माओ त्से-तुंग के शासन में भूखे रहे थे जिनपिंग! अब चीन ऐसा क्या कर रहा जिससे कभी न हो अनाज की कमी

माओ त्से-तुंग के शासन में भूखे रहे थे जिनपिंग! अब चीन ऐसा क्या कर रहा जिससे कभी न हो अनाज की कमी


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कभी भूखे रहे थे जिनपिंग! अब चीन ऐसा क्या कर रहा जिससे कभी न हो अनाज की कमी

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माओ त्से तुंग के समय चीन ने भयंकर भुखमरी और अकाल देखा है. शी जिनपिंग खुद इसके शिकार बने थे. वह कई बार इंटरव्यू में इसका जिक्र कर चुके हैं. अब उन्होंने चीन को इससे बचाने के लिए बड़े प्रयास शुरू कर दिए हैं. चीन कुछ ऐसा करने जा रहा है, जिससे चीन में कभी भी भुखमरी के हालात पैदा न हों.

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शी जिनपिंग.

चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग कुछ ऐसा करने जा रहे हैं जिससे चीन में कभी अनाज की कमी न हो. दरअसल जिनपिंग की इस सोच के पीछे एक ऐसा इतिहास है जिससे वह आज तक नहीं उबरे. दरअसल जिनपिंग ने बचपन में एक ऐसा दौर भी देखा है जब देश माओत्से तुंग की नीतियों की वजह से भीषण अकाल से जूझ रहा था. 1959 से लेकर 1961 के बीच इस अकाल लाखों लोगों की मौत हुई थी.

दरअसल 1958 में माओ त्से तुंग ने ग्रेट लीप फॉरवर्ड अभियान शुरू किया था. माओ चाहते थे कि चीन का तेजी से औद्योगिक विकास और देश एक कृषि महाशक्ति बन जाए. हालांकि नीतियों फेल हो गईं और अनाज की सरकारी खरीद में लापरवाही ने इस संकट को गंभीर बना दिया. 2015 में अमेरिका यात्रा के दौरान एक रिसेप्शन में जिनपिंग ने उस समय के अपने हालातों का खुद खुलासा किया था. उन्होंने अपने गांव लियांगजियाहे की याद करते हुए बताया था कि कैसे उन दिनों वे अन्य ग्रामीणों के साथ मिट्टी की गुफाओं में रहते थे. हालात इतने खराब थे कि लंबे समय तक सब्जियां, दलिया और बाजरा खाकर ही गुजारा किया था.

अब क्या कर रहा चीन?

चीन ने हाल ही में जारी अपनी नई कृषि रणनीति में अनाज पैदावार पर ज्यादार जोर दिया है. चीन का फोकस खेती की जमीन बढ़ाने की बजाय मौजूदा खेती से ही ज्यादा पैदावार हासिल करने पर है. इसके लिए चीन का फोकस दो बातों पर है. वह खेती की जमीन बचाना चाहता है और उस जमीन पर नई तकनीक से ज्यादा से ज्यादा अनाज पैदा करना चाहता है. इसके लिए चीन कई मोर्चों पर काम कर रहा है. चीन सरकार के सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ही देश में 6.67 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा खेती ऐसी जमीन विकसित की जा चुकी है जहां मशीनों के इस्तेमाल से अनाज उत्पादन की दर 75 प्रतिशत या उससे ऊपर पहुंच चुकी है.

चीन ने पिछले साल कितना अनाज पैदा किया?

चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिक्स के मुताबिक देश ने पिछले साल तकरीबन 71.49 करोड़ टन अनाज का उत्पादन किया था, जबकि इससे एक साल पहले यानी 2024 में अनाज उत्पादन का आंकड़ा 70.65 करोड़ टन रहा था. यानी एक साल में ही तकरीबन 83.8 लाख टन ज्यादा अनाज का उत्पादन हुआ था. यानी तकरीबन 1.2% बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इनमें मक्का-सोयाबीन और अनाज की दूसरी फसलें भी शामिल हैं. स्टैटिक्स ब्यूरो के मुताबिक बेहतर फसल का कारण अच्छे बीज, मशीनों का प्रयोग और अनुकूल मौसम भी रहा.

स्टॉक पर भी काम कर रहा चीन

चीन के SCIO के मुताबिक चीन उत्पादन बढ़ाने के साथ अनाज का स्टॉक रखने के तरीके में भी बदलाव ला रहा है, ताकि कम से कम इतना अनाज यहां जमा किया जा सके जिसे जरूरत पड़ने पर प्रयेाग किया जा सके. इसके लिए चीन सरकारी अनाज भंडार, भंडारण केंद्रों के साथ आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत कर रहा है. चीन न पिछले साल अनाज और खाद्य तेल के सरकारी भंडारण में भी बढ़ोतरी की थी. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने वास्तव में कितना स्टॉक जमा कर रहा है, इसका विवरण तो उपलब्ध नहीं है. मगर आंकड़ों के हिसाब से उसने इसमें 6.1 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है.

सबसे ज्यादा सोयाबीन आयात करता है चीन

चीन लगातार गेहूं और चावल के अनाज उत्पादन में मजबूत स्थिति में पहुंच रहा है, लेकिन पशुओं के चारे और खाद्य तेल के लिए इस्तेमाल होने वाली सोयाबीन की जरूरत पूरी करने में वह विदेशों पर निर्भर है. रॉयटर्स के मुताबिक चीन ने 2025 में रिकॉर्ड 11.183 करोड़ टन सोयाबीन को आयात किया था. ये आयात साउथ अमेरिका, अर्जेंटीना से किया गया था. दरअसल सोयाबीन का इस्तेमाल चीन में सोया तेल और अन्य खाद्य उत्पादन बनाने में होता है. सोयाबीन मील पशुओं के चारे में इस्तेमाल होता है. ऐसे में चीन को बड़ी मात्रा में हर साल इसका आयात करना पड़ता है.

खाद्य सुरक्षा के लिए बना अलग कानून

चीन ने खाद्य सुरक्षा के लिए नया कानूनी ढांचा भी बनाया है. 1 जून 2024 से इसे लागू किया गया है. इसमें कृषि भूमि की सुरक्षा, अनाज उत्पादन, भंडारण, वितरण, आपातकालीन आपूर्ति को शामिल किया गया है. इसमें साफ है कि उपजाऊ जमीन का गैर-कृषि इस्तेमाल नही किया जा सकता. इसी में बीजों के बेहतर विकास और रिसर्च को बढ़ावा देना. खेती को टिकाऊ बनाए रखना. अनाज की बर्बादी रोकना शामिल हैं. चीन का उद्देश्य यह है कि खाद्य आपूर्ति केवल बाजार और विदेशों से आने वाले आयात पर निर्भर न रहे. देश की घरेलू उत्पादन क्षमता ऐसी हो जो सरकारी व्यवस्था से मिलकर किसी भी संकट का सामना कर सके.



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