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Dehradun Elevated Road Demolition: दिल्ली से देहरादून की दूरी तो सिमट गई, लेकिन इस विकास की कीमत अब उन बेसहारा जिंदगियों को चुकानी पड़ रही है जिनके पास आशियाने के सिवा खोने को कुछ नहीं बचा. आशारोड़ी-मोहकमपुर एलिवेटेड रोड के नाम पर पूजावाला की बुजुर्ग वैजयंती की बची-खुची दुनिया उजड़ने की कगार पर है-वह घर जहां उनके पति और इकलौते बेटे की आखिरी यादें दफ्न हैं.
Dehradun Elevated Road Demolition: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद देहरादून आने वाले पर्यटकों की संख्या में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है. पर्यटक ढाई घंटे में दिल्ली से देहरादून तो पहुंच जाते हैं, लेकिन यहां से ऋषिकेश, हरिद्वार और मसूरी जाने में वीकेंड पर घंटों ट्रैफ़िक जाम का सामना करना पड़ता है. इस यातायात समस्या से निपटने के लिए आशारोड़ी से मोहकमपुर तक एक एलिवेटेड रोड का निर्माण प्रस्तावित किया गया है. इस परियोजना के विस्तार की ज़द में आने से सैकड़ों मकानों पर ध्वस्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है, जिसका विरोध लगातार प्रभावित परिवार करते नज़र आ रहे हैं.
मोहकमपुर-आशारोड़ी एलिवेटेड रोड निर्माण की इस कार्रवाई से देहरादून के पूजावाला क्षेत्र की रहने वाली असहाय वृद्धा वैजयंती भी बेघर होने की कगार पर पहुंच गई हैं. वैजयंती के जीवन में दुखों का पहाड़ पहले ही टूट चुका है, जहां दिल का दौरा पड़ने से उनके पति का निधन हो गया था और गंभीर बीमारी ने उनके इकलौते बेटे को भी छीन लिया. जिस घर को उन्होंने अपने परिवार के साथ मिलकर संवारा था, वही घर अब उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा और उनकी ज़िंदगी का आख़िरी आश्रय बचा है.
पति और बेटे की यादों का आख़िरी सहारा
आंखों में आंसू और कांपती आवाज़ के साथ वैजयंती प्रशासन और समाज से अपने अधिकार की गुहार लगा रही हैं. उनका कहना है कि इसी घर से उनके पति और इकलौते बेटे की अंतिम विदाई हुई थी, इसलिए इस आशियाने से उनकी भावनाएँ और अनगिनत यादें जुड़ी हुई हैं. वैजयंती का कहना है कि वे पिछले 15 सालों से यहाँ रह रही हैं और बड़ी मुश्किल से किराए के मकान से निकलकर यह घर बनाया था. वे साफ़ शब्दों में कहती हैं कि यह उनके पति की आख़िरी निशानी है और वे मरते दम तक इसे नहीं छोड़ेंगी.
सता रहा बेघर होने का ख़ौफ़
विकास की इस दौड़ में बेघर होने के डर से वैजयंती बेहद डरी और सहमी हुई हैं. छत छिन जाने के ख़ौफ़ में उन्होंने यहां तक कह दिया है कि यदि उनका आशियाना उनसे छीना गया तो वे इसी घर में आत्महत्या कर लेंगी. एक अकेली और बेसहारा महिला के पास इस घर के अलावा रहने का कोई दूसरा ठिकाना या आर्थिक संबल मौजूद नहीं है. इस स्थिति ने उनके जीवन में सुरक्षा का आख़िरी सिरा भी पूरी तरह से तोड़कर रख दिया है.
वैजयंती की यह कहानी सिर्फ़ एक ईंट-पत्थर के मकान के टूटने की नहीं है, बल्कि एक टूटी हुई आत्मा के अंतिम आश्रय के ढह जाने की मर्मघाती त्रासदी है. बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर वैजयंती जैसे कई लाचार और मजबूर परिवारों के आशियाने भेंट चढ़ रहे हैं. यह घटना यह गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या प्रगति और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच समाज के सबसे कमज़ोर और बेसहारा वर्ग की संवेदनाओं व अधिकारों की कोई कीमत नहीं रह गई है.