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Jhansi News: झांसी के बबीना में रहने वाले दीपक यादव ने जन्म से एक हाथ में दिव्यांगता होने के बावजूद कुश्ती में अपनी अलग पहचान बनाई है. वह तीन बार बुंदेलखंड बाल केसरी का खिताब जीत चुके है. आज वह दंगलों में हिस्सा लेते हैं और जीत हासिल कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं.
झांसी: कहते हैं कि अगर आपके अंदर कुछ करने का जज्बा हो तो एक ना एक दिन सफलता जरूर मिलती है. कुछ ऐसी ही कहानी है झांसी के बबीना में रहने वाले दीपक यादव की, जिनकी पहचान आज एक ऐसे पहलवान के रूप में है, जो अपनी मेहनत और खेल के दम पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं. जन्म से ही एक हाथ में दिव्यांगता होने के बावजूद उन्होंने कुश्ती को चुना और अखाड़े में अपनी अलग पहचान बनाई. आज वह दंगलों में हिस्सा लेते हैं और जीत हासिल कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं.
दीपक यादव को लोग एक हाथ का पहलवान कहकर बुलाते हैं. लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इस नाम से नहीं, बल्कि उनकी उपलब्धियों से भी होती है. दीपक तीन बार बुंदेलखंड बाल केसरी का खिताब जीत चुके हैं. इसके अलावा वह एक बार जिला केसरी भी बने हैं. उत्तर प्रदेश की राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने हिस्सा लिया और तीन मेडल अपने नाम किए. उनकी कामयाबी का सफर यहीं नहीं थमता.
मुकाबलों में क्षमता साबित करने की कहानी
जनपद स्तर की प्रतियोगिताओं में दीपक तीन बार पहला स्थान हासिल कर चुके हैं. वहीं मंडल स्तर पर भी उन्होंने पांच बार प्रथम स्थान प्राप्त किया है. ये उपलब्धियां उनके खेल में लगातार बने रहने और मुकाबलों में अपनी क्षमता साबित करने की कहानी कहती हैं. कुश्ती में केवल ताकत ही काम नहीं आती. सामने वाले पहलवान की चाल समझना, सही समय पर दांव लगाना और आखिरी पल तक मुकाबले में टिके रहना भी जरूरी होता है.
जीत के लिए लगाया पूरा दम
दीपक भी अखाड़े में उतरकर इन चुनौतियों का सामना करते हैं. उनकी उपलब्धियां दिखाती है कि वह सिर्फ प्रतियोगिताओं में भाग नहीं लेते, बल्कि जीत के लिए पूरा दम लगाते हैं. किसी खिलाड़ी की काबिलियत को उसकी शारीरिक बनावट के आधार पर आंकना सही नहीं है. दीपक यादव ने अपने प्रदर्शन से यह साबित किया है कि उनकी पहचान उनकी दिव्यांगता से कहीं आगे है. तीन बार बुंदेलखंड बाल केसरी और पांच बार मंडल स्तर पर प्रथम स्थान हासिल करना उनकी कुश्ती की यात्रा के अहम पड़ाव हैं.
लोग कहते हैं एक हाथ का पहलवान
बबीना के दीपक यादव की कहानी उन खिलाड़ियों की याद दिलाती है, जो अपनी परिस्थितियों के बीच भी खेल से जुड़े रहते हैं और अपनी मेहनत से उपलब्धियां हासिल करते हैं. लोग उन्हें एक हाथ का पहलवान कहते हैं, लेकिन अखाड़े में उनकी पहचान उनके दांव, उनके प्रदर्शन और उनकी जीत से बनती है. दीपक यादव का सफर बताता है कि किसी खिलाड़ी को पहचानने का सही पैमाना उसकी शारीरिक कमी नहीं, बल्कि उसका हुनर और उसकी उपलब्धियां हैं.