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Jora Bel Puja: बस्तर दशहरा की अनूठी परंपरा के तहत सरगीपाल गांव में प्राचीन बेल वृक्ष पर जुड़े जुड़वा बेल फलों की विधि-विधान से पूजा की गई. इसके बाद इसे जगदलपुर के मां दंतेश्वरी मंदिर ले जाया गया.
Bastar Dussehra Jora Bel Puja: बस्तर दशहरा की अनूठी परंपरा के तहत सरगीपाल गांव में प्राचीन बेल वृक्ष पर जुड़े जुड़वा बेल फलों की विधि-विधान से पूजा की गई. इस रस्म में शिव-शक्ति का स्वरूप मानकर बेल की पूजा होती है और इसे जगदलपुर के मां दंतेश्वरी मंदिर ले जाया जाता है. बस्तर के सरगीपाल गांव में बीते शुक्रवार को दशहरा पर्व की एक खास रस्म के तहत बेल पूजा संपन्न हुई. शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन बेल वृक्ष पर प्राकृतिक रूप से जुड़े जुड़वा बेल फलों की पूजा की गई. लोकमान्यता के अनुसार इन फलों में शिव-शक्ति का स्वरूप देखा जाता है.
पौराणिक कथा और परंपरा
इस परंपरा के पीछे लगभग 250 साल पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी है. कहा जाता है कि शिकार के दौरान बस्तर के राजा सरगीपाल पहुंचे थे, जहां दो कन्याओं के रूप में मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी ने उन्हें दर्शन दिए थे और बाद में दोनों देवियां इसी बेल वृक्ष के नीचे अंतर्ध्यान हो गई थीं. तभी से जुड़वा बेल फलों को देवी का स्वरूप मानकर बस्तर दशहरा में पूजा के लिए ले जाने की परंपरा चली आ रही है.
शोभायात्रा और मंदिर में स्थापना
पूजा के बाद युग्म बेल को पेड़ से उतारकर गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. इसके बाद इसे जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाकर विधिपूर्वक स्थापित किया जाता है, जहां गांव-गांव के देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है.
राजपरिवार और पुजारियों का पक्ष
राजपरिवार के सदस्य कमलचन्द्र भंजदेव ने बताया कि बेल जोड़े की पहचान कर इसे लेने के लिए यहां आते हैं और यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. जोड़ा बेल को बहुत बड़ी शक्ति का प्रतीक माना जाता है. वहीं, मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी का कहना है कि यह पूजा रियासत काल से चली आ रही है और पूजा के बाद जिस तरह बेटी की शादी के बाद उसे विदा किया जाता है, उसी तरह गांव के लोग जोड़ा बेल को विदाई देते हैं.