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Durga Puja in Nainital : नैनीताल की दुर्गा पूजा सबसे अलग है. यहां मां दुर्गा की आराधना के साथ ऐसी परंपराएं भी देखने को मिलती हैं, जो इसे दूसरी जगहों से अलग बनाती हैं. नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत के लिए शहर के नौ जलस्रोतों से पानी जुटाया जाता है. इसके अलावा, धनुची आरती, संधि पूजा और केले के पौधे को साड़ी भी पहनाई जाती है. इन सभी रस्मों की अपनी वजह है. कहते हैं कि पुराने समय में यहां मां दुर्गा की मूर्तियां बनाने के बजाय कलश स्थापित कर पूजा की जाती थी. दुर्गा पूजा के दौरान संधि पूजा भी की जाती है. यह अष्टमी और नवमी तिथि के बीच के संधिकाल में होती है. इस अनुष्ठान के दौरान मां को शांत करने के लिए कई जगहों पर कद्दू की बलि दी जाती है.
नैनीताल. उत्तराखंड का नैनीताल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है. यहां होने वाला दुर्गा पूजा महोत्सव आस्था, प्रकृति और बंगाली संस्कृति के खूबसूरत संगम का प्रतीक है. इस उत्सव में मां दुर्गा की आराधना के साथ ऐसी परंपराएं भी देखने को मिलती हैं, जो इसे दूसरे धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान देती हैं. नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत शहर के नौ जलस्रोतों से पानी एकत्र करने की परंपरा से जुड़ी है. धनुची आरती, संधि पूजा और केले के पौधे को साड़ी पहनाने की रस्म आकर्षण का केंद्र रहती है. नैनीताल दुर्गा पूजा समिति की वित्त सचिव डॉली भट्टाचार्य लोकल 18 से बताती हैं कि दुर्गा पूजा की परंपरा में शहर के नौ जलस्रोतों से पानी एकत्र करने का अलग महत्व है. षष्ठी के दिन कलश यात्रा निकालकर जल एकत्र किया जाता है. इस जल को कलश में स्थापित कर मां दुर्गा की आराधना की जाती है. पुराने समय में मां दुर्गा की मूर्तियां बनाने के बजाय कलश स्थापित कर पूजा की जाती थी. मान्यता थी कि नौ नदियों या जलस्रोतों के जल और नारियल के साथ कलश की स्थापना करने से उसमें मां का वास होता है. यह परंपरा प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है. बंगाल में भी दुर्गा पूजा के दौरान नदियों से जल एकत्र करने की परंपरा है.
केले के पौधे को क्यों पहनाते हैं साड़ी
नैनीताल की दुर्गा पूजा में सप्तमी के दिन होने वाला अनुष्ठान भी खास महत्व रखता है. डॉली भट्टाचार्य के अनुसार, मान्यता है कि मां दुर्गा ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि जब उनके बेटे की बहू को स्नान कराकर और सजाकर पूजा की जाएगी, तभी वह प्रसन्न होंगी. इसीलिए सप्तमी की सुबह केले के पौधे को स्नान कराया जाता है. इसके बाद उस पर हल्दी, तेल और चंदन लगाया जाता है और उसे नई साड़ी पहनाकर भगवान गणेश के बगल में स्थापित किया जाता है. इस अनुष्ठान को प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है.
भगवान राम से क्या कनेक्शन
नैनीताल में दुर्गा पूजा के दौरान संधि पूजा भी की जाती है. यह अष्टमी और नवमी तिथि के बीच के संधिकाल में होती है. डॉली भट्टाचार्य बताती हैं कि परंपरागत गणना के अनुसार, अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के शुरुआती 24 मिनट का समय संधि पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी संधिकाल में मां दुर्गा ने चंडी रूप धारण कर चंड और मुंड का वध किया था. इस अनुष्ठान के दौरान मां को शांत करने और प्रसन्न करने के प्रतीक के रूप में कई स्थानों पर कद्दू की बलि दी जाती है. मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए श्रीराम 108 कमल के फूल अर्पित करना चाहते थे. एक फूल कम पड़ने पर उन्होंने अपना नेत्र अर्पित करने का विचार किया, लेकिन मां ने उन्हें रोक दिया और उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं. यह कथा संधि पूजा से जुड़ी धार्मिक आस्था को और विशेष बनाती है.
धनुची आरती क्यों
नैनीताल की दुर्गा पूजा में धनुची आरती का भी अलग आकर्षण है. इसमें पारंपरिक पात्र में धूप जलाकर मां दुर्गा की आराधना की जाती है. ढाक की गूंज और भक्तिमय वातावरण के बीच होने वाली यह आरती बंगाली संस्कृति की विशिष्ट पहचान है. नैनीताल निवासी तनुश्री भट्टाचार्य बताती हैं कि यह पर्व प्रकृति को अध्यात्म से जोड़ता है और उन्हें पूरे साल इसका इंतजार रहता है. उनके अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि महिषासुर के साथ युद्ध के दौरान मां दुर्गा के संघर्ष और शक्ति के प्रतीक के रूप में धनुची नृत्य किया जाता है. आरती के दौरान श्रद्धालु मां की आराधना करते हैं और उत्सव में पारंपरिक रंग भर जाते हैं.