आइसक्रीम में लगाया रिटायरमेंट का पैसा, पूर्व बैंक अधिकारी ने बताई अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग

आइसक्रीम में लगाया रिटायरमेंट का पैसा, पूर्व बैंक अधिकारी ने बताई अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग


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एक तरफ कई लोग तो पैसों की तंगी से परेशान रहते हैं और दूसरी तरफ जिनके पास पैसा है वो लोग अपने पैसे को ऐसी जगह इंवेस्ट करने को लेकर परेशान जहां खतरा ना हो. अगर पैसे को सही जगह इस्तेमाल किया गया तब तो वह आपको रिटर्न देगा और गलती से पैसे को सही जगह नहीं लगाया तो देखते-देखते आप खाली हाथ हो जाएंगे. आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलाने जा रहे हैं जो पूर्व में बैंक कर्मचारी रहे हैं. उन्होंने अपने रिटायरमेंट के पैसे को कैसे इंवेस्ट किया है आप भी समझकर लाभ ले सकते हैं.

अमित कुमार/समस्तीपुर: नौकरी के दौरान हर महीने वेतन आता है और इसी से लोगों का खर्च और बाकी सुख-सुविधाएं पूरी होती हैं. बड़ी समस्या तब होती है जब रिटायरमेंट का समय आ जाता है. रिटायर होने के बाद लोगों को रिटायरमेंट फंड मिलता है. रिटायर होने के बाद सैलरी मिलना बंद हो जाता है तो यही फंड बुढ़ापे का सहारा रहता है. इससे दवा-इलाज से लेकर अपने बाकी के जरूरी काम कर सकते हैं. कोई इन पैसों को जमीन में इंवेस्ट कर देता है तो कोई अपने सपनों का घर बनवाता है, कोई बच्चों के भविष्य के लिए पैसा सुरक्षित रखता है. आज हम आपको एक बैंक में काम कर चुके और पैसों का लेखा जोखा रखने वाले एक रिटायर शख्स से मिलाते हैं. उनसे हमने इस बारे में जानकारी ली कि उन्होंने रिटायरमेंट के बाद की अपनी प्लानिंग कैसे की. हम बात कर रहे हैं समस्तीपुर जिले के पटोरी निवासी वशिष्ठ राय की. इन्होंने रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी को एक अलग दिशा दी.

वर्षों तक बैंक में दूसरों के पैसों के लेन-देन और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े रहे वशिष्ठ ने अपनी सेवानिवृत्ति की रकम को कारोबार में लगाया. आइसक्रीम की फैक्ट्री से शुरुआत कर उन्होंने अलग-अलग उत्पाद तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया. लोकल 18 की टीम से खास बातचीत में उन्होंने अपनी इस यात्रा के अनुभव साझा किए. उनकी कहानी सिर्फ रिटायरमेंट फंड के इस्तेमाल की नहीं, बल्कि नौकरी के बाद भी सक्रिय रहकर अपनी रुचियों को आगे बढ़ाने की मिसाल है.

नौकरी के साथ उद्यमिता, रिटायरमेंट के बाद कारोबार को मिला विस्तार
वशिष्ठ राय बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1981 में ग्रामीण बैंक में नौकरी शुरू की थी और 1984 तक वहां सेवा दी. इसके बाद 1984 से 2016 तक बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत रहे. उनकी अंतिम पोस्टिंग पूर्वोत्तर भारत में थी. बैंक की नौकरी के दौरान भी वह खाली समय में उद्यमिता और पर्यावरण से जुड़े कार्यों में रुचि लेते थे. हालांकि, नौकरी की जिम्मेदारियों के कारण वे अपनी रुचियों को पूरी तरह समय नहीं दे पाते थे. सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें अपने विचारों पर खुलकर काम करने का अवसर मिला. उन्होंने बताया कि पेंशन से परिवार का खर्च चलता है, जबकि रिटायरमेंट की रकम का इस्तेमाल उन्होंने फैक्ट्री शुरू करने में किया. शुरुआत आइसक्रीम बनाने से हुई. इसके बाद उन्होंने अन्य उत्पादों की ओर भी कदम बढ़ाया. वशिष्ठ राय आरओ वाटर प्लांट भी चलाते हैं और यहां से लोगों को फिल्टर पानी सप्लाई करते है. बैटरी में इस्तेमाल होने वाले डिस्टिल्ड वाटर को बनाने का काम भी करते हैं. उनका मानना है कि अपनी जरूरतों और भविष्य को ध्यान में रखकर किया गया निवेश व्यक्ति को आर्थिक रूप से सक्रिय बनाए रख सकता है.

कारोबार और जमीन में निवेश के साथ पर्यावरण व मातृभाषा से भी जुड़ाव
वशिष्ठ राय वशिष्ठ ने कारोबार के साथ जमीन में भी निवेश किया है. उनके अनुसार, उन्होंने संपत्ति खरीदते समय उसके भविष्य के मूल्य को ध्यान में रखा. परिवार के भविष्य को लेकर भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां तय की हैं. उनके दो बेटे हैं, जिनमें एक बैंक अधिकारी है, जबकि दूसरे को उन्होंने अपनी संपत्ति और उससे जुड़े कामकाज की जिम्मेदारी संभालने के लिए रखा है. कारोबार और आर्थिक योजनाओं के अलावा वशिष्ठ का पर्यावरण से गहरा लगाव है. वे नौकरी के दिनों से ही पर्यावरण संरक्षण से जुड़े काम करते रहे हैं और अब सेवानिवृत्ति के बाद इस दिशा में अधिक स्वतंत्रता से काम कर पा रहे हैं. इसके साथ ही वह अपनी मातृभाषा बाज्जिका को पहचान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं. उनका कहना है कि बाज्जिका को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में लगातार प्रयास होने चाहिए.



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