भारत का सपना, रूस का साथ… कहानी भिलाई स्टील प्लांट की, जहां बनीं पटरियों से चांद तक पहुंच जाएगी ट्रेन

भारत का सपना, रूस का साथ… कहानी भिलाई स्टील प्लांट की, जहां बनीं पटरियों से चांद तक पहुंच जाएगी ट्रेन


क्या आप दुनिया के 13 चक्कर लगाने की कल्पना कर सकते हैं. आप भले ही ऐसा न कर पाएं मगर भारत की शान भिलाई स्टील प्लांट 2020 में ही ऐसा कर चुका है. यहां अब तक इतने रेलवे ट्रैक बन चुके हैं, जिन्हें साथ जोड़ दिया जाए तो दुनिया के 13 चक्कर लग सकते हैं. सिर्फ इतना ही नहीं ये रेलवे ट्रैक इतना लंबा है कि इसे चांद तक बिछाया जा सकता है. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में प्लांट का नाम तभी दर्ज हो गया था जब उसने धरती के 7 चक्कर लगाने लायक रेलवे ट्रैक का निर्माण किया था. शहर के सेक्टर-10 में बना रेल चौक इसका गवाह है. भारत के इस ऐतिहासिक प्लांट की कहानी इतनी भर नहीं है.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का भिलाई स्टील प्लांट इन दिनों चर्चा में है. विपक्षी दल दावा कर रहे हैं कि इस प्लांट की बिक्री होने जा रही हैं. स्टील मिनिस्ट्री ने इस अफवाह पर विराम लगा दिया है और ये साफ कर दिया है कि प्लांट की बिक्री का दावा पूरी तरह निराधार और भ्रामक है. इस्पात मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर अपने आधिकारिक हैंडल से इस तरह की अफवाहों से बचने की अपील की है.

धरती से चांद तक बिछ जाएगा रेलवे ट्रैक

भिलाई स्टील प्लांट 2020 में ही तकरीबन 5 लाख किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक का निर्माण कर चुका है. 21 फरवरी 2020 को स्टील मिनिस्ट्री के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर इसका दावा किया गया था. सबसे खास बात ये है कि ये चांद की धरती से दूरी से भी कहीं ज्यादा है. अगर धरती से चांद की दूरी देखें तो यह औसतन 3 लाख 84400 है. यानी अगर धरती से रेल पटरियों को सीधे बिछाया जाए तो चांद के आगे तक बिछ जाएंगीं. इसके बाद भी लाखों किलोमीटर पटरी बच जाएगी.

स्टील मिनिस्ट्री द्वारा 2020 में की गई पोस्ट, जिसमें दावा किया गया कि प्लांट में इतने रेलवे ट्रैक बने हैं, जो धरती का 13 बार चक्कर लगा सकते हैं.

भारत के सपने की उड़ान है भिलाई प्लांट

आजादी के बाद जब भारत के सामने देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की चुनौती थी. उस समय रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के सहयोग से इसकी स्थापना की गई थी. फरवरी 1955 को भारत सरकार और सोवियत संघ के बीच दिल्ली में ऐतिहासिक समझौता हुआ था. इसमें तय किया गया कि पंचवर्षीय योजना के तहत प्लांट को स्थापित किया जाएगा. छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के भिलाई में इस प्लांट को लगाने का फैसला हुआ.

4 फरवरी 1959 को प्लांट की पहली ब्लास्ट फर्नेस यानी भट्टी का उत्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया और पहली बार पिघला हुआ लोहा बाहर आया. तब से लेकर अब तक ये प्लांट भारतीय रेलवे की रीढ़ है. बेशक अब निजी स्टील फैक्ट्रियां भी रेलवे ट्रैक बना रही हैं, मगर आज भी रेलवे अब 90 प्रतिशत ट्रैक की जरूरत इसी प्लांट से पूरी करता है.

एशिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट होने का कीर्तिमान

रेलवे को भारत की जीवनरेखा कहता हैं और इस जीवनरेखा की लाइफलाइन भिलाई स्टील प्लांट है. सिर्फ रेलवे ही नहीं बल्कि कई शहरों में मैट्रो के ट्रैक्स बनाने वाला यही प्लांट है. चाहे प्रोडक्शन की बात हो या फिर बिक्री की. इसे एशिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट होने का गौरव प्राप्त है.

भिलाई को ही क्यों चुना गया था

स्टील प्लांट के लिए उस समय भिलाई को इसलिए चुना गया था, क्योंकि यहां आसानी से वो खनिज उपलब्ध थे जो प्लांट के लिए जरूरी है. यहां राजहररा माइंस से लोहा मंगाया जाता है जो महज 100 किमी दूरी पर स्थित है. लाइम स्टोन 35 किमी दूर नंदिनी माइंस से आता है और 140 किमी दूर हिर्री से डोलोमाइट की सप्लाई होती है.

INS विक्रांत का बेस बनाने वाला प्लांट

भारत का गौरवशाली आईएनएस युद्धपोत का बेस भिलाई स्टील प्लांट की ही देन है. यह सिर्फ युद्धपोत नहीं बल्कि समुद्र में तैरता एक शहर है जो हर तकनीक से लैस है. इस विमानवाहक पोत के निर्माण के लिए जिस विशेष प्रकार की स्टील का प्रयोग किया गया है पहले उसे रूस से लिया जाना था. मगर जब वहां से सकारात्मक जवाब नहीं आया तो ये स्टील भिलाई स्टील प्लांट में तैयार की गईं. दुर्गापुर और राउरकेला प्लांट भी इसमें सहयोगी बने थे.

25 पीएम ट्रॉफी में से 11 जीतीं

भिलाई स्टील प्लांट ने अब तक 11 बार बेस्ट इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट के लिए दी जाने वाली पीएम ट्रॉफी जीती है. इस ट्रॉफी की शुरुआत 1992-93 में हुई थी. शुरुआती लगातार दो ट्रॉफियां जीतने के अलावा प्लांट ने 1995 से 1998 तक लगातार तीन बार ये ट्रॉफी जीती थी. इसके बाद 2003 से 2010 तक लगातार पांच बार भिलाई स्टील प्लांट ने ये कारनामा किया था. अब तक 25 बार दी गई इस ट्रॉफी में भिलाई प्लांट और जमशेदपुर स्थित टाटा प्लांट ही ऐसे हैं जो 11-11 बार यह ट्रॉफी जीत चुके हैं. आखिरी बार ये पीएम ट्रॉफी 2016-17 में घोषित की गई थी, उसी साल टाटा स्टील ने भिलाई की बराबरी की थी. उसके बाद से इस ट्रॉफी का ऐलान नहीं हुआ. ये पुरस्कार स्टील प्लांट को बेहतरीन उत्पादन, नवाचार और ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट के लिए दी जाती हैं.



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