109 साल पहले ब्रिटिश सरकार को युद्ध के लिए दिया कर्ज, पोते मांग रहे थे वापसी, UK Govt बोली- ‘कोई सबूत नहीं’

109 साल पहले ब्रिटिश सरकार को युद्ध के लिए दिया कर्ज, पोते मांग रहे थे वापसी, UK Govt बोली- ‘कोई सबूत नहीं’


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सीहोर के रुठिया परिवार के पास 4 जून 1917 का एक ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट है, जिसके मुताबिक उनके पूर्वजों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को ‘इंडियन वॉर लोन’ के तहत 35,000 रुपए का कर्ज दिया था. परिवार लंबे समय से इस पर 5.5% ब्याज के साथ पैसे की वापसी की मांग कर रहा था. अब इस पर ब्रिटेन के डेट मैनेजमेंट ऑफिस (DMO) ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि यह ब्रिटिश सरकार की कोई देनदारी थी या है.

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विवेक रुठिया ने दिखाए लोन देने के सबूत. (फाइल फोटो)

सीहोर. सीहोर के बिजनेसमैन परिवार को साल 2013 में एक डॉक्यूमेंट हाथ लगा. यह डॉक्यूमेंट उनके पूर्वजों से जुड़ा था, जिसमें दावा किया गया था कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार को 35000 रुपए का कर्ज यानी लोन दिया था. इस डॉक्यूमेंट पर 4 जून 1917 की तारीख है. यह प्रथम विश्व युद्ध का समय था. इस डॉक्यूमेंट को ‘इंडियन वॉर लोन’ का नाम दिया गया था. परिवार ने ब्रिटिश सरकार को पत्र और मेल के लिए इससे अवगत करवाया. तबसे यह मामला लगातार चर्चा में रहा है. अब इस पर ब्रिटिश सरकार ने प्रतिक्रिया दी और कहा कि उनके पास ऐसा कोई प्रूफ नहीं है.

ब्रिटेन के डेट मैनेजमेंट ऑफिस (DMO) ने कहा है कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि 109 साल पुराना ‘इंडियन वॉर लोन’ की कोई देनदारी थी या है. इस वजह से सीहोर के रुठिया परिवार का दावा अभी भी अनसुलझा है. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, DMO ने यह भी नहीं बताया कि उस पैसे का भुगतान किया गया था या नहीं. 16 अक्टूबर को भेजे गए एक ईमेल में DMO ने कहा, “हमने जांच की है, लेकिन हमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे पता चले कि जिस लोन की आप बात कर रहे हैं, वह ब्रिटिश सरकार की कोई देनदारी थी या है.”

यह जवाब सीहोर के विवेक रुठिया के परिवार के कानूनी सलाहकार श्रेयांश रानीवाला को दिया गया था. हालांकि यह ईमेल परिवार के दावे पर कोई न्यायिक फैसला नहीं है और DMO ने किसी भी बकाया कर्ज को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन इस जवाब पर सामाजिक कार्यकर्ता विनय रुठिया ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने सवाल उठाया कि ब्रिटिश अधिकारियों ने इस लोन के भुगतान या निपटारे का कोई हिसाब क्यों नहीं दिया है. रुठिया ने कहा कि परिवार ने उपलब्ध रिकॉर्ड्स की पुष्टि की है और उन्हें अपने वकील के जरिए भेजा है.

विवेक रुठिया ने तर्क दिया कि ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या यह निवेश उनके ऐतिहासिक वित्तीय रिकॉर्ड्स में दर्ज है, और अगर है, तो इस देनदारी का निपटारा कैसे किया गया. उन्होंने कहा, “अगर लोन का भुगतान किया गया था, तो इसका कोई रिकॉर्ड होना चाहिए कि यह कब और कैसे चुकाया गया. हमने उनके मांगे गए सभी दस्तावेज जमा कर दिए हैं, जिसमें वह ऐतिहासिक सर्टिफिकेट भी शामिल है. हम एक स्पष्ट जवाब चाहते हैं कि उस पैसे का क्या हुआ.”

क्या है 109 साल पुराना मामला

विवेक रुठिया ने कहा कि परिवार ने ‘इंडियन वॉर लोन’ में निवेश किए गए 35,000 रुपये की वापसी की मांग की थी. यह दावा 4 जून 1917 के एक सर्टिफिकेट पर आधारित है. इसमें भोपाल रियासत की फर्म ‘सेठ रामा किशन जसकरण रुठिया’ के सेठ जुम्मा लाल रुठिया द्वारा किए गए निवेश का जिक्र है, और इस पर उस समय भोपाल में तैनात पॉलिटिकल एजेंट डब्ल्यू. एस. डेविस के हस्ताक्षर हैं. परिवार के अनुसार, इस दस्तावेज़ पर 5.5% की दर से ब्याज मिलता था, और यह सर्टिफिकेट एक सदी से भी ज़्यादा समय से उनके कागज़ातों के बीच रखा हुआ था. सेठ जुम्मा लाल रूठिया का निधन 1937 में हुआ था, जो भारत में ब्रिटिश शासन के अंत से एक दशक पहले की बात है. यह प्रमाणपत्र परिवार को अपने दावे के लिए एक दस्तावेज़ी आधार देता है. हालाँकि, अकेले इसी दस्तावेज़ से यह साबित नहीं होता कि कोई कर्ज़ अभी भी बकाया है, या यह कि आज की यूके सरकार इसके लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार है.



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