Bhavsar Samaj Dussehra: देशभर में दशहरा रावण दहन के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन में भावसार क्षत्रिय समाज की परंपरा कुछ अलग है. यहां दशहरा तब मनाया जाता है, जब भगवान नृसिंह अपने अवतार में हिरण्यकश्यप का वध करते हैं. इस परंपरा की शुरुआत करीब 408 साल पहले पूर्वजों ने की थी, जिसे समाज के लोग आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभा रहे हैं. नवरात्रि की अष्टमी और नवमी की रात माता की सवारी, जलता हुआ खप्पर, पारंपरिक गरबियां और देवी-देवताओं के स्वांग इस आयोजन को खास बनाते हैं. इसकी एक और विशेषता यह है कि एक ही परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
खरगोन में अष्टमी की रात भावसार समाज की परंपरा के तहत मां अंबे की सवारी निकाली गई. रविवार की मध्यरात्रि से शुरू हुए आयोजन में सोमवार तड़के करीब सवा 4 बजे मां अंबे अपने विशेष स्वरूप में प्रकट हुईं. माता के एक हाथ में जलता हुआ खप्पर और दूसरे हाथ में तलवार थी. सजी-धजी सवारी के साथ माता ने निमाड़ी गरबियों पर करीब 40 मिनट तक नृत्य किया. इस दौरान श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते रहे और पूरा परिसर भक्तिमय हो गया.
यह आयोजन भावसार मोहल्ले में स्थित श्री सिद्धनाथ महादेव मंदिर परिसर में हुआ. परंपरा की शुरुआत करीब 400 साल पुराने झाड़ की विशेष पूजा-अर्चना से की गई. इसके बाद भगवान श्रीगणेश की सवारी निकाली गई और फिर माता अंबे के दर्शन हुए. आयोजन में समाज के लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए.
चार दशक पहले पूर्वजों ने शुरू की परंपरा
खप्पर आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. मोहन भावसार ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत उनके पूर्वजों ने की थी. तब से समाज के लोग इसे अपनी धरोहर मानकर निभा रहे हैं. पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन आयोजन से जुड़ी आस्था और परंपराओं को बनाए रखा गया है. करीब 408 साल पुराने खंभे यानी झाड़ पर दीपक जलाने की परंपरा आज भी कायम है. देवी-देवताओं की वेशभूषा, शस्त्र और मुखौटे भी पुराने स्वरूप में सुरक्षित रखे गए हैं. समाज के लोग इनका उपयोग कर परंपरागत तरीके से आयोजन करते हैं. आधुनिक दौर में साउंड सिस्टम के दौर में भी पारंपरिक ढोलक, झांझ-मंजीरे और निमाड़ी गरबियों का महत्व आज भी बना हुआ है.
नवमी की रात निकलेगी मां महाकाली की सवारी
आज नवमी की रात मां महाकाली की सवारी निकाली जाएगी. यह खप्पर परंपरा का सबसे खास पल होता है. मां महाकाली अपने विशेष स्वरूप में हाथ में तलवार लेकर भक्तों को दर्शन देंगी. इस दौरान समाज के लोग देवी-देवताओं का रूप धारण कर पारंपरिक प्रस्तुतियां देंगे. ब्रह्म मुहूर्त में, करीब सुबह 3 से 5 बजे के बीच, भगवान नृसिंह की सवारी भी निकलेगी. इस दौरान हिरण्यकश्यप वध का मंचन किया जाएगा.
हिरण्यकश्यप वध के बाद मनाया जाता है दशहरा
भावसार क्षत्रिय समाज में दशहरा मनाने का तरीका भी अनूठा है. यहां भगवान नृसिंह के प्रकट होने और हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है. इस दौरान भक्त प्रहलाद से जुड़ी परंपरा का स्मरण किया जाता है. बरहाल, जहां देश के कई हिस्सों में दशहरे का मुख्य आकर्षण रावण दहन होता है, वहीं खरगोन के भावसार समाज में भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप के वध के बाद ही दशहरा मनाया जायेगा.
देशभर में दशहरा रावण दहन के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन में भावसार क्षत्रिय समाज की परंपरा कुछ अलग है. यहां दशहरा तब मनाया जाता है, जब भगवान नृसिंह अपने अवतार में हिरण्यकश्यप का वध करते हैं. इस परंपरा की शुरुआत करीब 408 साल पहले पूर्वजों ने की थी, जिसे समाज के लोग आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभा रहे हैं. नवरात्रि की अष्टमी और नवमी की रात माता की सवारी, जलता हुआ खप्पर, पारंपरिक गरबियां और देवी-देवताओं के स्वांग इस आयोजन को खास बनाते हैं. इसकी एक और विशेषता यह है कि एक ही परिवार के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
खरगोन में अष्टमी की रात भावसार समाज की परंपरा के तहत मां अंबे की सवारी निकाली गई. रविवार की मध्यरात्रि से शुरू हुए आयोजन में सोमवार तड़के करीब सवा 4 बजे मां अंबे अपने विशेष स्वरूप में प्रकट हुईं. माता के एक हाथ में जलता हुआ खप्पर और दूसरे हाथ में तलवार थी. सजी-धजी सवारी के साथ माता ने निमाड़ी गरबियों पर करीब 40 मिनट तक नृत्य किया. इस दौरान श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते रहे और पूरा परिसर भक्तिमय हो गया.
यह आयोजन भावसार मोहल्ले में स्थित श्री सिद्धनाथ महादेव मंदिर परिसर में हुआ. परंपरा की शुरुआत करीब 400 साल पुराने झाड़ की विशेष पूजा-अर्चना से की गई. इसके बाद भगवान श्रीगणेश की सवारी निकाली गई और फिर माता अंबे के दर्शन हुए. आयोजन में समाज के लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए.
चार दशक पहले पूर्वजों ने शुरू की परंपरा
खप्पर आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. मोहन भावसार ने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत उनके पूर्वजों ने की थी. तब से समाज के लोग इसे अपनी धरोहर मानकर निभा रहे हैं. पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन आयोजन से जुड़ी आस्था और परंपराओं को बनाए रखा गया है. करीब 408 साल पुराने खंभे यानी झाड़ पर दीपक जलाने की परंपरा आज भी कायम है. देवी-देवताओं की वेशभूषा, शस्त्र और मुखौटे भी पुराने स्वरूप में सुरक्षित रखे गए हैं. समाज के लोग इनका उपयोग कर परंपरागत तरीके से आयोजन करते हैं. आधुनिक दौर में साउंड सिस्टम के दौर में भी पारंपरिक ढोलक, झांझ-मंजीरे और निमाड़ी गरबियों का महत्व आज भी बना हुआ है.
नवमी की रात निकलेगी मां महाकाली की सवारी
आज नवमी की रात मां महाकाली की सवारी निकाली जाएगी. यह खप्पर परंपरा का सबसे खास पल होता है. मां महाकाली अपने विशेष स्वरूप में हाथ में तलवार लेकर भक्तों को दर्शन देंगी. इस दौरान समाज के लोग देवी-देवताओं का रूप धारण कर पारंपरिक प्रस्तुतियां देंगे. ब्रह्म मुहूर्त में, करीब सुबह 3 से 5 बजे के बीच, भगवान नृसिंह की सवारी भी निकलेगी. इस दौरान हिरण्यकश्यप वध का मंचन किया जाएगा.
हिरण्यकश्यप वध के बाद मनाया जाता है दशहरा
भावसार क्षत्रिय समाज में दशहरा मनाने का तरीका भी अनूठा है. यहां भगवान नृसिंह के प्रकट होने और हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है. इस दौरान भक्त प्रहलाद से जुड़ी परंपरा का स्मरण किया जाता है. बरहाल, जहां देश के कई हिस्सों में दशहरे का मुख्य आकर्षण रावण दहन होता है, वहीं खरगोन के भावसार समाज में भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप के वध के बाद ही दशहरा मनाया जायेगा.