1930 में देवघर में शुरू हुई दुकान, 2 रूपए में सिलते थे अंग्रेजों और राजाओं के कपड़े, जानें रोहिणी के इस टेलर का राज

1930 में देवघर में शुरू हुई दुकान, 2 रूपए में सिलते थे अंग्रेजों और राजाओं के कपड़े, जानें रोहिणी के इस टेलर का राज


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देवघर के रोहिणी में साल 1930 से चल रही फैशन टेलर दुकान अपनी पुरानी विरासत और कुछ ही घंटों में कपड़े सिलने के लिए आज भी जानी जाती है। इस पुश्तैनी दुकान को अब परिवार की तीसरी पीढ़ी संभाल रही है.

देवघर: देश को आजाद हुए करीब 8 दशक हो चुके हैं. इस दौरान बाजार बदला, फैशन बदला और कपड़े सिलने का तरीका भी बदल गया. पहले लोग दर्जी के पास जाकर कपड़े सिलवाते थे, लेकिन आज रेडीमेड कपड़ों का चलन काफी बढ़ गया है. इसके बावजूद देवघर के रोहिणी में एक ऐसी दुकान है. जहां आज भी लोगों का भरोसा पहले जैसा ही बना हुआ है. साल 1930 में शुरू हुई इस दुकान में कपड़े सिलने का काम आज भी जारी है. सबसे खास बात यह है कि यहां आसपास के गांव-देहात से लोग कपड़े सिलवाने आते हैं. दुकान की पहचान सिर्फ पुरानी होने से नहीं, बल्कि कम समय में कपड़े तैयार करके देने से भी है.जहां कई बार दर्जी के यहां कपड़े सिलवाने के लिए लोगों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है, वहीं इस दुकान में कुछ ही घंटों में कपड़े सिलकर तैयार कर देने का दावा किया जाता है.यही वजह है कि इतने साल बीतने के बाद भी इस दुकान की पहचान बनी हुई है.

अंग्रेजों के जमाने में हुई थी दुकान की शुरुआत
रोहिणी के रहने वाले दुकानदार मोहम्मद वाजिद बताते हैं कि इस दुकान की शुरुआत उनके वालिद साहब यानी पिता ने साल 1930 में की थी. उस समय देश अंग्रेजों के शासन में था. उनके पिता दुकान पर कपड़े सिलने का काम करते थे. वाजिद बताते हैं कि उस दौर में अंग्रेज भी दुकान से कुछ ही दूरी पर रहा करते थे और उनके पिता उनके कपड़े भी सिला करते थे. उस समय कपड़े सिलने का मेहनताना आज के मुकाबले बहुत कम था.दो रुपये में शर्ट-पैंट सिल दी जाती थी, जबकि ब्लाउज सिलने के लिए दो आना लिया जाता था. धीरे-धीरे समय बदला, महंगाई बढ़ी और कपड़ों की सिलाई का दाम भी बढ़ता गया. लेकिन दुकान पर काम करने का सिलसिला कभी रुका नहीं. पिता के बाद उनके बड़े भाई ने दुकान संभाली और फिर परिवार की इस विरासत को मोहम्मद वाजिद ने आगे बढ़ाया.

राजा साहब के भी सिले जाते थे कपड़े
मोहम्मद वाजिद बताते हैं कि जब उन्होंने दुकान संभाली, उस समय रोहिणी स्टेट के राजा साहब यानी घटवाल साहब के कपड़े भी इसी दुकान में सिले जाते थे. उस दौर में दुकान पर कपड़े सिलवाने वालों में आम लोगों के साथ इलाके के खास लोग भी शामिल थे.धीरे-धीरे दुकान की पहचान आसपास के गांवों तक फैलती चली गई.आज हालात यह हैं कि रोहिणी के अलावा आसपास के गांव-देहात से भी लोग यहां कपड़े सिलवाने पहुंचते हैं.समय के साथ सिलाई का मेहनताना भी बढ़ा है.वाजिद के मुताबिक, जिस शर्ट-पैंट की सिलाई कभी दो रुपये में होती थी, उसके लिए अब करीब 550 रुपये लगते हैं. यानी वक्त के साथ दाम बदले, लोगों के पहनावे में बदलाव आया, लेकिन दुकान पर सिलाई का काम आज भी जारी है.

अब बेटे के हाथ में दुकान की जिम्मेदारी
मोहम्मद वाजिद बताते हैं कि अब उनका बेटा दुकान संभाल रहा है. इस तरह परिवार की तीन पीढ़ियां इस काम से जुड़ी रही हैं. एक समय था जब उनके पिता ने दुकान की नींव रखी थी, फिर बड़े भाई और उन्होंने इस कारोबार को आगे बढ़ाया और अब अगली पीढ़ी इसकी जिम्मेदारी निभा रही है. आज के दौर में जब लोग जल्दी तैयार होने वाले रेडीमेड कपड़ों की ओर बढ़ रहे हैं, तब भी इस दुकान पर सिलाई करवाने वालों की आवाजाही बनी हुई है. इसकी एक खास वजह कम समय में कपड़े तैयार करना भी है. दुकानदार के मुताबिक, यहां महज कुछ ही घंटों में कपड़े सिलकर तैयार कर दिए जाते हैं.करीब 100 साल से ज्यादा पुराने इस सफर में दुकान ने कई बदलाव देखे हैं.अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह कारोबार आज भी चल रहा है. रोहिणी की इस दुकान की पहचान अब सिर्फ कपड़े सिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे परिवार की मेहनत और विरासत से भी जुड़ी है, जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने काम को आगे बढ़ाया है.



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