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Dehradun Chocolate Sweets Shop : पहाड़ों से दूर देहरादून में कुमाऊंनी चॉकलेट मिठाई का जलवा ही अलग है. ये मिठाई देहरादून की कई दुकानों पर बेची जाती है. पहाड़ के रहने वाले लोग ही नहीं बल्कि पर्यटक भी इन्हें अपने साथ लेकर जाते हैं. अल्मोड़ा शहर को इस मिठाई का जन्मस्थान माना जाता है. भले ही इसे ‘चॉकलेट’ कहा जाता है, लेकिन इसमें किसी भी तरह के कोको या बाजारू चॉकलेट का इस्तेमाल नहीं होता है. यह शुद्ध मावे से बनने वाली एक भुनी हुई मिठाई है. देहरादून की अल्मोड़ा रसोई में आपको चॉकलेट मिठाई 550-600 रुपये प्रति किलो मिल जाएगी.
देहरादून के सहस्त्रधारा रोड पर स्थित ‘अल्मोड़ा रसोई’ में जब लोग पहुंचते हैं, तो उन्हें कुमाऊं की असली बाल मिठाई और चॉकलेट मिठाई का वही पुराना और असली स्वाद महसूस होता है. शहर की ऐतिहासिक ‘बंगाली स्वीट शॉप’ और ‘कुमार स्वीट शॉप’ अपने सालों पुराने लाजवाब जायके के कारण शहरवासियों की पहली पसंद बनी हुई हैं. ये दुकानें पहाड़ के जायके को शहर में बनाए हुए हैं.
देहरादून के मिठास भरे इस सफर में प्रेमनगर स्थित ‘कालरा स्वीट शॉप’ की चॉकलेट मिठाई का जायका भी लोगों को बहुत पसंद आता है, जहां शुद्धता का खास ध्यान रखा जाता है. दूसरी ओर राजपुर रोडस्थित ‘एलोरा मेल्टिंग मोमेंट’ की बेकरी और टेस्टी कुकीज इस स्वाद यात्रा को और भी अनोखा बना देती हैं. ये सभी जगहें केवल मिठाइयां और बेकरी उत्पाद बेचने का काम नहीं करतीं, बल्कि अपने पुराने जायके और खुशबू के जरिए पहाड़ की समृद्ध संस्कृति और बचपन की पुरानी यादों को फिर से जीवंत कर देती हैं.
कुमाऊंनी मिठाइयों में सबसे खास पहचान रखने वाली ‘चॉकलेट मिठाई’ का इतिहास बहुत दिलचस्प और पुराना है. अल्मोड़ा शहर को इस मिठाई का जन्मस्थान माना जाता है, जहां बीसवीं सदी की शुरुआत में इस खास मिठास को तैयार किया गया था. हालांकि इसे ‘चॉकलेट’ कहा जाता है, लेकिन इसमें किसी भी तरह के कोको या बाजारू चॉकलेट का इस्तेमाल नहीं होता है. यह शुद्ध मावे से बनने वाली एक भुनी हुई मिठाई है, जिसका रंग और बनावट चॉकलेट जैसी दिखाई देती है. समय के साथ यह पूरे देश और विदेशों में अपनी पहचान बना चुकी है.
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चॉकलेट मिठाई को तैयार करने की प्रक्रिया बहुत मेहनत और धैर्य से भरी होती है. सबसे पहले शुद्ध भैंस या गाय के दूध को कड़ाही में धीमी आंच पर लंबे समय तक पकाया जाता है, जिससे गाढ़ा मावा तैयार होता है. इसके बाद मावे में निश्चित मात्रा में चीनी मिलाकर उसे लगातार चलाया जाता है. जैसे-जैसे चीनी पिघलती है और मावे के साथ भुनती है, इसका रंग धीरे-धीरे गहरा भूरा होने लगता है. जब मावा पूरी तरह पककर चॉकलेट के रंग का हो जाता है, तो उसे एक बर्तन में जमाकर छोटे-छोटे आयताकार टुकड़ों में काट लिया जाता है.
पहाड़ी चॉकलेट मिठाई का स्वाद केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पौष्टिकता से भी भरपूर होती है. इसे बनाने में केवल दूध, चीनी और पारंपरिक तरीके का इस्तेमाल होता है, इसलिए इसमें कोई रासायनिक तत्व नहीं मिलाए जाते हैं. स्थानीय दुकानदार ऋषि बताते हैं कि कि पहाड़ों की यह पारंपरिक चॉकलेट मिठाई आज की बड़ी-बड़ी ब्रांडेड चॉकलेट्स को भी स्वाद और शुद्धता के मामले में कड़ी टक्कर देती है. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई इस मिठाई को बड़े चाव से खाना पसंद करता है.
अल्मोड़ा से शुरू हुआ यह जायका आज केवल उत्तराखंड तक सीमित न रहकर देश-विदेश के पर्यटकों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो चुका है. जब भी कोई पर्यटक देवभूमि उत्तराखंड या देहरादून घूमने आता है, तो वह यहां से चॉकलेट मिठाई और बाल मिठाई पैक करवाकर ले जाना कभी नहीं भूलता. शादी-विवाह, त्योहारों और विशेष सांस्कृतिक अवसरों पर इस मिठाई का उपहार देना शुभ माना जाता है.
पलटन बाजार के दुकानदार कृष्ण बताते हैं कि इस मिठाई के बनाने का तरीका अलग है. इसे बनाने के लिए खोये को धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है, जब तक इसके रंग भूरा न हो जाए. इसके बाद इसे एक ट्रे पर घी लगाकर इसमें तैयार खोया डालकर पीस में काटा जाता है. जिन्हें इस मिठाई को पारंपरिक विधि से बनाने का सालों का अनुभव होता है. यही कारण है कि देहरादून में मिलने वाली इस मिठाई के स्वाद में जरा भी बदलाव नहीं आया है. यह जायका यहां रहने वाले प्रवासियों को अपने गांव और घर की गलियों का अहसास कराता है.
देहरादून की ये मशहूर मिठाई दुकानें सिर्फ कारोबार नहीं कर रही हैं, बल्कि पहाड़ की लोक संस्कृति और जायके को जीवंत रखने का बड़ा जरिया बनी हुई हैं. अगर आप भी देहरादून में हैं और पहाड़ों के उस असली मिठास भरे स्वाद को मिस कर रहे हैं, तो इन जगहों का दौरा जरूर करें. यहां आपको चॉकलेट मिठाई 550-600 रुपये प्रति किलो मिल जाएगी.