Italy-France Protests: यूरोप में इस वक्त जिस तरह की स्थिति बनी हुई है, ये कोई अभी-अभी पैदा नहीं हुई है. इसकी जड़ें पुरानी हैं और एक ऐसे देश के नेता ने इसकी भविष्यवाणी की थी, जो खुद एक मुस्लिम देश में रहते हैं. जहां शरिया लागू और इस्लाम की प्रैक्टिस होती है, बावजूद इसके उन्होंने यूरोप में कट्टरपंथ को लेकर साल 2017 में ही जो भविष्यवाणी की थी, वो वैसी की वैसी ही सच साबित हुई है. इटली और फ्रांस जल रहे हैं और इसके पीछे वजह कोई तत्काल की नहीं है बल्कि सुलग रही एक चिंगारी है, जो धीरे-धीरे आग बन गई.
फ्रांस और इटली में एक हफ्ते के अंदर सड़कों पर उतरा जनआक्रोश महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं की शिकायतों से शुरू हुआ लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह सिर्फ तत्कालीन मुद्दों का विरोध नहीं है. यह लंबे समय से सुलग रही सामाजिक और सांस्कृतिक तनाव की आग है, जो अब किसी और बहाने से भड़क उठी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कुछ दिन पहले फ्रांस के प्रदर्शनों को देखते हुए कहा था कि ये एक महान देश को गिराने की साजिश है, जिसके पीछे इस्लाम है. इसके साथ ही अब एक ऐसा बयान भी चर्चा में है, जो साल 2017 में दिया गया था.
मुस्लिम नेता कैसे जान गए यूरोप का भविष्य?
इस प्रदर्शन के बैकग्राउंड में साल 2017 का वह बयान याद आता है जब यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल-नहयान ने यूरोप को चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि पॉलिटिकली करेक्ट होने और सही निर्णय न लेने के कारण यूरोप भुगतने वाला है. आने वाले वक्त में यहीं से सबसे ज्यादा रेडिकल, चरमपंथी और आतंकवादी निकल सकते हैं. लंदन, जर्मनी, स्पेन और इटली जैसे देशों में हिंसा और खून की आवाजें सुनाई दे रही हैं. उन्होंने यूरोपीय देशों को आतंक के इनक्यूबेटर बनने से बचने की सलाह दी थी. आज जिस तरह की रेडिकल घटनाएं फ्रांस, इटली, स्पेन जैसे देशों में हुईं, उनके शब्द लगभग भविष्यवाणी जैसे लगते हैं.
यूएई के विदेश मंत्री ने साल 2017 में की थी भविष्यवाणी. (एआई जेनरेटेड)
डोनाल्ड ट्रंप ने भी कट्टरपंथ को लेकर दी थी चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल के फ्रांसीसी प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सिर्फ स्कूलों का मुद्दा नहीं है. उन्होंने इसे नियंत्रण से बाहर हो चुकी बड़े पैमाने की माइग्रेशन और इस्लाम के एक बार महान देश पर कब्जा करने की कोशिश से जोड़ा. ट्रंप का बयान विवादास्पद है क्योंकि प्रदर्शनकारियों की आधिकारिक मांगें शिक्षा और महंगाई से जुड़ी हैं, लेकिन यूरोप में लंबे समय से माइग्रेशन, एकीकरण की विफलता और सांस्कृतिक टकराव की बहस चल रही है.
फ्रांस में लाखों लोग क्यों उतरे सड़कों पर?
फ्रांस में 17 अक्टूबर को करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे. किसान, क्लाइमेट वालंटियर्स, ट्रेड यूनियन और छात्र इसमें शामिल थे. ईंधन की कीमतें, बढ़ती महंगाई और शिक्षा की खराब हालत मुख्य मुद्दे बने लेकिन प्रदर्शन कई जगह हिंसक हो गए. गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के अनुसार लगभग 400 गिरफ्तारियां हुईं और 60 सुरक्षाकर्मी घायल हुए. मार्सेय, लिली, कैले और एंजे के नगर भवनों पर हमले या घुसने की कोशिश हुई. बोर्दो समेत कई प्रशासनिक दफ्तरों को निशाना बनाया गया. कुछ असामाजिक तत्वों ने दुकानों में लूटपाट भी की और पेरिस मेट्रो सेवाएं प्रभावित हुईं. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने साफ कहा कि हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है और तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी.
इटली में भी हिंसक प्रदर्शन जारी
इटली में भी स्थिति अलग नहीं रही. प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की सरकार के खिलाफ छात्र, शिक्षक और ट्रेड यूनियन सड़कों पर आए. महंगाई और बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था मुख्य शिकायतें हैं. रोम, मिलान, ट्यूरिन और बोलोन्या में प्रदर्शन हुए. कुछ जगहों पर पुलिस पर पत्थर फेंके गए, अधिकारी घायल हुए और तोड़फोड़ हुई. मिलान में प्रोटेस्ट बीच में रोकना पड़ा, ट्यूरिन में हथौड़ों वाले लोग रोके गए और बोलोन्या में रेलवे स्टेशन बंद करना पड़ा. पीएम मेलोनी ने शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान जताया लेकिन हिंसा को बर्दाश्त न करने की चेतावनी दी.
सिर्फ प्रदर्शन या मंशा यहां भी कुछ और?
- इन प्रदर्शनों की टाइमिंग सबसे ज्यादा ध्यान देने लायक है. इटली में हाल ही में मेलोनी सरकार ने स्कूलों में बुर्का और नकाब जैसे चेहरे ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पास किया है. साथ ही विदेशी छात्रों की संख्या पर कैप और इटैलियन सीखने को अनिवार्य करने के प्रावधान भी शामिल किया.
- फ्रांस में तो 2010 से ही सार्वजनिक जगहों पर पूर्ण चेहरा ढकने पर प्रतिबंध है और रेडिकलाइजेशन को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है. ये सांस्कृतिक मुद्दे लंबे समय से समाज में तनाव पैदा कर रहे हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई ये प्रदर्शन सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर हैं या फिर जब सरकारें बुर्का बैन या भाषा की शर्तें जैसी नीतियां लाती हैं तो विरोध बढ़ता है.
- आर्थिक दबाव तो सिर्फ बहाने की तरह है, ताकि भीड़ ज्यादा से ज्यादा जुटाई जा सके. यूएई मंत्री की 2017 की चेतावनी याद दिलाती है कि पॉलिटिकली करेक्ट होने के नाम पर मुश्किल फैसले टालने का नतीजा बाद में सामाजिक अशांति के रूप में आ सकता है.
- फ्रांस और इटली में जो हिंसा और झड़पें दिख रही हैं, वे सिर्फ आज की घटनाएं नहीं बल्कि लंबे समय से सुलग रही आग का प्रत्यक्ष रूप है. यूरोप को अब सोच-समझकर और निर्णायक कदम उठाने होंगे, वरना ये तनाव और गहरा सकते हैं.