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मध्य प्रदेश का बालाघाट एक ऐसा जिला है, जहां पर जिले भी भर की अलग-अलग परंपराओं की झलक दिख जाती है. यहां पर नवरात्रि भी खास रिवाजों के साथ मनाई जाती है. वहीं, दशहरे के मौके पर भगवान हनुमान का मुकुट पहन नगर में एक चल समारोह निकलता है. दरअसल, जब आस्था और इतिहास का मिलन होता है. तब एक ऐसी परंपरा का जन्म होता है, जो पीढ़ियों को पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध देत
मध्य प्रदेश का बालाघाट एक ऐसा जिला है, जहां पर जिले भी भर की अलग-अलग परंपराओं की झलक दिख जाती है. यहां पर नवरात्रि भी खास रिवाजों के साथ मनाई जाती है. वहीं, दशहरे के मौके पर भगवान हनुमान का मुकुट पहन नगर में एक चल समारोह निकलता है. दरअसल, जब आस्था और इतिहास का मिलन होता है. तब एक ऐसी परंपरा का जन्म होता है, जो पीढ़ियों को पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध देती है. बालाघाट में हर साल चमत्कारी दृश्य जीवंत हो उठता है, जिसे देख हर कोई हैरान हो जाता है.
यहां बालाघाट में सालों से ऐतिहासिक हनुमान मुकुट धारण करने की परंपरा है, जहां पर एक सामान्य व्यक्ति सवा महीने तक एक कड़ी साधना करता है और दशहरे के दिन 40 किलो से ज्यादा वजनी अष्टधातु का मुकुट सिर पर धारण कर साक्षात बजरंग बली की स्वरूप में नगर की सड़कों पर उतरता है, जिसे देख भक्त गण रोमांचित हो उठते हैं.
पानीपत से जुड़ा है इसका इतिहास
बालाघाट में यह परंपरा करीब 50 से 60 साल पहले हुई थी. इसका इतिहास अखाड़ा संस्कृति से जुड़े हैं. बालाघाट के बुजुर्ग बताते हैं कि पानी और महाराष्ट्र की ऐतिहासिक रामलीला की तर्ज पर बालाघाट में भी राम दल की स्थापना हुई थी. उस दौरान समाजसेवियों और उस्तादों ने यह तय कि जब तक राम दल की अगुवाई स्वयं पवन पुत्र हनुमान नहीं करेंगे, तब तक लंका विजय का अभियान अधूरा रहेगा. इसी सोच के साथ अष्टधातु के एक बेहद भव्य और भारी-भरकम मुकुट का निर्माण कराया गया था, जो आज बालाघाट की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है.
40 दिन तपस्या और 40 किलो भार
इस में हर साल नए साधक का चयन होता है. इसमें दशहरे से 40 दिन पहले से ही कड़ी तपस्या शुरू होती है. इसमें वह अपना संसार ही बदल लेते हैं. वह मौसम की परवाह किए बिना जमीन पर सोते हैं. वहीं, सिर्फ एक समय फलाहार करते हैं. इसके अलावा सिर्फ सात्विक भोजन करते हैं. इस दौरान वह पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं. • 40 दिनों तक नये राम मंदिर में मुकुट की घट स्थापना और अखंड ज्योति के सामने की गई साधना ही साधक को वह ‘दैवीय ऊर्जा’ देती है, जिससे 40 किलो का मुकुट भी फूलों की माला जैसा प्रतीत होने लगता है.
जब सड़क पर उतरते महाराज, तो थम जाता है बालाघाट
जब साधन हनुमान भगवान का मुकुट धारण कर निकलते हैं, तो भक्तों की भीड़ उनके पीछे चलती है. साथ शहर में आस्था का एक सैलाब निकल जाता है. एक तरफ ढोल-ताशों की थाप, गगनभेदी जयकारे और हवा लहराती गदा भी भक्तों को उत्साह से रोमांचित कर देती है. इस राम दल को देखने के लिए हिंदू-मुस्लिम सहित हर वर्ग के लोग सड़कों पर पलक-पावड़े बिछाए इंतजार करते हैं. वहीं, नगर भ्रमण के बाद दशहरा मैदान तक पहुंच रावण दहन करते हैं. वहीं, रावण दहन के बाद हनुमान जी का स्वरूप शांत होता है.