कोडरमा: शारदीय नवरात्र में 10 दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद विजयादशमी के दिन माता की विदाई की परंपरा निभाई जाती है. आमतौर पर दुर्गा पूजा पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं का विसर्जन वाहनों के माध्यम से किया जाता है, लेकिन कोडरमा जिले के गुमो स्थित प्राचीन दुर्गा मंडप में माता की विदाई की परंपरा बेहद अनोखी है. यहां मां दुर्गा की प्रतिमा को किसी वाहन पर नहीं, बल्कि श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं. इस दौरान पारंपरिक पूजा-अर्चना, सिंदूर की रस्म और सामूहिक आरती के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
550 वर्ष पुरानी है दुर्गा पूजा की परंपरा
गुमो में दुर्गा पूजा की शुरुआत करीब 550 वर्ष पूर्व राजा परिवार द्वारा की गई थी. यहां के पुजारी दशरथ पांडेय के अनुसार लगभग 300 वर्षों तक राजा परिवार ने दुर्गा पूजा का आयोजन किया. देश में राजतंत्र की समाप्ति के बाद सतघरवा परिवार और स्थानीय लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया. उनके अनुसार स्थानीय स्तर पर करीब 250 वर्षों से परंपरागत तरीके से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी गुमो की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है.
सुहागिन महिलाओं ने निभाई सिंदूर की रस्म
विजयादशमी की रात माता दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से पहले दुर्गा मंडप में विशेष धार्मिक रस्में निभाई गईं. इस दौरान सुहागिन महिलाओं ने माता की मांग में सिंदूर अर्पित किया. इसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे की मांग में सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्यवती होने की कामना की. पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई इस रस्म में महिलाओं की भागीदारी ने आयोजन को खास बना दिया. मान्यता और आस्था से जुड़ी इस परंपरा के माध्यम से महिलाओं ने माता रानी से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की. सिंदूर की रस्म के बाद प्रतिमा के विसर्जन की तैयारियां शुरू हुईं.
जानें कैसे कंधों पर निकली माता की डोली
गुमो दुर्गा मंडप की सबसे खास परंपरा माता की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाना है. यहां प्रतिमा को किसी वाहन पर नहीं रखा जाता है. बल्कि समिति के पदाधिकारी और स्थानीय श्रद्धालु मिलकर उसे डोली के स्वरूप में अपने कंधों पर उठाते हैं. विसर्जन से पहले श्रद्धालुओं ने माता की प्रतिमा को कंधों पर लेकर पांच बार दुर्गा मंडप की परिक्रमा की. इसके बाद जयकारों के बीच माता की डोली को विसर्जन स्थल की ओर ले जाया गया. इस दौरान श्रद्धालुओं में माता की प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाने को लेकर विशेष उत्साह देखा गया. स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और सेवा भाव व्यक्त करने का अवसर भी है.
तालाब में होता है मूर्ति विसर्जन
दुर्गा मंडप से करीब 700 मीटर की दूरी पर स्थित राजा के जमाने के तालाब तक श्रद्धालु माता की प्रतिमा को कंधों पर लेकर पहुंचे. रास्ते भर मां दुर्गा के जयकारे गूंजते रहे. तालाब पहुंचने के बाद सामूहिक रूप से माता की आरती की गई. इसके बाद माली ने दूध, दही और दूब घास से माता की प्रतिमा का चूमावन किया. पारंपरिक विधि-विधान के साथ सभी धार्मिक रस्में पूरी की गईं. इसके बाद श्रद्धालुओं ने नम आंखों से मां दुर्गा को विदाई दी और प्रतिमा का विसर्जन किया. इस दौरान श्रद्धालुओं के बीच भक्ति, आस्था और भावुकता का माहौल बना रहा.
परंपरा में झलकती है गुमो की सांस्कृतिक विरासत
गुमो में माता दुर्गा की प्रतिमा का कंधों पर विसर्जन स्थानीय लोगों की गहरी आस्था और सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. आधुनिक दौर में जहां विसर्जन के लिए वाहनों का इस्तेमाल आम हो गया है. वहीं, गुमो के श्रद्धालु आज भी पारंपरिक तरीके से माता की डोली उठाकर विदाई देते हैं. सिंदूर की रस्म से लेकर पांच बार मंडप की परिक्रमा और राजा के जमाने के तालाब में विसर्जन तक, हर चरण इस आयोजन को विशिष्ट बनाता है.