नई दिल्ली: कश्मीरी गेट की दुर्गा पूजा में ढाक बजाने की परंपरा 1951 में शुरू हुई थी. इस लिहाज से इस वर्ष इस परंपरा के 75 साल पूरे हो रहे हैं. इसने दिल्ली में दुर्गा पूजा के उत्सव को एक नई पहचान दी. इसके बाद दिल्ली की दूसरी दुर्गा पूजाओं में भी ढाक बजाने वाले कलाकार आने लगे. कश्मीरी गेट पूजा पंडाल में एक जगह खास तौर पर लिखा हुआ है कि यहां ढाक बजना 1951 से शुरू हुआ था. तब पहली बार ढाक बजाने वाले कोलकाता से आए थे. शुरुआत में यह पूजा रोशनपुरा के काली मंदिर में आयोजित होती थी. अब यह सिविल लाइंस में आई.पी.कॉलेज के पास बंगाली सीनियर सेकेंडरी स्कूल के कैंपेस में होती है.
आज दिल्ली में दुर्गा पूजा का विस्तार दक्षिण दिल्ली के चितरंजन पार्क से लेकर शहर के अनेक इलाकों तक हो चुका है. भव्य पंडाल, आकर्षक रोशनी और कलात्मक सजावट इस उत्सव को नया रूप दे रहे हैं. इसके बावजूद ढाक की थाप का महत्व कम नहीं हुआ है.
ढाक की थाप से जुड़ी दुर्गा पूजा
मशहूर शिक्षाविद मंजू मजूमदार कहती हैं,ढाक की आवाज के बिना दुर्गा पूजा की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसकी गहरी, गूंजती हुई थाप वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा भर देती है. जैसे ही ढाक बजता है, महसूस होने लगता है कि मां दुर्गा के आगमन का उत्सव अपने पूरे रंग में आ गया है. ढाक केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है. यह बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और दुर्गा पूजा की आत्मा का हिस्सा है.
1910 से चला आ रहा है इतिहास
इस बीच, कश्मीरी गेट की दुर्गा पूजा का इतिहास बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों तक जाता है. दिल्ली दुर्गा पूजा समिति के इतिहास के अनुसार, 1910 में यहां बंगाली समुदाय के लोगों ने सामुदायिक दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. उस समय दिल्ली में बंगाली परिवारों की संख्या सीमित थी. सरकारी नौकरियों और रेलवे जैसी सेवाओं से जुड़े अनेक बंगाली लोग राजधानी में आकर बस रहे थे. अपने घर और बंगाल से दूर रहते हुए भी वे अपनी परंपराओं से जुड़े रहना चाहते थे. इसी भावना ने सामुदायिक पूजा को जन्म दिया.
परंपरा में बसती है दिल्ली की आत्मा
कश्मीरी गेट की दुर्गा पूजा की खासियत यह है कि यहां उत्सव के साथ इतिहास भी सांस लेता है. यह पूजा उन बंगाली परिवारों की याद दिलाती है, जिन्होंने दिल्ली को अपना घर बनाया, लेकिन अपनी भाषा, खानपान, संगीत और धार्मिक परंपराओं को नहीं छोड़ा. कश्मीरी गेट की पूजा से जुड़ी एक और विशेषता इसकी पारंपरिक प्रतिमा और पुराने रीति-रिवाजों को सहेजने की कोशिश है. यहां की प्रतिमा को हमेशा की तरह बैलगाड़ी पर विसर्जन के लिए लेकर जाया जाता है. अगर ढाक से हटकर बात करें तो इस बार यहां पर अन्नपूर्णा मिष्ठान भंडार का काउंटर नहीं लगा है. इधर रसगुल्ला और मिष्ठी दही का आनंद लेने वालों की भीड़ रहती थी. फव्वारा के पास लंबे समय से चल रही बंगाली मिठाई की मशहूर दुकान अन्नपूर्णा मिष्ठान भंडार बीते साल बंद हो गई थी.
सच में भव्य होती है कश्मीरी गेट पूजा. पर आपको कहीं भी अव्यवस्था नहीं मिलेगी. इस बार यहां पर अन्नपूर्णा मिष्ठान भंडार का काउंटर नहीं लगा है. इधर रसगुल्ला और मिष्ठी दही का आनंद लेने वालों की भीड़ रहती थी. फव्वारा के पास लंबे समय से चल रही बंगाली मिठाई की मशहूर दुकान अन्नपूर्णा मिष्ठान भंडार बीते साल बंद हो गई थी. कश्मीरी गेट पूजा 1910 में आरंभ हुई थी. हालांकि कहने वाले कहते हैं कि दिल्ली में बसे कुछ प्रवासी बंगाली परिवार यहां 1842 से दुर्गा पूजा का आयोजन कर रहे हैं. जब दिल्ली देश की नई राजधानी बनी तो यहां बंगाल से बड़ी संख्या मे बंगाली भद्रलोक सरकारी दफ्तरों में कामकाज के लिए आए. वे यहां मुख्य रूप से तिमारपुर में रहने लगे. उन्होंने तिमारपुर में 1913 में पूजा शुरू की. इसे राजधानी की दूसरी पूजा माना जा सकता है. उसके बाद गोल मार्केट में दर्जनों बंगाली परिवार आए. उन्होंने 1930 से गोल मार्केट के एडवर्ड स्कवेयर,बेयर्ड रोड, सिकंदरा प्लेस वगैरह में अपनी पूजा आयोजित की.
उन्हें 1935 में काली बाड़ी बनाने के लिए स्थायी स्पेस बिड़ला मंदिर के साथ मिला. तब से वहां पर दुर्गा पूजा होने लगी. यहां मां दुर्गा की प्रतिमा कोलकाता के कालीघाट मंदिर की प्रतिकृति है. इस पूजा के 1935 में अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी रहे. इधर देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पूजा के लिए पधारा करते थे. राजधानी में 1960 के दशक तक पूजा पंडालों को बनाने के लिए कलाकार बनारस या बंगाल से ही आते थे. पुजारी भी बाहर से बुलाए जाते थे. बहरहाल, कोलकाता से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया प्रेस 1919 में दिल्ली शिफ्ट कर दी गई. उसके बंगाली मुलाजिमों ने तिमारपुर में एक और पूजा का आयोजन शुरू कर दिया. वही पूजा कुछ सालों के बाद मिन्टो रोड में होने लगी क्योंकि प्रेस मिन्टो रोड में स्थापित हो गई. ये भाजपा के हेड आफिस के करीब ही होती है. मुझे यह पूजा अपनी लगती है. मैं बचपन ही इससे जुड़ा हूं.
बहरहाल लोदी रोड ( 1944 ),करोल बाग, सरोजनी नगर और मोती बाग 1950 के दशक के शुरू में होने लगीं. दिल्ली में 1960 के दशक में हजारों की तादाद में वे बंगाली भी आए जो सरकारी नौकरियां नहीं कर रहे थे. इन्होंने डिफेंस कॉलोनी, शाहदरा, कैलाश कॉलोनी, लाजपत नगर, तिलक नगर, पटेल नगर वगैरह में पूजा आयोजित करनी शुरू कर दी.
गुजरे कुछ दशकों से राजधानी में दुर्गा पूजा का सबसे खास आयोजन ‘मिनी बंगाल’ कहे जाने वाले चितरंजन पार्क में होने लगा. इधर चार जगहों पर दुर्गा पूजा के पंडाल सजते हैं. सब एक से बढ़कर एक. अपने चितरंजन पार्क की दुर्गा पूजा में शामिल होने के लिए म्यूजिक डायरेक्टर शांतनु मोइत्रा भी दिल्ली आ जाते हैं. वे पक्के चितरंजन पार्क वाले हैं. दिल्ली-एनसीआर में बसे बंगाली परिवारों की चाहत रहती है कि वे दुर्गा पूजा के समय कम से कम एक बार तो चितरंजन पार्क घूम ही लें. उधर की पूजा की धूम के क्या कहने. सारे माहौल में उत्सव और उत्साह को महसूस किया जा सकता है. पर, चितरंजन पार्क वाले कश्मीरी गेट, मिन्टो रोड,तिमारपुर, नई दिल्ली काली बाड़ी और सरोजनी नगर में जाना पसंद करते हैं. इनमें जाने का मतलब है अपने अतीत से जुड़ना.