नई दिल्ली (CBSE Dummy School). इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षा (जेईई, नीट) की तैयारी के नाम पर फल-फूल रहे ‘डमी स्कूल’ सरकारी एजेंसियों की रडार पर आ गए हैं. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने सीबीएसई स्कूलों में धड़ल्ले से चल रहे डमी दाखिलों पर चिंता जताई है. आयोग ने बोर्ड से सिफारिश की है कि वह अपने स्कूलों में औचक निरीक्षण करे. इससे 75% अनिवार्य उपस्थिति के नियमों का उल्लंघन रोका जा सकेगा और फर्जी तरीके से जारी हो रहे पासिंग सर्टिफिकेट्स पर लगाम लगाई जा सकेगी.
डमी स्कूल क्या होते हैं और इन्हें ‘नॉन-अटेंडिंग’ क्यों कहा जाता है?
डमी स्कूल मान्यता प्राप्त ऐसे स्कूल होते हैं, जो स्टूडेंट्स को नियमित रूप से क्लासेस में आए बिना सिर्फ परीक्षा में बैठने की छूट देते हैं. इन्हें बोलचाल की भाषा में ‘नॉन-अटेंडिंग स्कूल’ भी कहा जाता है. स्टूडेंट किसी दूरदराज शहर (जैसे कोटा, सीकर या दिल्ली) में रहकर कोचिंग पढ़ते हैं, जबकि उनका नाम किसी लोकल स्कूल के रजिस्टर में दर्ज रहता है. स्कूल मैनेजमेंट रुपये लेकर कागजों में उनकी अटेंडेंस पूरी दिखाता रहता है. स्टूडेंट्स सीधे प्रैक्टिकल या फाइनल बोर्ड परीक्षा देने ही स्कूल पहुंचते हैं.
क्या डमी स्कूल कानूनी रूप से लीगल हैं?
डमी स्कूल गैर-कानूनी (Illegal) माने जाते हैं. सीबीएसई और अन्य राज्य शिक्षा बोर्ड के स्पष्ट दिशानिर्देश हैं कि किसी भी स्टूडेंट को बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम 75% उपस्थिति अनिवार्य है. डमी व्यवस्था बोर्ड के संबद्धता नियमों (Affiliation Bye-Laws) का सीधा उल्लंघन है. यही वजह है कि हाल के दिनों में सीबीएसई ने औचक निरीक्षण करके देशभर में कई ऐसे डमी स्कूलों की मान्यता रद्द की है, जो सिर्फ कागजों पर चलाए जा रहे थे.
डमी स्कूल में कौन एडमिशन लेता है और पढ़ाई कैसे होती है?
11वीं और 12वीं क्लास के जो स्टूडेंट्स जेईई, नीट या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे होते हैं, वे डमी स्कूल में एडमिशन ले लेते हैं. इनका मानना होता है कि स्कूल जाने से उनका समय बर्बाद होगा और वे कोचिंग की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाएंगे. इनकी पढ़ाई सिर्फ कोचिंग इंस्टीट्यूट, ऑनलाइन ऐप या पर्सनल ट्यूशन के भरोसे होती है. ये स्टूडेंट्स स्कूल की किताबें और बोर्ड का सिलेबस कोचिंग के साथ ही खुद से मैनेज करते हैं.
डमी कल्चर का फायदा: समय की बचत और सिंगल फोकस
स्टूडेंट्स और उनके पेरेंट्स के नजरिए से देखें तो डमी स्कूल का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है. 6 से 8 घंटे स्कूल में बिताने के बजाय छात्र वह पूरा समय प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगाते हैं. इसके अलावा, उन्हें स्कूल के प्रोजेक्ट्स, असेंबली, यूनिफॉर्म और अटेंडेंस के प्रेशर से मुक्ति मिल जाती है. कई मामलों में स्टूडेंट्स को अपने राज्य का डोमिसाइल (State Quota) बनाए रखने के लिए भी होम स्टेट के डमी स्कूल में एडमिशन लेना पड़ता है.
डमी कल्चर का नुकसान: मेंटल हेल्थ और ऑलराउंड डेवलपमेंट पर असर
डमी स्कूल से समय की बचत भले हो जाए, लेकिन इनसे मानसिक और सामाजिक विकास को भारी नुकसान पहुंचता है. 15-16 साल की उम्र में स्कूल का माहौल डिसिप्लिन, टीमवर्क, दोस्ती और इमोशनल रूप से मजबूत बनना सिखाता है. लगातार कोचिंग की चारदीवारों में बंद रहने से स्टूडेंट्स अकेलेपन और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं. इसके अलावा, खेलकूद और एक्सट्रा करिकुलर एक्टिविटीज से दूर रहने के कारण उनकी पर्सनैलिटी वन-साइडेड रह जाती है. इससे आगे चलकर कॉलेज में Adjustment की समस्या आती है.