अमेरिका ने रूस का तेल खरीदने पर टैरिफ से छूट दे रखी है. ऐसे में आपके भी मन में सवाल होगा कि जब रूस का तेल बेधड़क मार्केट में आ रहा है, किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है, तो फिर क्रूड यानी कच्चा तेल अचानक 110 डॉलर के पार कैसे चला गया? क्या है इसके पीछे की कहानी? कहीं ऐसा तो नहीं तो अमेरिका को परेशान करने के लिए ओपेक देशों से यह खेल रचा हो?
दरअसल, इसके पीछे ऑयल मार्केट का गेम है. मान लीजिए आपके गांव में गेहूं की फसल बहुत अच्छी हुई है. सरकार ने भी कह दिया है कि आप अपना गेहूं शहर की मंडी में बेच सकते हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि शहर जाने वाली मुख्य सड़क पर कुछ उपद्रवियों ने कब्जा कर लिया है, आपके पास गेहूं पीसने वाली चक्की खराब पड़ी है. जो थोड़ी-बहुत सड़क बची है, वहां से गुजरने वाले ट्रैक्टर वालों से दोगुना भाड़ा मांगा जा रहा है. ऐसी स्थिति में क्या मंडी में आटा सस्ता होगा? बिल्कुल नहीं.
रूस की रिफाइनरी खराब, तुरंत तेल नहीं आ सकता
अमेरिका ने रूस को डीजल बेचने की छूट दी है. रूस ने 10 अक्टूबर से पाबंदियां हटानी शुरू कीं और 15 अक्टूबर तक उसका डीजल अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचने लगा. एक जहाज 40 हजार टन डीजल लेकर मोरक्को भी निकल गया.
सऊदी अरब की पाइपलाइन पर हमले का खौफ
अमेरिकी एनर्जी एजेंसी ईआईए के अनुसार, हमले से पहले इस पाइपलाइन से रोज 50 लाख बैरल तेल गुजर रहा था. हमले के बाद सप्लाई टूटी और 15 सितंबर को कच्चे तेल का भाव 131 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गया था. हालांकि 6 अक्टूबर तक यह सप्लाई सुधरकर 58 लाख बैरल रोजाना (कुल क्षमता 70 लाख बैरल) तक पहुंच गई, लेकिन खौफ अभी भी बना हुआ है. तेल के व्यापारी सिर्फ आज का तेल नहीं देखते, वे कल की चिंता करते हैं. उन्हें डर है कि अगर सऊदी के कुंओं या पाइपलाइन पर फिर से हमला हुआ, तो दुनिया में तेल का अकाल पड़ जाएगा.
होर्मुज पर नाकेबंदी का डर
सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े देशों का तेल होर्मुज के रास्ते से दुनिया भर में जाता है. यहां जहाजों पर हमले हो रहे हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक- जहाजों पर हमलों के डर से इस रास्ते से कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह गिर गई है. जो सप्लाई पहले 2 करोड़ बैरल प्रतिदिन हुआ करती थी, वह सात दिन के औसत में घटकर महज 85 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई है.
जब समुद्र में जहाजों पर हमले का डर होता है, तो जहाज के मालिक लंबा और सुरक्षित रास्ता चुनते हैं, जिससे ढुलाई का भाड़ा बढ़ जाता है. बीमा कंपनियां ऐसे खतरनाक रास्तों पर जाने वाले जहाजों का प्रीमियम (बीमे की रकम) बहुत ज्यादा बढ़ा देती हैं. यह सारा बढ़ा हुआ खर्च आखिरकार कच्चे तेल की कीमत में जुड़ जाता है.
तेल मतलब डर का सौदा
तेल का बाजार बहुत हद तक फ्चूयर पर चलता है. मान लीजिए अगर गांव में यह अफवाह उड़ जाए कि अगले हफ्ते से नमक नहीं मिलेगा, तो लोग आज ही दोगुने दाम पर बोरियां घर में भरने लगेंगे. हमारे यहां ये होता रहा है. यही काम तेल की बड़ी कंपनियां करती रही हैं. IEA की रिपोर्ट बताती है कि सितंबर के आखिर तक दुनिया के पास जो तेल का इमरजेंसी भंडार होता है, वह फरवरी के मुकाबले लगभग 50.9 करोड़ बैरल कम हो चुका है. यानी दुनिया के पास बुरे वक्त के लिए बचाकर रखा गया तेल पहले से बहुत कम है. अगर खाड़ी देशों में हमले और युद्ध यूं ही चलते रहे, तो सप्लाई किसी भी दिन ठप हो सकती है. इस डर की वजह से खरीदार आज ही ज्यादा पैसे देकर तेल का जुगाड़ कर रहे हैं. इकॉनमी में इसे रिस्क प्रीमियम कहते हैं.
भारत और आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर होगा?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर या 108 डॉलर के आसपास रहता है, तो भारत को यह तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं. अगर ऐसे समय में हमारा रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाए, तो भारत सरकार और तेल कंपनियों का खर्च और ज्यादा बढ़ जाता है. रॉयटर्स की रिपोर्ट ने भी माना है कि महंगे तेल की वजह से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ रहा है.
तो क्या पेट्रोल पंप पर दाम बढ़ जाएंगे?
जरूरी नहीं है. पेट्रोल और डीजल का दाम सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होता.कई बार सरकारें जनता को महंगाई से बचाने के लिए टैक्स घटा देती हैं या तेल कंपनियों को कुछ समय के लिए नुकसान सहने को कहती हैं. इसलिए 110 डॉलर का क्रूड होने का सीधा मतलब यह नहीं है कि आपको तुरंत महंगा पेट्रोल खरीदना पड़ेगा, लेकिन अगर यह संकट लंबे समय तक चला, तो इसका बोझ देर-सबेर आम जनता की जेब पर आ ही जाता है.