क्या आजादी से पहले नहीं जलता था लंकापति का पुतला? अगर ऐसा सोचते हैं तो गलत हैं, बेहद पुराना है रावण दहन का इतिहास

क्या आजादी से पहले नहीं जलता था लंकापति का पुतला? अगर ऐसा सोचते हैं तो गलत हैं, बेहद पुराना है रावण दहन का इतिहास


Ravan Dahan History Truth: आजकल लोगों के विचारों का निर्धारण सोशल मीडिया तय करने लगा है. इतना तक तो ठीक है लेकिन जब लोगों के दिमाग की धारणाएं सोशल मीडिया से तय होने लगे तो यह गंभीर चिंता का विषय है. पहला कारण यह है कि सोशल मीडिया अप्रमाणिक, अनियंत्रित और अपरिपक्व कंटेंट है. इसपर किसी का लगाम नहीं है. जैसे आम बोलचाल में कुछ भी निकल जाता है लेकिन वह लकीर नहीं बन पाता, ठीक उसी तरह से सोशल मीडिया है. किसी चीज को प्रमाणित करने के लिए गहरी रिसर्च की जरूरत है. यहां ऐसा कुछ नहीं है. इसके बावजूद कुछ लोग सोशल मीडिया से अपनी धारणाएं बना रहा है. किसी को इससे आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन जब सेंसेशन पैदा करने के लिए तथ्यात्मकता के साथ खिलवाड़ किया जाए तो सच का विद्रूप चेहरा सामने आ जाता है. आजकल सोशल मीडिया पर ऐसा ही एक सेंसेशन फैलाया जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि लंकापति रावण का पुतला 1947 के बाद से जलना शुरू हुआ. यह तथ्यात्मक रूप से गलत है.

रावण दहन की शुरुआत कब हुई

सवाल यह कि रावण दहन की शुरुआत कब से हुई. किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आगे के ग्रंथों में इसका उल्लेख न हो. मध्यकाल की कई पुस्तकों और यहां तक कि कई ब्रिटिश लाइब्रेरियों और भारत सरकार के गजट में दशहरा के दौरान रावण के पुतला दहन की कई तस्वीरें हैं. 1920 में क्वेटा में रावण दहन की तस्वीर है. 1923 और 1940 में लाहौर, 1943 में एबोटाबाद और 1940 में कराची में दशहरा के दौरान रावण दहन की तस्वीरें हैं. अब यह जानते हैं कि रावण दहन की शुरुआत कहां से हुई. इसका सटीक तारीख फिलहाल उपलब्ध नहीं है. यह गहन रिसर्च का विषय है. लेकिन मध्यकालीन पुस्तकों में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि रावण के पुतले का दहन होता था. रामायण का सबसे लोकप्रिय रूप तुलसीदास ने लिखा. तुलसीदास का समय काल 1532 से 1623 के बीच माना जाता है. साथ ही 1574 ईस्वी के आसपास रामचरितमानस की रचना का काल माना जाता है. तुलसीदास कृत रामायण बहुत जल्द ही लोकप्रिय हो गया. 50-100 साल के अंदर ही पूरे भारतीय महाद्वीप पर रामायण का डंका बजन लगे. तुलसीदास के शिष्यों ने रामायण को आम जनमानस से जोड़ने के लिए इसी समय के आसपास रामलीला का रंगमंचीय मंचन शुरू किया. तेजी से यह हमारी लोक परंपरा में रच बस गई. यह लोक परंपरा पड़ोसी थाईलैंड, कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी पहुंची. इसी रामलीला से रावण दहन की परंपरा की शुरुआत भी हुई. हालांकि यह किस तारीख को शुरू हुई इसकी सटीक तारीख बताना फिलहाल रिसर्च का विषय है.

रावण पुतला दहन का प्रमाण

सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि आज भी 1947 से पहले पैदा लिए हुए बुजुर्गों की कमी नहीं है. उनमें से किसी ने आज तक यह नहीं बताया कि दशहरा के दिन रावण दहन की परंपरा 1947 में शुरू हुई. यहां तक कि दिल्ली के लाल किले में श्री धार्मिक रामलीला कमिटी द्वारा दशहरा के दौरान रावण के दहन की परंपरा भी 1800 के आसपास से ही जारी है. ब्रिटिश शासनकाल से ही भव्य रामलीला और रावण दहन के लिखित ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं. कई अंग्रेज अधिकारियों की किताबों, सरकारी गजेटियर्स, यात्रा-वृत्तांतों और तत्कालीन समाचार पत्रों में रावण के रावण पुतला दहन का रिकॉर्ड दर्ज है. 1790 में थॉमस ट्विनिंग की किताब ट्रैवलर्स इन इंडिया इन 100 ईयर्स एगो में इसका स्पष्ट उल्लेख है. 1883-84 के दिल्ली के इम्पीरियल गजेटियर में लिखा है-

दशहरा या रामलीला का त्योहार अश्विन (सितंबर-अक्टूबर) महीने में मनाया जाता है. शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) में यमुना नदी के किनारे और लाल किले के पास रामलीला का आयोजन होता है, जहां अंतिम दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के बांस और कागज से बने विशाल पुतले आतिशबाजी के साथ जलाए जाते हैं.

इन सबके अलावा रेवरेंड एम.ए.शेरिंग की किताब द सेक्रेड सिटी ऑफ हिन्दू, आर. वी. रसेल की किताब द ट्राइव्स एंड कास्ट ऑफ सेंट्रल प्रोविंस, विलियम क्रुक की किताब द पॉपुलर रेलीजियस एंड फॉकलोर ऑफ नोदर्न इंडिया जैसी कई किताबों में रावण दहन का उल्लेख है. ये सारे ऐतिहासिक पुस्तकें और दस्तावेज इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि 1700 से बहुत पहले ही भारत में रावण दहन की परंपरा पूरी भव्यता के साथ सार्वजनिक रूप से मौजूद थी.

1947 को लेकर कंफ्यूजन क्या है

दरअसल, 1947 में जब देश आजाद हुआ तो 15 अगस्त से ही पूरे देश में ढोल, नगाड़े और आतिशबाजियां होने लगी. जगह-जगह पटाखे छोड़े गए. यह जश्न महीनों तक चलता रहा. 1947 में जब दशहरा का आयोजन हुआ तो रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले में पटाखे फिट किए गए. संभवतः यह पहली बार रावण के पुतले में पटाखे का इस्तेमाल हुआ होगा. यही कारण है कि कुछ लोगों को यह लगता है कि उसी साल से रावण के पुतले का दहन हुआ होगा. यह पूरी तरह से गलत है.

रामायण में क्या कहा गया है

भारत में अनेको रामायण की रचना हुई है. इनमें बाल्मिकी रामायण को प्रमुख माना जाता है. वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के 109 वें सर्ग में एक श्लोक है. मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्। इसका अर्थ है कि जब विभीषण अपने भाई रावण की मौत पर उनके शव के समीप जाते हैं तो प्रभु श्रीराम उन्हें कहते हैं कि शत्रुता की सीमा मृत्यु तक ही होती है. हमारा उद्देश्य रावण का वध कर धर्म की स्थापना करना था. वह पूरा हो चुका है. इसलिए अब तुम इसका अंतिम संस्कार करो. यह रावण जितना तुम्हारा भाई है, उतना ही मेरा भी है. श्रीराम के इन वचनों से प्रेरणा पाकर और उनकी आज्ञा से विभीषण ने अपने कुल की परंपरा के अनुसार रावण का विधिवत दाह-संस्कार और अंतिम क्रियाकर्म संपन्न किया. दूसरी तरफ रावण की हत्या के बाद वानर सेना और चराचर जगत के देवता तक प्रसन्न थे. वाल्मीकि रामायण में रावण की मौत के बाद वानरों की सेना में हर्ष की कोई सीमा नहीं थी. यहां तक कि देवताओं द्वारा आसमान से जयघोष करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है.

वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड 108वें सर्ग में 26 और 27 वां श्लोक है.

ततो नदन्तः संहृष्टा वानरा जितकाशिनः।
वदन्तो राघवाजयं रावणस्य च तद्वधम्॥
अथारिक्षे व्यनदत्सौम्यस्त्रिदशदुन्दुभिः।
दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववाउ॥

इस श्लोक का संक्षेप में अर्थ है-रावण के मारे जाने पर विजयी और प्रसन्न वानर दल श्रीराम की जय-जयकार करने लगे. वे सब रावण के वध की घोषणा करते हुए हर्षोल्लास के साथ जयकारे लगाने लगे. उसी समय आकाश में देवताओं के नगाड़े बज उठे, दुन्दुभि गूंज उठी और वहां चारों तरफ सुगंधित, ठंडी एवं सुखद हवा बहने लगी. इससे साफ है कि रावण की मौत के बाद आमजन भी जश्न में डूब गए होंगे.



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