बलिया: आखिर कब बलिया की भृगु नगरी सबसे शक्तिशाली बन जाती हैं. भारतीय सनातन परंपरा में बलिया का भृगु-दर्दर क्षेत्र आस्था और अध्यात्म का एक ऐसा केंद्र है, जहां स्नान करने मात्र से सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं. कार्तिक पूर्णिमा तक के इस पवित्र समय को लेकर यह मान्यता है कि इस पावन संगम में सृष्टि की समस्त शक्तियों और तीर्थों का विशेष वास होता है. धर्म और अध्यात्म के इस संगम पर बलिया की यह धरती अपनी एक विशिष्ट धार्मिक पहचान रखती है.
दर्दर में ही मिली थी भगवान शिव का शांति
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि, पद्म पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक जब सूर्य तुला राशि में प्रवेश करते हैं. तब सभी ऋषि मुनि, सिद्ध, गंधर्व, यति, योगी और स्वयं सभी तीर्थ इस क्षेत्र में आकर कल्पवास करते हैं. मान्यता यह है कि इस अवधि में यहां आने वाले सभी तीर्थों को भी अपने अंदर पाप मोचन शक्ति की प्राप्ति होती है और इसी वजह से इस तीर्थ का महत्व काशी से भी अधिक माना गया है. इस धार्मिक स्थल से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार इसी दर्दर क्षेत्र में भगवान शिव को शांति और महर्षि भृगु को अपने संताप से मुक्ति मिली थी.
पद्म पुराण में उल्लेखित श्लोक
कार्तिके समनुप्राप्ते तुला संस्थे दिवाकरे, मुनयः सिद्ध गन्धर्वाः सा विद्याधर चारणाः. ऋघयः पितरो देवाः सस्त्रीकाश्च महान्वयाः, तीर्थराजादि तीर्थानि सरांसि च नदी नदाः. पम्पा, वाराणसी, माया कॉञ्ची कान्ति कलावती, अयोध्या मथुरा अवन्तीपुरी द्वारावती तथा. एताच्त्रन्याषु शततः स्वैनः क्षपणकाम्यया. दर्दर समनुप्राप्य सर्वतिष्ठन्ति कार्तिके. (पद्मपुराण) इसका भावार्थ यह है कि, कार्तिक माह में जब तुला का सूर्य होता है, तब सभी ऋषि-मुनि, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, पितृगण, देवगण और सारे तीर्थ, पवित्र सरोवर, नदिया इस भृगु दर्दर क्षेत्र बलिया में आकर निवास करते हैं. उक्त के भावार्थ के अनुसार कार्तिक माह में जब सूर्य तुला राशि में होते हैं, तब सभी पवित्र नदियां, सरोवर, देवता और पितृगण इस क्षेत्र में निवास करते हैं और यहां का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो जाता है.
शरद ऋतु में सूर्य की किरणें पड़ती है लंबवत
इस परंपरा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी जुड़ा हुआ है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार शरद ऋतु में जब सूर्य की किरणें गंगा नदी पर लंबवत पड़ती हैं, तब काशी के मार्कंडेय महादेव से लेकर दिग्वारा तक के बीच स्थित भृगु-दर्दर क्षेत्र के गंगा जल की ऊर्जा और पवित्रता अत्यधिक बढ़ जाती है. इस जल में स्नान करने से न केवल पापों का नाश होता है बल्कि लोगों के रोग भी दूर होते हैं. इन्हीं ऐतिहासिक, पौराणिक और वैज्ञानिक मान्यताओं के चलते शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक बलिया के इस भृगु-दर्दर क्षेत्र में कल्पवास करने का विशेष विधान है. इस एक महीने की अवधि में इस क्षेत्र को तीर्थराज का दर्जा प्राप्त होता है और देश भर से आने वाले संत महात्मा यहां कल्पवास कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं.