भरतपुर में सफाई पर करोड़ों खर्च फिर भी शहर कचरे के ढेरों से बेहाल, मुख्यमंत्री आवास मार्ग का बुरा हाल


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Bharatpur garbage problem and sanitation crisis: भरतपुर नगर निगम द्वारा सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद शहर में जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं. हालात यह हैं कि मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाले प्रमुख मार्ग पर भी गंदगी और कचरे के अंबार नजर आ रहे हैं. शहर की कॉलोनियों में कचरा उठाने वाली गाड़ियां नियमित नहीं पहुंचतीं, जिससे स्थानीय लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. नगर निगम के कागजी दावों और धरातल की हकीकत के बीच इस बड़े अंतर ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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Bharatpur Sanitation News: भरतपुर में सफाई के नाम पर करोड़ों खर्च, मुख्यमंत्री आवास मार्ग पर कचरे के ढेर

भरतपुर: राजस्थान के भरतपुर जिले में सफाई व्यवस्था को लेकर नगर निगम के तमाम दावे और कागजी आंकड़े धरातल पर पूरी तरह दम तोड़ते नजर आ रहे हैं. शहर में साफ-सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद शहर की सूरत कचरे के ढेरों के कारण बदहाल हो चुकी है. शहर की शायद ही कोई ऐसी कॉलोनी या मोहल्ला बचा हो, जहाँ कचरा प्रबंधन और नियमित सफाई व्यवस्था को लेकर स्थानीय नागरिकों की शिकायतें सामने न आती हों. धरातल पर फैली यह गंदगी नगर निगम की कार्यशैली पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा रही है.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वीवीआईपी और प्रशासनिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले इलाकों की भी सुध नहीं ली जा रही है. भरतपुर शहर में मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाले प्रमुख और वीवीआईपी रास्ते पर भी जगह-जगह कचरे के बड़े-बड़े ढेर आसानी से देखे जा सकते हैं. जब शहर के मुख्य और विशिष्ट मार्ग ही गंदगी से अछूते नहीं हैं, तो आम रिहायशी कॉलोनियों और अंदरूनी इलाकों में सफाई व्यवस्था का क्या हाल होगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है.

कॉलोनियों में नियमित नहीं पहुंचतीं कचरा संग्रहण गाड़ियां
शहर के विभिन्न इलाकों के रहवासियों का कहना है कि उनके यहाँ कचरा उठाने वाली गाड़ियां नियमित रूप से नहीं आती हैं. कई कॉलोनियों में स्थिति यह है कि कई-कई दिनों तक कचरा उठाया ही नहीं जाता, जिससे घरों के बाहर और खाली प्लॉटों में कचरे के ढेर जमा होते जाते हैं. कचरे के इस तरह लगातार सड़ने से उठने वाली दुर्गंध और पनप रहे मच्छरों के कारण आम जनता का जीना मुहाल हो गया है. लोगों को मजबूरी में गंदगी और बदबू के बीच अपना जीवन गुजारना पड़ रहा है, जबकि निगम प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने में लगा है.

कागजी व्यवस्था और निगरानी पर उठ रहे गंभीर सवाल
एक तरफ नगर निगम द्वारा सफाई कर्मचारियों की तैनाती से लेकर घर-घर कचरा संग्रहण वाहनों के संचालन पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ धरातल पर कचरे के अंबार इस बात की गवाही दे रहे हैं कि योजनाओं का क्रियान्वयन किस स्तर पर हो रहा है. सवाल सिर्फ शहर में लगे कचरे के ढेरों का नहीं है, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था का है जिस पर जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है. अब देखना यह होगा कि इन तीखी शिकायतों और जमीनी तस्वीरों के सामने आने के बाद नगर निगम प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है और शहरवासियों को कब इन कचरे के ढेरों से स्थाई राहत मिल पाती है.



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