न रंग, न मिट्टी… घी से तैयार हुआ मां लक्ष्मी का पूरा दरबार, 7 दिन में कारीगरों ने बनाया स्वरूप, हर कोई हैरान

न रंग, न मिट्टी… घी से तैयार हुआ मां लक्ष्मी का पूरा दरबार, 7 दिन में कारीगरों ने बनाया स्वरूप, हर कोई हैरान


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251 किलो घी से बनी मां लक्ष्मी की मूर्ति, दोनों तरफ भी गजराज विराजमान

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गुजरात के आणंद से कारीगर हर वर्ष नवरात्रि से एक सप्ताह पहले सात दिन तक कड़ी मेहनत से ये मूर्ति तैयार करते है. इस बार भी करीब 251 किलोग्राम से पांच फीट ऊंची माता की मुख्य मूर्ति सहित पूरे दरबार को आकार दिया है. कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी के साथ सूंड उठाए हुए दोनों तरफ गजराज बनाए गए है.

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सिरोही: जिले के जावाल कस्बे में पिछले 23 साल से अनोखे तरीके से नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. यहां सांचीयाव माता मंदिर परिसर में देवी की मूर्ति मिट्टी या पत्थर से नहीं, बल्कि घी से तैयार की जाती है. सांचीयाव माता मंदिर और श्री चामुंडा गरबा मंडल की ओर से होने वाले नवरात्रि महोत्सव में इस बार मां लक्ष्मी का भव्य दरबार श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. कमल पर विराजित मां लक्ष्मी और दोनों ओर सूंड उठाए गजराज की कलाकृति ना सिर्फ कलाकारों की कारीगरी, बल्कि आस्था और समर्पण की अनूठी मिसाल भी पेश कर रही है.

गुजरात के आणंद से कारीगर हर वर्ष नवरात्रि से एक सप्ताह पहले सात दिन तक कड़ी मेहनत से ये मूर्ति तैयार करते है. इस बार भी करीब 251 किलोग्राम से पांच फीट ऊंची माता की मुख्य मूर्ति सहित पूरे दरबार को आकार दिया है. कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी के साथ सूंड उठाए हुए दोनों तरफ गजराज बनाए गए है. आयोजकों के अनुसार देशी घी को जमा कर प्रतिमा के आभूषणों, कमल की पंखुड़ियों को रूप दिया गया. साथ ही इन मूर्तियों पर बारीक नक्काशी भी देखने लायक होती है. घी जैसे पदार्थ से इतनी बारीक और आकर्षक आकृति तैयार करना अपने आप में मुश्किल काम है, जिसे कलाकारों ने काफी अच्छे से 7 दिन में पूरा किया.

प्रतिमा को सुरक्षित रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं
इस अनूठी मूर्तियों को तैयार करना करने के बाद उसे नौ दिनों तक पांडाल में सुरक्षित रखना भी उतनी ही मेहनत का काम है. घी गर्म वातावरण में नरम होकर अपना आकार खो सकता है, इसलिए प्रतिमा के आसपास लगातार ठंडक बनाए रखने की व्यवस्था की गई है. आयोजक कमेटी के सदस्य नारायण सुथार के अनुसार प्रतिमा को लगभग माइनस एक डिग्री सेल्सियस के आसपास ठंडा रखने के लिए चारों तरफ बर्फ रखी जाती है और कूलरों में भी बर्फ के पानी का उपयोग किया जाता है. पांच फीट ऊंची प्रतिमा पर हर आधे घंटे में बर्फ के पानी का छिड़काव करना पड़ता है. इस काम में कमेटी के सभी सदस्य सेवा देते है.

दो लाख रुपए का खर्च, वनस्पति घी का होता है उपयोग
आयोजकों के अनुसार घी से मूर्ति बनाने की प्रक्रिया भी सामान्य मूर्तिकला से अलग होती है. इसके लिए वनस्पति घी को गर्म करके फिर बर्फ के पानी में ठंडा किया जाता है. इसके बाद उसे सूती कपड़े में बांधकर छानकर मूर्ति को रूप दिया जाता है. इस बार मूर्ति बनाने और पूरे आयोजन में मूर्तिकारों की फीस (करीब 50 हजार रुपए) समेत कुल 2 लाख रुपए का खर्च आया. घी से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने के पीछे बर्फ से शिवलिंग बनाने से आया एक आइडिया था. अहमदाबाद में बर्फ से निर्मित शिवलिंग देखने के बाद घी से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने का विचार आया। इसी को साकार करने के लिए 2003 में इस की पहल की गई. तब से हर वर्ष घी से ही यहां मूर्ति बनाई जाती रही है. अब तक माता जगदम्बा, शिव शक्ति, नंदी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश समेत देवी-देवताओं की 23 प्रतिमाएं बनाई जा चुकी हैं. इन मूर्तियों को देखने के लिए ना सिर्फ जावाल बल्कि आसपास के कई गांवों से श्रद्धालु यहां आते है.



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