ऐक्टर टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया है. लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े अनिल पंडित ने घटना की जिम्मेदारी ले ली. तीनों शूटर्स पुलिस की गिरफ्त में हैं. अब उन पर कानूनी कार्रवाई होगी. ऐसे में यह जान लेते हैं कि भारत में अगर किसी इंसान को गोली मारी जाती है, तो आरोपी के खिलाफ कौन सा ऐक्शन लिया जा सकता है. सिर्फ एक धारा में नहीं, बल्कि घटना की परिस्थितियों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और आर्म्स ऐक्ट, 1959 की कई धाराओं में केस दर्ज हो सकता है. गोली लगने से व्यक्ति की मौत हुई या वह घायल हुआ? आरोपी का इरादा क्या था? कितनी गोलियां चलाई गईं, हथियार लाइसेंसी था या अवैध और घटना आत्मरक्षा में हुई या नहीं? इन सभी बातों से धाराएं तय होती हैं.
फायरिंग से जुड़ी घटना में पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि आरोपी ने जान से मारने की कोशिश की थी, गंभीर चोट पहुंचाई थी या गोली चलने से किसी की मौत हो गई? इन्हीं फैक्ट्स के आधार पर हत्या, हत्या के प्रयास, गंभीर चोट और हथियार के गैरकानूनी इस्तेमाल से जुड़ी धाराएं लगाई जा सकती हैं. हत्या के लिए पुरानी IPC की जो धारा 302 लगती थी, उसकी जगह ही BNS की धारा 103 है. वहीं हत्या के प्रयास में IPC की धारा 307 की जगह पर BNS की धारा 109 लागू होती है. हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सिर्फ गोली लग जाने से हर मामले में हत्या के प्रयास की धारा लगना जरूरी नहीं है. पुलिस को घटनास्थल के सबूत, मेडिकल रिपोर्ट, इस्तेमाल किए गए हथियार, गोली चलाने के तरीके, आरोपी के इरादे और दूसरे गवाहों के बयान के आधार पर अपराध को तय करना होता है.
गोली मारने के मामले में BNS की कौन-सी धाराएं लग सकती हैं?
- 109 BNS यानी हत्या का प्रयास: अगर आरोपी ने जान लेने के इरादे से गोली चलाई, लेकिन पीड़ित की मौत नहीं हुई, तो BNS की धारा 109 लग सकती है. इस धारा में सामान्य तौर पर 10 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है. इस काम से अगर किसी को चोट पहुंचती है, तो आजीवन जेल या निर्धारित अवधि की कैद और जुर्माना हो सकता है.
- 103 BNS यानी मर्डर: गोली लगने से व्यक्ति की मौत हो जाए और घटना के तथ्य BNS के तहत हत्या की परिभाषा में आते हों, तो धारा 103 लग सकती है. इसकी सजा मृत्युदंड या आजीवन कैद और जुर्माना है. हर गोली से हुई मौत अपने आप हत्या नहीं होती. कुछ मामलों में अपराध की प्रकृति के अनुसार दूसरी धारा लागू हो सकती है.
- 105 BNS यानी गैर-इरादतन हत्या: गोली चलने से अगर मौत हुई, लेकिन मामले की परिस्थितियां कानूनी रूप से हत्या की कैटिगरी में नहीं आतीं, तो धारा 105 पर विचार किया जा सकता है. सजा इरादे और जानकारी जैसे फैक्ट्स के आधार पर तय होती है.
- 118 BNS खतरनाक हथियार से चोट पहुंचाना: गोली लगने से चोट आई है, तो परिस्थितियों के अनुसार धारा 118(1) लागू हो सकती है. इसमें तीन साल तक की कैद, 20 हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. अगर गोली से ऐसी गंभीर चोट आई है जो कानून में Grievous Hurt यानी गंभीर चोट के दायरे में आती है, तो धारा 118(2) लागू हो सकती है, जिसमें आजीवन कारावास या एक से दस साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है.
- 115/117 BNS स्वेच्छा से चोट या गंभीर चोट पहुंचाना: धारा 115 चोट पहुंचाने और धारा 117 गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित है. लेकिन गोली जैसे खतरनाक हथियार का इस्तेमाल होने पर धारा 118 अधिक सीधे तौर पर प्रासंगिक हो सकती है. सही धारा चोट की प्रकृति और मामले के फैक्ट्स से तय होगी.
पुरानी IPC और नई BNS की धाराओं में क्या अंतर है?
हत्या के लिए पुरानी IPC की जो धारा 302 लगती थी, उसके समकक्ष ही BNS की धारा 103 है. वहीं हत्या के प्रयास में IPC की धारा 307 की जगह पर BNS की धारा 109 लागू होती है. खतरनाक हथियार से चोट के लिए आईपीसी की 324 धारा की जगह बीएनएस की 118(1) धारा लागू होती है. किसी को चोट पहुंचाने के लिए आईपीसी की धारा 323 की जगह पर बीएनएस की 115(2) लगती है.
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सिर्फ गोली लग जाने से हर मामले में हत्या के प्रयास की धारा लगना जरूरी नहीं है. पुलिस को घटनास्थल के सबूत, मेडिकल रिपोर्ट, इस्तेमाल किए गए हथियार, गोली चलाने के तरीके, आरोपी के इरादे और दूसरे गवाहों के बयान के आधार पर अपराध को तय करना होता है.
आर्म्स ऐक्ट की कौन-सी धाराएं लगेंगी?
गोली चलाने के मामले में BNS के साथ Arms Act, 1959 यानी आर्म्स ऐक्ट के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं. यहां यह देखना जरूरी होता है कि हथियार किस तरह का था, उसके लिए वैध लाइसेंस था या नहीं, उसका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया गया और क्या वह प्रतिबंधित कैटिगरी का हथियार था.
- 27 आर्म्स ऐक्ट: इसके तहत हथियार के इस्तेमाल पर सजा का प्रावधान है. आर्म्स ऐक्ट की धारा 27 हथियारों और गोला-बारूद के इस्तेमाल से संबंधित है. धारा 5 का उल्लंघन करके हथियार इस्तेमाल करने पर सामान्य तौर पर तीन से सात साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है. बैन हुए हथियारों से संबंधित धारा 7 का उल्लंघन होने पर धारा 27(2) के तहत सात साल से आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. अगर प्रतिबंधित हथियार के गैरकानूनी इस्तेमाल से किसी की मौत हो जाए, तो धारा 27(3) के तहत आजीवन कारावास या मृत्युदंड और जुर्माने का प्रावधान है.
- 25 आर्म्स ऐक्ट: इसके तहत अवैध हथियार रखने या हासिल करने पर सजा मिलती है. यह धारा कई तरह के हथियार संबंधी उल्लंघनों पर लागू होती है. उदाहरण के लिए, धारा 3 के तहत जरूरी लाइसेंस के बिना फायर आर्म्स रखना या लेकर चलना, संबंधित कानूनी शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में धारा 25 के दायरे में आ सकता है. हर अवैध हथियार के मामले में एक ही सजा नहीं होती.
- 30 आर्म्स ऐक्ट: इसमें लाइसेंस की शर्तों या नियमों का उल्लंघन होने पर सजा मिलती है. अगर हथियार लाइसेंसी है, लेकिन उसके लाइसेंस की किसी शर्त या ऐक्ट के ऐसे प्रावधान का उल्लंघन हुआ है जिसके लिए अलग से सजा निर्धारित नहीं है, तो धारा 30 लागू हो सकती है. इसके तहत छह महीने तक की कैद, 2 हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.
क्या लाइसेंसी पिस्टल से गोली चलाने पर भी आर्म्स ऐक्ट लगेगा?
हथियार का लाइसेंसी होना अपने आप में गोली चलाने को कानूनी नहीं बना देता. लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि हर लाइसेंसी हथियार से गोली चलाने पर आर्म्स ऐक्ट की धारा 25 या 27 खुद-ब-खुद लग जाए.
पुलिस को यह देखना होगा कि हथियार का इस्तेमाल किस कानूनी प्रावधान के उल्लंघन में हुआ. अगर गोली चलाना सेल्फ डिफेंस की सीमा में था, तो उसका आंकलन भी अलग होगा. दूसरी ओर किसी इंसान पर जानबूझकर हमला करने के मामले में BNS के तहत आपराधिक कार्रवाई हो सकती है, भले ही हथियार का लाइसेंस वैध हो.
क्या गोली लगने के बाद FIR में हत्या के प्रयास की धारा जरूरी है?
नहीं. यह अपने आप में अनिवार्य नियम नहीं है. गोली लगना एक महत्वपूर्ण सबूत है, लेकिन पुलिस को यह भी देखना होता है कि गोली कैसे चली? किस दिशा में चलाई गई? आरोपी और पीड़ित के बीच क्या हुआ? मेडिकल रिपोर्ट में किस तरह की चोट दर्ज है और घटना से जुड़े दूसरे सबूत क्या कहते हैं? वो कैसे, इसको उदाहरण से समझते हैं.
- जान से मारने का इरादा: आरोपी ने पीड़ित को मारने के मकसद से गोली चलाई, लेकिन पीड़ित बच गया. ऐसे मामले में BNS 109 पर विचार किया जा सकता है.
- गंभीर चोट: गोली से गंभीर चोट आई, लेकिन हत्या के प्रयास के जरूरी तत्व साबित नहीं होते हैं. ऐसे में BNS 118(2) समेत दूसरे जरूरी प्रावधान लागू हो सकते हैं.
- मौत: इंसान की मौत होने पर BNS 103 या परिस्थितियों के अनुसार, BNS 105 लागू हो सकती है.
- हथियार का गैरकानूनी इस्तेमाल: लाइसेंस, हथियार की कैटिगरी और इस्तेमाल की परिस्थितियों के आधार पर आर्म्स ऐक्ट की संबंधित धारा भी जोड़ी जा सकती है.
ये धाराएं एक-दूसरे से पूरी तरह अलग ऑप्शन नहीं हैं. एक ही घटना में BNS और आर्म्स ऐक्ट के प्रावधान साथ लागू हो सकते हैं, बशर्ते उनके कानूनी फैक्टर पूरे हों.
क्या आरोपी को जमानत मिल सकती है?
हत्या, हत्या के प्रयास और खतरनाक हथियार से गंभीर चोट जैसे मामलों में जमानत का सवाल अपराध की लागू धाराओं, आरोपों, सबूत और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है. BNS की धारा 109 के तहत हत्या का प्रयास सामान्यतः गैर-जमानती अपराध है. आर्म्स ऐक्ट के तहत भी लागू उपखंड के अनुसार अपराध की प्रकृति और जमानत की स्थिति बदल सकती है.
गैर-जमानती अपराध का मतलब यह नहीं है कि जमानत कभी मिल ही नहीं सकती. इसका मतलब है कि जमानत अपने आप अधिकार के रूप में नहीं मिलती और सक्षम अदालत या अथॉरिटी कानून के मुताबिक फैसला करता है.
फायरिंग में पुलिस किन सबूतों की जांच करती है?
गोली मारने से जुड़ी किसी घटना के मामले में पुलिस आमतौर पर कुछ सबूतों की जांच करती है. इन सबूतों से यह तय करने में मदद मिलती है कि घटना हत्या का प्रयास थी, हत्या थी, गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध था या कोई अन्य अपराध. आइए समझते हैं.
- घटनास्थल से मिले कारतूस, खोखे और अन्य सबूत.
- बरामद हथियार और उसकी फॉरेंसिक जांच.
- मेडिकल रिपोर्ट, चोटों की प्रकृति और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट. अगर मौत हुई हो तो.
- CCTV फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और डिजिटल सबूत.
- आरोपी और पीड़ित के बीच पुरानी रंजिश या घटना से पहले की परिस्थिति.
- हथियार का लाइसेंस, स्वामित्व और इस्तेमाल की वैलिडिटी.
किसी को गोली मारने के मामले में मुख्य कानूनी धाराएं घटना के नतीजे और आरोपी के इरादे के अनुसार बदलती हैं. सामान्य तौर पर हत्या के प्रयास के लिए BNS 109, हत्या के लिए BNS 103, खतरनाक हथियार से चोट के लिए BNS 118 और हथियार संबंधी उल्लंघन के लिए आर्म्स ऐक्ट की धारा 25 या 27 ही अहम हैं.