Kolkata Durga Puja Stampede: देवी भजनों की जगह एंबुलेंस के सायरन सुनाई दे रहे थे. कोई अपनी बेटी को ढूंढ हो रहा था तो किसी को अपने उस दोस्त की तलाश थी जो चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में आया था. अफरा-तफरी मची हुई थी. जिनके अपने मिल जा रहे थे उनके चेहरे पर सुकून था और जो अपनों से दूर थे उनके चेहरे पर डर दिख रहा था. कुछ ही मिनटों पहले कोलकाता के चोर बागान दुर्गा पूजा पंडाल में सब कुछ सामान्य था. मां की आराधना के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी थी. क्यों न लगती. बंगाल सरकार खुद इस पूजा पंडाल को सेरार-सेरा यानी सर्वश्रेष्ठ में सर्वश्रेष्ठ घोषित कर चुकी थी. बेशक इस पंडाल को तीसरा स्थान मिला था, मगर इस पुरस्कार में शामिल होना ही अपने आप में बेहद खास माना जाता है.
पश्चिम बंगाल सरकार, कोलकाता नगर नगर और पुलिस की से बंगाल में हर साल देवी-दुर्गा सम्मान आयोजन किया जाता है. पहले इसका नाम बिस्वा बांग्ला शरद सम्मान हुआ करता था. पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के विभाग की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इस समारोह में इस बार चोर बागान सर्वजननीन दुर्गोत्सव समिति को शीर्ष श्रेणी में चुना गया था. इस पूजा पंडाल को राज्य का सबसे प्रतिष्ठित सेरार-सेरा यानी बेस्ट ऑफ द बेस्ट वर्ग में तीसरा स्थान मिला था. इस सूची में पहले स्थान पर संतोष मित्रा स्क्वायर और दूसरे स्थान पर वृंदावन गार्डन दुर्गापूजा समिति रहे थे.
किस आधार पर दिया जाता है यह पुरस्कार
दुर्गा पूजा को वैश्विक स्तर पर पहचान देने के लिए इस पुरस्कार का आयोजन किया जाता है. इसके चयन के लिए एक विशेष ज्यूरी बनाई जाती है जो छह स्तरों पर किसी भी पंडाल का आकलन करती है>
- समग्र सौदर्य और रचनात्मकता : पंडाल की बनावट, उसकी थीम, मौलिकता.
- मूर्ति कला : मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण और उसकी कलात्मकता.
- लाइटिंग : पंडाल की रोशनी और विजुअल इफेक्ट.
- पर्यावरण: पंडाल में ऐसी व्यवस्था जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.
- सामाजिक जागरूकता: पूजा समिति की ओर से सामाजिक मुद्दे पर दिया जाने वाला संदेश.
- भीड़ नियंत्रण: पंडाल की भीड़ नियंत्रण व्यवस्था और कानून व्यवस्था के नियम.
चोर बागान दुर्गा पूजा पंडाल क्यों है खास
कोलकाता का चोर बागान दुर्गा पूजा पंडाल शहर के सबसे पुराने पूजा पंडालों में माना जाता है. यहां 91 साल से लगातार दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा है. शनिवार को भी यहां जो भीड़ उमड़ी थी वो मां के अलहदा रूप के दर्शन करने के लिए पहुंची थी. दरअसल यह शहर का ऐसा अनोखा दुर्गा पूजा पंडाल है जहां मां दुर्गा को किसी योद्धा के रूप में नहीं बल्कि शांत मुद्रा में दिखाया गया है. आम तौर पर अगर देखें तो ज्यादातर दुर्गा पूजा पंडालों में मां को महिषासुर का मर्दन करते दिखाया जाता है. मगर यहां मां दुर्गा के हाथों में न तो शस्त्र हैं और न ही चेहरे पर क्रोध. पंडाल की हर साल थीम भी अलग-अलग रखी जाती है. इस बार आरोब थीम पर दुर्गा पूजा पंडाल का आयोजन किया गया था.
चोर बागान पूजा पंडाल में एंट्री का रास्ता बेहद संकरा था. (फोटो-@durgapujo_kolkata/instagram)
क्या थी दुर्गा पूजा पंडाल की आरोब थीम
चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल की इस साल की थीम आरोब रखी गई थी. बंगाली में इसका मतलब होता है शोर-शराबे से दूर रहना. यहां प्रतिमा यही संदेश देती है. जिसे शांत मुद्रा में मेडिटेशन में लीन दिखाया गया है, जबकि कोलकाता के पारंपरिक दुर्गा पूजा पंडालों में ऐसा देखने को नहीं मिलता. यहां सिर्फ मां दुर्गा की अकेली प्रतिमा नहीं है. उनके आसपास भक्त ध्यान में बैठे हैं. यहां महिषासुर को मां दुर्गा से युद्ध करते हुए नहीं, बल्कि उनके सामने हथियार डालते हुए नजर आ रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि इस प्रतिमा के जरिए दुर्गा पूजा के आयोजकों ने शांति और सद्भाव का संदेश देने की कोशिश की, ताकि लोगों को आपसी मेलजोल की अहमियत समझ में आए.
पहले हुआ था अकाल बोधन थीम का ऐलान
चोर बागान दुर्गा पूजा आयोजन से पहले एक खूंटी पूजा होती है. जुलाई में जब खूंटी पूजा की गई थी तब ये तय किया गया था इस बार पंडाल की थीम अकाल बोधन रखी जाएगी. अकाल का मतलब होता है असमय और बोधन का मतलब होता है सजग करना, जगाना. यानी समय से से मां दुर्गा का आह्वान करना. शास्त्रों के मुताबिक देवताओं के दिन और रात मनुष्यों के छह छह दिन के बराबर होते हैं. ऐसे में आश्विन मास में देवता सो रहे होते हैं.
शास्त्रों के वर्णित मान्यता के अनुसार शरद ऋतु में मां दुर्गा का पूजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि इस समय भगवान श्रीराम ने रावण का वध करने से पहले मां दुर्गा का आह्वान कर उनकी पूजा की थी. हालांकि जब कलाकार सुशांत शिवानी पाल ने पंडाल को तैयार किया तो उसे आंतिरक वातावरण और प्रतिमओं के हिसाब से इसे थीम को बदलकर आरोब कर दिया गया.
1936 से दुर्गा पूजा की शुरुआत
चोरबागान सार्वजिनक दुर्गा पूजा की परंपरा 1936 से जुड़ी मानी जाती है. इस साल दुर्गा पूजा समिति अपनी 91वां वर्ष मना रही थी. इसे उत्तर कोलकाता की उन पूजा समितियों में शामिल है, जहां की धार्मिक परंपरा सामुदायिक भागीदारी से आगे बढ़ी है. बंगाल में दुर्गा पूजा का यह पंडाल बेहद खास माना जाता है.
कोलकाता में दुर्गा पूजा का इतना महत्व क्यों?
बंगाल में दुर्गा पूजा का इतिहास कभी जमींदारों और उससे पहले राजघरानों तक सीमित था. बाद में यहां बारोवारी और सार्वजनिक पूजा विकसित हुई. इसमें मोहल्ले के लोग मिलकर आयोजन करने लगे. इसे सार्बोजनीन कहा गया. इसका अर्थ होता है सार्वजनिक यानी सबके लिए. इसने दुर्गा पूजा को निजी घरों की सीमाओं से निकालकर इसे एक सामूहिक उत्सव का रूप दिया. बदलते दौर के साथ मां दुर्गा की पूजा का तरीका भी बदल गया. धीरे-धीरे पंडालों में कलात्मक सजावट और नए विषयों पर आधारित मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने की होड़ मच गई.