व ब्रज संस्कृति, लोक मान्यताओं और अटूट प्रेम की स्मृतियों का प्रतीक माना जाता है.

प्राचीन समय में टेसू-झांझी महोत्सव घर-घर में बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था. हालांकि, बदलते आधुनिक परिवेश और बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इस परंपरा का दायरा पहले की तुलना में कुछ सीमित जरूर हुआ है. इसके बावजूद छोटे बच्चों और सांस्कृतिक परिवारों में इस उत्सव को लेकर आज भी भारी उत्साह और उत्सुकता देखने को मिलती है. बच्चे टेसू और झांझी के प्रतीक लेकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक गीत गाकर लोक संस्कृति को जीवंत रखते हैं.

महाभारत काल के वीर बर्बरीक से जुड़ी है ऐतिहासिक कथा
स्थानीय इतिहासकार कबीर शरण के अनुसार, टेसू-झांझी महोत्सव ब्रज क्षेत्र की सबसे प्राचीन और समृद्ध लोक परंपराओं में से एक है. इस पर्व का सीधा संबंध महाभारत काल के वीर योद्धा बर्बरीक से जोड़ा जाता है. मान्यताओं के अनुसार, बर्बरीक पांडव पुत्र भीम के पुत्र घटोत्कच के बेटे थे. वे अत्यंत पराक्रमी थे और उन्होंने युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देने की कठोर प्रतिज्ञा ली थी.

भगवान श्रीकृष्ण ने मांगा था बर्बरीक का शीश दान
कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध के दौरान संतुलन बनाए रखने और युद्ध के परिणामों को नियंत्रित करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया. उन्होंने बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया. वीर बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश दान कर दिया, लेकिन महाभारत का पूरा युद्ध देखने की अपनी अंतिम इच्छा प्रकट की. भगवान श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से बर्बरीक ने पूरा धर्मयुद्ध देखा.

अधूरी प्रेम कहानी और विरह का प्रतीक है यह लोकपर्व
लोककथाओं के अनुसार, युद्ध मैदान में जाने से पूर्व बर्बरीक ने अपनी प्रेमिका झांझी से विवाह करने का वचन दिया था. परंतु युद्ध की परिस्थितियों और शीश दान के कारण उनका यह विवाह कभी संपन्न नहीं हो सका. बर्बरीक के बलिदान के बाद झांझी के जीवन से जुड़ी विरह और प्रेम की यह अमर कथा भी ब्रज की लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन गई. इसी मान्यता के आधार पर हर वर्ष टेसू (बर्बरीक) और झांझी के प्रतीकों का निर्माण कर यह उत्सव मनाया जाता है, जो आज भी विरह और प्रेम की स्मृतियों को संजोए हुए है.



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