इस मंदिर को बनाने में अंग्रेजों ने की थी मदद! छत में बिछी रेल की पटरी, ऊंट से लाए थे मूर्ति

इस मंदिर को बनाने में अंग्रेजों ने की थी मदद! छत में बिछी रेल की पटरी, ऊंट से लाए थे मूर्ति


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इस मंदिर को बनाने में अंग्रेजों ने की थी मदद, छत में बिछी है रेल की पटरी

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Bihari Lal Temple Satna: सतना के एक पुराने मंदिर में ऐसी चीजें मौजूद हैं, जिन्हें देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे. यहां भगवान राधा-कृष्ण की मूर्तियां जयपुर से ऊंट पर लाई गई थीं, तो मंदिर में आजादी के दौर का झूला आज भी संभालकर रखा गया है. आखिर इस मंदिर की कहानी कितनी पुरानी है?

सतना. मध्य प्रदेश के सतना के बीचोंबीच एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर है, जिसकी बनावट में छिपी कहानी आपको हैरान कर सकती है. इस मंदिर की छत में आज भी रेलवे की पटरियों और लकड़ी का इस्तेमाल दिखाई देता है. बताया जाता है कि करीब 170 साल पुराने इस मंदिर को बनाने में अंग्रेजों ने भी सहयोग किया था. मंदिर के दरवाजों की पत्थर से बनी चौखट भी इसकी पुरानी विरासत की गवाही देती है. खास बात यह है कि आज सतना के जिस बिहारी चौक को शहर के प्रमुख बाजारों में गिना जाता है, उसका नाम भी इसी मंदिर के नाम पर पड़ा है. राधा-कृष्ण को समर्पित यह मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं बल्कि सतना के इतिहास और आस्था से जुड़ी एक खास पहचान भी है.

सतना शहर के बिहारी चौक पर स्थित बिहारी लाल मंदिर को स्थानीय लोग बिहारी जी के मंदिर के नाम से भी जानते हैं. यह मंदिर शहर के प्रमुख बाजार के बीचोंबीच बना हुआ है. यहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग आते-जाते हैं लेकिन मंदिर की पुरानी बनावट और उससे जुड़ी ऐतिहासिक बातें हर किसी को मालूम नहीं हैं. मंदिर की पहचान यहां विराजे राधा-कृष्ण के साथ-साथ इसकी अनोखी कहानी से भी जुड़ी हुई है.

जब मंदिर बना, तब सतना की पहचान आज जैसी नहीं थी
लोकल 18 से बातचीत में मंदिर के महंत बृजेंद्र कुमार दुबे ने बताया कि बिहारी जी के इस मंदिर को बने करीब 170 साल से भी ज्यादा समय हो चुका है. उस दौर में सतना की पहचान आज जैसे विकसित शहर के रूप में नहीं थी. हालांकि इस इलाके से रेलवे लाइन बिछाने की योजना जरूर चल रही थी. मंदिर का निर्माण उनके दादा स्वर्गीय महंत वृंदावन दास जी ने कराया था. इस तरह मंदिर का इतिहास एक परिवार की कई पीढ़ियों और शहर के पुराने दौर से जुड़ा हुआ है. महंत ने बताया कि मंदिर की छत बनाने में रेलवे की पटरियों और उस समय पटरियों में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी और पत्थर के पांटो का उपयोग किया गया था. बताया जाता है कि मंदिर के निर्माण में अंग्रेजों ने भी सहयोग दिया था. छत में लगी पुरानी पटरियां इसी कहानी से जुड़ा एक खास पहलू हैं.

पत्थर के दरवाजे और चौखट में दिखती है बेमिसाल कारीगरी
बिहारी लाल मंदिर की एक और खासियत इसके दरवाजों की चौखट है. मंदिर के दरवाजों में पत्थर का इस्तेमाल किया गया है और इनकी बनावट करीब 150 साल पुरानी है. उस समय निर्माण के लिए आज की तरह आधुनिक मशीनें और तकनीक आसानी से उपलब्ध नहीं थीं. ऐसे में पत्थर और लकड़ी का इस्तेमाल करके तैयार की गई पुरानी संरचनाएं अपने दौर की निर्माण शैली की झलक दिखाती हैं.

जयपुर से ऊंट पर लाए गए थे राधा-कृष्ण
इस मंदिर की कहानी केवल इसकी बनावट तक सीमित नहीं है बल्कि यहां विराजमान भगवान की मूर्तियों से भी जुड़ी है. महंत ने बताया कि राधा-कृष्ण की मूर्तियों को जयपुर से सतना तक ऊंट पर लाकर स्थापित किया गया था. आज के समय में लंबी दूरी तय करना आसान हो गया है लेकिन पुराने दौर में मूर्तियों को इस तरह लाना अपने आप में एक बड़ी यात्रा रही होगी. मंदिर में आजादी के आसपास के समय का एक पुराना झूला भी रखा हुआ है, जिसमें ठाकुर जी को विराजमान कराया जाता था. यह झूला मंदिर की पुरानी परंपराओं और धार्मिक रीति-रिवाजों की याद दिलाता है.

मंदिर के नाम से पड़ा बिहारी चौक का नाम
आज बिहारी चौक सतना के प्रमुख बाजार क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां कई दुकानें और व्यावसायिक गतिविधियां हैं लेकिन इस इलाके के नाम के पीछे भी इसी मंदिर की पहचान जुड़ी हुई है. बिहारी जी के मंदिर के कारण ही इस जगह को बिहारी चौक कहा जाने लगा. इस तरह मंदिर ने धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ आसपास के इलाके को भी एक अलग पहचान दी है.



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