क्या चेहरे में छिपे हैं मौत के संकेत! कैंसर मरीजों पर रिसर्च से AI ने क्या बताया

क्या चेहरे में छिपे हैं मौत के संकेत! कैंसर मरीजों पर रिसर्च से AI ने क्या बताया


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चेहरे में छिपे हैं मौत के संकेत! कैंसर मरीजों पर रिसर्च से AI ने क्या बताया

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बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने एक अनोखा AI मॉडल बनाया है. दावा है कि यह मॉडल चेहरा देखकर बता देगा कि किसी भी व्यक्ति की मौत कितने दिन में होगी. फिलहाल इस मॉडल को कैंसर मरीजों के लिए ट्रेंड किया गया है.

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बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट ने ऐसा एआई मॉडल बनाया है जो तस्वीर देखकर मौत के संकेत पहचान लेता है. (फोटो-pixabay)

क्या किसी कैंसर मरीज के चेहरे को देखकर ये बताया जा सकता है कि वो कितने दिन जिंदा रहेगा? वैज्ञानिकों का दावा है कि ऐसा हो सकता है. बोस्टन स्थित मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मॉडल बनाने का दावा किया है जो तस्वीर देखकर चेहरे में छिपे मौत के संकेत पहचान लेगा. AI आधारित इस मॉडल को 4 करोड़ से ज्यादा तस्वीरों से ट्रेंड किया गया है. इसका नाम FAHR-FaceAge रखा गया है जो चेहरे से किसी भी व्यक्ति की असल उम्र बता सकता है. ये मॉडल ये भी पता लगा सकता है कि शरीर में क्या दिक्कतें हैं और उनकी वजह से उसके जीवन को कितना खतरा है.

वैज्ञानिकों की इस रिसर्च को द लैंसेज डिजिटल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित किया गया है. मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम कैंसर इंस्टीट्यूट के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट रेमंड मैक ने इसे लीड किया है. उन्होंने दावा किया कि तस्वीर से किसी व्यक्ति की मौत का जोखिम पता लगाने वाला यह अपने तरह का पहला मॉडल है.

रिसर्च में क्या आया सामने?

मॉडल का कैंसर मरीजों पर रिसर्च किया गया. इसमें खतरे के हिसाब से 10-10 प्रतिशत मरीजों के 10 वर्ग बनाए गए. इनमें AI मॉडल ने जिन 10 प्रतिशत मरीजों की मौत के बारे में सबसे ज्यादा खतरा जताया था उनमें से आधी की मौत 90 दिन के अंदर हो गई.

जो 10 प्रतिशत मरीजों में मौत की संभावना बेहद कम थी उनमें से सिर्फ 2 प्रतिशत की ही मौत हुई. वॉशिंगटन पोस्ट ने मैक के हवाले से लिखा है कि पिछले साल FaceAge अध्ययन में शुरुआती तौर पर ये साबित किया गया था कि किसी व्यक्ति के चेहरे की तस्वीर से उसकी उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है. इस पर काम किया और FAHR-FaceAge मॉडल तैयार किया जो ज्यादा सटीक है. इसी का दूसरा पार्ट FAHR-FaceSurvival है जो कैंसर मरीजों में मृत्यु के जोखिम का सीधे अनुमान लगाता है.

AI मॉडल को कैसे किया ट्रेंड?

FAHR-Face फाउंडेशन मॉडल का इस्तेमाल करते हुए मैक और उनकी टीम ने सबसे पहले डेटासेट से 30 हजार कैंसर मरीजों की तस्वीरों और उनके इलाज तथा मेडिकल हिस्ट्री से जुड़ी जानकारियों का अध्ययन किया. इसमें ये जानकारी दी गई थी कि संबंधित मरीजों के जीने की संभावना कितनी है. इस डाटा में उन मरीजों की जानकारी भी शामिल थी जो अब इस दुनिया में नहीं है. डाटा में ये भी बताया गया था कि मरीज कितने समय तक जीवित रहे, कैंसर का पता चलने के बाद उनकी मृत्यु हुई या नहीं और अगर हुई तो कब हुई. इसी जानकारी के आधार पर Face Survival को प्रशिक्षित किया गया.

आंखों के नीचे के हिस्से पर दिया ध्यान

मॉडल को ऐसे ट्रेंड किया गया जिससे ये आंखों के नीचे के हिस्से और नाक के ऊपरी हिस्से के आसपास चेहरे पर ज्यादा ध्यान देता है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि एल्गोरिदम चेहरे के इन हिस्सों में वास्तव में किन संकेतों को पहचानता है और उन संकेतों के आधार पर निष्कर्ष तक कैसे पहुंचता है. रिसर्च में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मशीन लर्निंग एंड हेल्थकेयर लैब की प्रोफेसर और निदेशक सुची सारिया भी शामिल रहीं.

उनके हवाले से वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा है कि अभी हमें यह नहीं पता कि चेहरे के इन हिस्सों में मौजूद कौन-सी शारीरिक विशेषताएं ऐसे संकेत दे रही हैं. हालांकि मैक हिप्पेक्रेट्स की पुस्तक बुक ऑफ प्रोग्नोस्टिक्स का उदाहरण देते हैं जिसमें ये बताया गया है कि मौत का चेहरा कैसा होता है. इसके मुताबिक जब नाक नुकीली हो जाए, आंखें धंसी हों और कपटियां पिचकने लगें तो समझ लेना चाहिए की मौत नजदीक है. उन्होंने दावा किया कि मॉडल भी इसी से अंदाजा लगा रहा है.

अभी मॉडल की विश्वसनीयता जांच रहे वैज्ञानिक

वैज्ञानिक मॉडल की कुछ सीमाओं को स्वीकार कर रहे हैं. उनका कहना है कि इसकी विश्वसनीयता जांचने के लिए अलग-अलग देशों और अलग-अलक बैकग्राउंड वाले लोगां को रिसर्च की जरूरत है. इसी साल प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में मैक और उनके सहयोगियों ने कई वर्षों के दौरान ली गई तस्वीरों का विश्लेषण किया था. इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि समय के साथ जैविक उम्र के अनुमान में किस तरह बदलाव आता है और इन बदलावों का मरीजों के जीवित रहने की अवधि से क्या संबंध है.



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