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Marriage in Older Age: मटुक-नाथ और जुली याद है. 2006 में ये दोनों रातों-रात देश के लव गुरु बन गए थे. हर तरफ यही चर्चा थी कि इन दोनों का प्रेम सच्चा है या महज ढोंग. हाल के दिनों में ऐसे मटुकनाथों की कोई कमी नहीं है. हाल में एक खबर आई है कि ओरैया में एक 75 साल के बुजुर्ग ने अपनी बेटी की सहेली से सगाई की है. वह महज 30 साल की है. अगर थोड़ी याददाश्त तेज करेंगे तो ऐसे एक नहीं अनेकों मामले सामने आए हैं. समाज के बनते-बिगड़ते ताने-बाने में उम्र के इस भारी अंतर वाली शादी कितना स्वीकार्य है. क्या यह सच में सच्चा प्रेम है या पितृसत्तात्मक सोच वाले पुरुषों की यौन कुंठा का तृप्त करने का महज एक सुविधाभोगी हथकंडा.
बुजुर्गियत संभाले या शादी. Photo : AI
Matuknath Type Older’s Rise: करीब 7-8 दशक पहले भारतीय समाज में एक चलन कुछ खास वर्गों में बेहद आम था. तब 60-70 साल के बुजुर्ग भी 20-25 साल की युवतियों से विवाह कर लेते थे. बड़े-बड़े घरानों और परिवारों में यह अक्सर देखने को मिलता था. इस कारण उनपर ऊंगलियां नहीं उठाई जाती थी. उम्र के इस भारी अंतर और ऐसे बेमेल रिश्तों की विडंबना को उजागर करने के लिए ही महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने निर्मला जैसा अमर उपन्यास लिखा था. इस उपन्यास उस युवती की दबी हुई उत्कट इच्छाओं को रेखांकित किया था जो एक बड़ी उम्र के पति के साथ निबाह कर रही थी. दूसरी तरफ देखें तो आज का समाज इन सारी बंदिशों को पीछे छोड़ चुका है. अब लड़की पर भी यह दबाव नहीं है कि वह किसी के साथ भी शादी कर लें. लेकिन आज के जमाने में जब 20-25 साल की लड़कियां 70-75 साल के पुरुष से शादी कर लें तो इसे क्या कहेंगे. यह सवाल इसलिए मौजूं हो गई है कि हाल ही यूपी के औरैया में 75 वर्षीय रामसुगर और 30 वर्षीय रानी राजपूत की सगाई चर्चा में है. क्या यह सच्चा प्रेम है या 75 की उम्र में पोती की उम्र की लड़की से शादी करना विशुद्ध ढोंग. आखिर मटुकनाथ की संख्या क्यों बढ़ने लगी है. क्या वाकई यह प्रेम है या फिर हमारी दबी हुई कुंठाओं, पितृसत्तात्मक सोच और सुविधाभोग का एक भद्दा मुखौटा?
क्या मटुकनाथ-जुली का प्रेम सच्चा था
जब भी इस तरह की खबरें आती है तो सोशल मीडिया पर तर्क और कुतर्कों का लंबा सिलसिला चल पड़ता है. हाल के आधुनिक समाज में इस विषय को लेकर सबसे पहले मटुकनाथ और जुली की प्रेम कहानी पर लंबी चर्चा चली थी. बल्कि यूं कहें कि उम्र के फासलों में शादी पर यही से चर्चा शुरू हुई थी. उस समय सोशल मीडिया का दौर नहीं था लेकिन टीवी मीडिया तब सोशल मीडिया की भूमिका में निभा रहा था. कई महीनों तक मटुकनाथ और जुली की प्रेम कहानी पर बहस-मुबाहसों का दौर चलता रहा. रातों-रात मटुकनाथ और जुली देश के लव गुरु बन गए. हालांकि मटुकनाथ उस वक्त महज 51 साल के थे लेकिन जुली सिर्फ 21 साल की. दोनों के बीच 30 साल का अंतर था. कुछ बुद्धजीवियों के बीच मटुकनाथ और जुली में आत्मिक अनुराग था और वे उनके सहानुभूति के पात्र बने लेकिन आम समाज ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया. अगर उन दोनों के बीच प्लेटोनिक प्रेम होता तो समाज से मिले लाख अपयश के बावजूद वो अटूट होता लेकिन सुविधा के ढांचे में पला यह प्रेम भी कुछ समय बाद भरभरा गया. मटुकनाथ और जुली साल-दो साल के बाद ही भ्रम के महाभंवर से निकल गए. दोनों की राहें जुदा हो गई. जुली तो कहीं सैटल हो गईं लेकिन मटुकनाथ तो आज अपने परिवार के पास भी नहीं रह रहे हैं. तन्हई भरा जीवन जीने पर विवश हैं.
बायलॉजिकल क्लॉक को धता बताना खुद को धोखा देना
पर अब यह चर्चाएं सोशल मीडिया पर दौड़ने लगती है. चाहे कबीर बेदी हो या मिलिंद सोमन, इनकी शादी पर लंबे-लंबे लेख लिखे जाते हैं. आधुनिकता का जामा पहनाने वाले लोग इसे दो दिलों का आत्मिक मिलन और वैचारिक स्वतंत्रता का नाम देते हैं.अगर आप इस बेमेल रिश्ते को बायलॉजिकल और वैज्ञानिक कसौटी पर कसें, तो यह किसी मजाक से कम नहीं लगता. जिस उम्र में शरीर को सहारे और आराम की जरूरत होती है, उस उम्र में जीवनसाथी ढूंढने का यह कौन सा राग है? बायलॉजिकल क्लॉक और उम्र की कुदरती सत्यता से आंखें मूंदकर इस तरह के रिश्तों को सही ठहराना सिर्फ खुद को धोखा देना है. हमें यह सुनने में जरूर अच्छा लगता है कि सच्चे प्रेम के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता. यह भी कहा जाता है कि प्यार और जंग में सब कुछ जायज होता है क्योंकि प्यार अंधा होता है. बहुत सुंदर बात है! लेकिन वह कुदरती प्रेम होना चाहिए. कुदरत ने ही इसके लिए उम्र भी बनाई है. क्या कुदरत को यह मंजूर है? अगर वाकई यह शुद्ध और निस्वार्थ प्रेम है, तो इसके लिए सात फेरों और मैरिज सर्टिफिकेट की क्या जरूरत है? प्यार तो बिना शादी के भी उम्र की हर सीमा को लांघकर जीवित रह सकता है. फिर समाज की आंखों में धूल झोंककर उस लड़की के जीवन को एक ऐसे पड़ाव पर क्यों धकेला जाता है, जहां भविष्य के नाम पर सिर्फ अकेलेपन और देखभाल के सिवा कुछ नहीं बचता?
सामाजिक शादी के लिए सामाजिक नियम मानिए
यहां सवाल यह भी उठता है कि आखिरकार शादी का पारंपरिक अर्थ क्या है? धार्मिक और सामाजिक संदर्भों में विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि वंश को आगे बढ़ाने, संतानोत्पत्ति और एक लंबी जीवन-यात्रा को साथ मिलकर तय करने का माध्यम रहा है. शादी समाज के बनाए नियम है. इसलिए यदि आप शादी कर रहे हैं तो समाज के बनाए नियमों में पहले फिट हो जाइए. लेकिन अब इसके किसी भी मानक पर फिट नहीं हो रहे हैं और उसी समाज के बनाए नियमों का सहारा लेकर समाज की आंखों में धूल झोंक रहे हैं. बायलॉजिकल और शारीरिक वास्तविकताओं के चलते 70 साल की उम्र के बाद यदि कोई पुरुष छोटी उम्र की लड़की के साथ शादी करता है तो यह पूरी तरह से अपने कुंठाओं को तृप्त करने भोगवादी और विकृत मानसिकता है. फिर इस उम्र में शादी का बंधन ढोंग क्यों रचा जाता है? जिस बात को हमारा समाज सामान्य तौर पर स्वीकार नहीं करता, जिस रिश्ते की नींव ही असंतुलन पर टिकी हो, उस पर जबरन पवित्रता का मुकुट पहनाने की क्या मजबूरी है?
शादी का सामाजिक जामा पहनने की क्या दरकार
सच तो यह है कि यह तथाकथित सच्चा प्रेम महज एक फंतासी, यौनिक कुंठा, रसूख का प्रदर्शन या अकेलेपन से भागने का स्वार्थी तरीका बनकर रह गया है. इस तरह के मामलों में जहां एक तरफ उम्र का यह विशाल अंतर बुजुर्ग की असुरक्षा को छुपाता है तो दूसरी तरफ यह उस युवा जीवन के साथ एक क्रूर मजाक जैसा है. मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि वास्तव में आपके बीच ईश्वरीय प्रेम है तो इसे सामाजिक जामा पहनाने के लिए मनुष्यों द्वारा बनाई गई शादी की फंतासी में क्यों फंसना, इसे आध्यात्मिक प्रेम बनाएं और एक-दूसरे पर बिना शादी किए प्रेम लुटाते रहिए. यदि आप ऐसा नहीं करते तो मटुकनाथ की तरह आप भी ढोंग कर रहे हैं क्योंकि ईश्वरीय प्रेम कभी खत्म नहीं होता. ऐसे में अब समय आ गया है कि हम इस पाखंड पर पर्दा डालने के बजाय तीखे सवाल पूछें- क्या यह वाकई मोहब्बत है या फिर आधुनिकता के नाम पर परोसी जा रही सुविधा की वह भूख, जो रिश्तों के हर कुदरती नियम को ताक पर रख देती है?