भारत के बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट में चीन का अड़ंगा? ड्रैगन की नई चाल, टनल बोरिंग मशीनों पर शिकंजा

भारत के बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट में चीन का अड़ंगा? ड्रैगन की नई चाल, टनल बोरिंग मशीनों पर शिकंजा


चीन ने एक बार फिर अपनी चाल चली है. ये ड्रैगन की ऐसी चाल है, जिससे देश के बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट पर असर पड़ सकता है. टनल बोरिंग मशीन (TBM) के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं. मेट्रो रेल और हाइवे के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली इन भारी-भरकम मशीनों पर रोक लगाने के बाद से भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. हालांकि भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए घरेलू स्तर के साथ ही दूसरे ऑप्शन पर भी गौर कर रहा है.

भारत के लिए क्यों जरूरी हैं ये मशीनें?
रेयर अर्थ मैगनेट के निर्यात पर पाबंदी लगाकर पहले ही भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर को झटका देने वाला चीन अब TBM यानी टनल बोरिंग मशीन को लेकर सामने आया है. ये 3000 टन वजनी मशीनें भारत के कई बड़े प्रोजेक्ट्स की रीढ़ हैं. इनमें सबसे अहम देश का पहला 508 किलोमीटर लंबा बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर है, जिसमें 7 किलोमीटर लंबी समुद्र के नीचे की सुरंग भी शामिल है.

अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस्तेमाल होने वाली ये मशीनें पारंपरिक विस्फोट की तुलना में सुरंग खोदने का सुरक्षित तरीका प्रदान करती हैं. भारत जैसी घनी आबादी वाले क्षेत्रों से गुजरने वाली हाई-स्पीड रेल प्रॉजेक्ट्स के लिए ये तकनीक बेहद जरूरी है. चीन की तरफ से ये साफ हो गया है कि निर्यातकों को डुअल-यूज यानी दोहरे इस्तेमाल वाले सामानों के नियमों के तहत लाइसेंस के लिए आवेदन करना होगा. यह नया नियम 18 नवंबर से लागू हो रहा है.

भारत को पहले से ही मिल रहा था दर्द
भले ही चीन ने अब ग्लोबल लेवल पर नया लाइसेंसिंग मैकेनिज्म औपचारिक रूप से घोषित किया हो, लेकिन भारत को 2024 से ही इन मशीनों के आयात में भारी देरी का सामना करना पड़ रहा था. हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों में थोड़ी नरमी आने के बाद इसी साल मार्च में कुछ मशीनें भारत पहुंची थीं.

2 साल पहले की बात है. 2024 में दिल्ली मेट्रो की सवारी के दौरान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी के तत्कालीन वाइस चांसलर रॉबर्ट हेबेक से बातचीत में इन अड़चनों का मुद्दा उठाया था. उन्होंने बताया था कि जर्मनी की दिग्गज कंपनी Herrenknecht की तरफ से चीन में बनाई जा रही TBM की भारत को होने वाली सप्लाई को रोका जा रहा है. हेरेंकनेक्ट ने भी माना था कि चीन से भारत आने वाली मशीनों के कस्टम क्लियरेंस में ‘असाधारण बाधा’ आ रही हैं, जिससे वे अपनी डिलीवरी पूरी नहीं कर पा रहे हैं.

भारत-चीन व्यापार और बढ़ती तकरार
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस नए लाइसेंसिंग सिस्टम से चीनी सरकार को व्यापार से जुड़ी बातचीत में अधिक दबाव बनाने का मौका मिल जाएगा, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजिंग इन बैन का इस्तेमाल कैसे करता है.

  • बढ़ता व्यापार घाटा: मौजूदा फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 69 अरब डॉलर पहुंच गया है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 27 फीसदी अधिक है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही एकतरफा व्यापार संतुलन पर चिंता जता चुके हैं.
  • कड़े कदम: एक तरफ भारत पावर सेक्टर जैसे कुछ खास रणनीतिक सेक्टर में चीनी निवेश के लिए दरवाजे खोल रहा है, तो दूसरी तरफ एंटी-डंपिंग जांच भी तेज कर दी गई है. स्विस थिंकटैंक ‘ग्लोबल ट्रेड अलर्ट’ के अनुसार, जुलाई-सितंबर तिमाही में भारत ने सबसे ज्यादा 18 एंटी-डंपिंग जांच शुरू कीं, जिसमें मुख्य निशाना चीन ही था.

ग्लोबल व्यापार पर मंडराता खतरा
चीन के ये सख्त कदम ऐसे समय में सामने आए हैं, जब वो अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ हाई लेवल की बिजनस से जुड़ी बातचीत में बिजी है. अमेरिका के साथ चीन का दो महीने का ट्रेड ट्रूस यानी व्यापार में युद्ध विराम चल रहा है. वहीं यूरोपीय यूनियन की तरफ से चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और स्टील पर रोक लगाए जाने के बाद ईयू-चीन के बीच भी तनातनी जारी है.

रोडियम ग्रुप की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के देशों के विरोध के बावजूद 2025 में चीन का ग्लोबल ट्रेड सरप्लस 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था और इस साल भी इसके 1 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर रहने की उम्मीद है. रिपोर्ट में वॉर्निंग दी गई है कि चीन के बढ़ते निर्यात हिस्से के कारण अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और इंडोनेशिया जैसे बड़े देशों को ग्लोबल व्यापार में काफी नुकसान उठाना पड़ेगा.



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