CBI Case IRS Harish Kumar Tanwar: IIT से BTech-MTech, UPSC में 939वीं रैंक…कौन हैं IRS हरीश तंवर, लगा 1 करोड़ की घूस का आरोप

CBI Case IRS Harish Kumar Tanwar: IIT से BTech-MTech, UPSC में 939वीं रैंक…कौन हैं IRS हरीश तंवर, लगा 1 करोड़ की घूस का आरोप


Who is IRS Harish Kumar Tanwar: देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान IIT दिल्ली से पढ़ाई फिर प्राइवेट कंपनी में नौकरी, उसके बाद केंद्र सरकार में इंजीनियर और आखिरकार यूपीएससी पास करके आईआरएस अधिकारी बने.यह कहानी है हरीश कुमार तंवर की जो अब एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप में सीबीआई की गिरफ्त में हैं. चेन्नई में गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) के डिप्टी डायरेक्टर के पद पर तैनात तंवर पर आरोप है कि उन्होंने करीब 34 हजार करोड़ रुपये के डीएचएफएल लोन घोटाले की जांच में राहत दिलाने के बदले रिश्वत मांगी थी. सीबीआई ने इस मामले में उनके साथ दिल्ली के एक वकील और उसके रिश्तेदार को भी गिरफ्तार किया है. आखिर कौन हैं हरीश कुमार तंवर? उन्होंने कहां से पढ़ाई की, यूपीएससी में कितनी रैंक हासिल की और कैसे एक इंजीनियर से आईआरएस अफसर बने? आइए जानते हैं सबकुछ

कौन हैं IRS हरीश कुमार तंवर?

हरीश कुमार तंवर भारतीय राजस्व सेवा यानी इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) के 2017 बैच के अधिकारी हैं. उनका संबंध आयकर विभाग की आईआरएस शाखा से है जिसे IRS (Income Tax) कहा जाता है. यह सेवा केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT)के अंतर्गत आती है. तंवर ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद सिविल सेवा में जाने का फैसला किया था.यूपीएससी परीक्षा पास करने से पहले वह प्राइवेट सेक्टर और केंद्र सरकार के इंजीनियरिंग विभाग में भी काम कर चुके थे.आईआरएस बनने के बाद उन्होंने दिल्ली में आयकर विभाग के कई पदों पर जिम्मेदारियां संभालीं. बाद में वह प्रतिनियुक्ति पर गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय यानी एसएफआईओ में चले गए. अगस्त 2025 में उन्हें एसएफआईओ में डिप्टी डायरेक्टर (इन्वेस्टिगेशन) के पद पर नियुक्त किया गया था. इसके बाद उनकी तैनाती चेन्नई कार्यालय में हुई.

IIT दिल्ली से की BTech और मास्टर डिग्री की पढ़ाई

हरीश कुमार तंवर की शैक्षणिक पृष्ठभूमि इंजीनियरिंग की रही है. उन्होंने देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली से पढ़ाई की.तंवर ने साल 2008 से 2012 के बीच आईआईटी दिल्ली से सिविल इंजीनियरिंग में बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी यानी बीटेक की डिग्री हासिल की.इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और इसी संस्थान से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की.उन्होंने साल 2013 से 2015 के बीच मास्टर डिग्री की पढ़ाई पूरी की थी.इस तरह तंवर ने पहले सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया और फिर स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता हासिल की.

IIT से पढ़ाई के बाद की नौकरी

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद हरीश कुमार तंवर ने अपने करियर की शुरुआत प्राइवेट सेक्टर से की.
वह गोदरेज प्रॉपर्टीज से जुड़े जहां उन्होंने ट्रेनी सीनियर एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम किया हालांकि वह लंबे समय तक प्राइवेट सेक्टर में नहीं रहे.इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार के एक इंजीनियरिंग विभाग में नौकरी की.तंवर केंद्रीय लोक निर्माण विभाग यानी सीपीडब्ल्यूडी (CPWD) से जुड़ गए.

सरकारी इंजीनियर भी रह चुके हैं तंवर

हरीश कुमार तंवर ने केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के पद पर भी काम किया है.उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में थी.उन्होंने दिसंबर 2016 से अगस्त 2017 तक गाजियाबाद में इस पद पर काम किया.सीपीडब्ल्यूडी केंद्र सरकार का एक महत्वपूर्ण संगठन है. यह सरकारी इमारतों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं की योजना बनाने, निर्माण कराने और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालता है.इस तरह हरीश कुमार तंवर का करियर पहले प्राइवेट कंपनी और फिर सरकारी इंजीनियरिंग सेवा से जुड़ा रहा.इसके बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के जरिए प्रशासनिक क्षेत्र में कदम रखा.

UPSC में कितनी रैंक आई थी, कब बने IRS?

हरीश कुमार तंवर ने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा 2016 में सफलता हासिल की थी.उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उन्होंने इस परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 939 प्राप्त की थी.सिविल सेवा परीक्षा में उन्हें मुख्य परीक्षा के 785 अंक और इंटरव्यू में 168 अंक मिले थे.तंवर अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से आते हैं. उन्हें उनकी रैंक और श्रेणी के आधार पर भारतीय राजस्व सेवा की आयकर शाखा आवंटित हुई थी.इसके बाद वह 2017 बैच के आईआरएस अधिकारी बने.अगस्त 2017 में उन्होंने भारतीय राजस्व सेवा जॉइन की.

IRS बनने के बाद कहां हुई ट्रेनिंग?

भारतीय राजस्व सेवा में चयन के बाद हरीश कुमार तंवर ने सिविल सेवा अधिकारियों के लिए निर्धारित प्रशिक्षण प्राप्त किया.उन्होंने उत्तराखंड के मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में फाउंडेशन ट्रेनिंग ली.इसके बाद उन्होंने नागपुर स्थित राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी यानी नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (NADT) में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया.यहां आयकर सेवा के अधिकारियों को प्रत्यक्ष कर प्रशासन और उससे जुड़े कामकाज की ट्रेनिंग दी जाती है.प्रशिक्षण पूरा करने के बाद तंवर की तैनाती आयकर विभाग में हुई.

दिल्ली में असिस्टेंट कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर रहे

आईआरएस अधिकारी बनने के बाद हरीश कुमार तंवर ने दिल्ली में आयकर विभाग के विभिन्न पदों पर काम किया.
वह असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स के पद पर तैनात रहे.इसके बाद उन्होंने डिप्टी कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स की जिम्मेदारी भी संभाली.आयकर विभाग में काम करने के बाद उनके करियर में एक और बदलाव आया जब उन्हें गंभीर कॉर्पोरेट धोखाधड़ी के मामलों की जांच करने वाली एजेंसी एसएफआईओ में जिम्मेदारी मिली.

अगस्त 2025 में SFIO में मिली बड़ी जिम्मेदारी

हरीश कुमार तंवर को अगस्त 2025 में गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय यानी सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) में डिप्टी डायरेक्टर (इन्वेस्टिगेशन) नियुक्त किया गया.यह नियुक्ति प्रतिनियुक्ति के आधार पर हुई थी.
एसएफआईओ केंद्रीय कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली एक विशेष जांच एजेंसी है.यह एजेंसी कंपनियों से जुड़े गंभीर और जटिल वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों की जांच करती है.खासकर ऐसे मामले जिनमें बड़ी रकम, जटिल वित्तीय लेनदेन और कंपनी कानून के कथित उल्लंघन शामिल होते हैं उनकी जांच एसएफआईओ के जिम्मे आ सकती है. तंवर को बाद में एसएफआईओ के चेन्नई कार्यालय में तैनात किया गया.इसी पद पर रहते हुए उनका नाम डीएचएफएल से जुड़े मामले में सामने आया है.

एक करोड़ रुपये की रिश्वत का आरोप 

हरीश कुमार तंवर की गिरफ्तारी करीब 34 हजार करोड़ रुपये के डीएचएफएल लोन घोटाले से जुड़ी एक जांच के सिलसिले में हुई है.सीबीआई के मुताबिक तंवर पर आरोप है कि उन्होंने एसएफआईओ की जांच में एक कारोबारी को फायदा पहुंचाने के बदले एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी.शिकायतकर्ता का आरोप था कि उससे बिचौलियों के जरिए रिश्वत की मांग की जा रही थी.इतना ही नहीं शिकायत के मुताबिक रकम नहीं देने पर उसे गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी भी दी गई थी.इसी शिकायत के आधार पर सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की.

12 अक्टूबर को शिकायत, CBI ने दर्ज किया केस

सीबीआई को सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को एक कारोबारी से शिकायत मिली थी.कारोबारी ने आरोप लगाया कि एसएफआईओ के अधिकारी हरीश कुमार तंवर और कुछ अन्य लोग उससे एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांग रहे हैं.शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने आरोपों की जांच और सत्यापन किया.इसके बाद मंगलवार 13 अक्टूबर को हरीश कुमार तंवर दिल्ली के एक वकील और कुछ अज्ञात सरकारी अधिकारियों तथा अन्य व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.सीबीआई ने रिश्वत की मांग से जुड़े आरोपों की पुष्टि के लिए आगे कार्रवाई की योजना बनाई.

20 लाख रुपये की लेते पकड़े जाने का आरोप

सीबीआई के मुताबिक एक करोड़ रुपये की कथित रिश्वत में से 20 लाख रुपये पहली किस्त के तौर पर लिए जाने थे.जांच एजेंसी ने शिकायत के सत्यापन के बाद आरोपियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया.इस दौरान दिल्ली के अधिवक्ता भरत शर्मा ने शिकायतकर्ता से कथित तौर पर 20 लाख रुपये लिए.सीबीआई का आरोप है कि यह रकम एसएफआईओ अधिकारी हरीश कुमार तंवर की ओर से ली गई थी.इसके बाद सीबीआई ने हरीश कुमार तंवर, अधिवक्ता भरत शर्मा और उनके रिश्तेदार आर्यन शर्मा को गिरफ्तार कर लिया.आरोप है कि वकील शिकायतकर्ता और एसएफआईओ अधिकारी के बीच बिचौलिए की भूमिका निभा रहा था.

क्या है DHFL का 34 हजार करोड़ रुपये वाला मामला?

जिस डीएचएफएल मामले की जांच में कथित तौर पर राहत दिलाने के बदले रिश्वत मांगी गई वह देश के बड़े वित्तीय घोटालों से जुड़े मामलों में शामिल है.डीएचएफएल यानी दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड एक बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी थी.इस कंपनी के वित्तीय लेनदेन और कथित अनियमितताओं को लेकर कई केंद्रीय जांच एजेंसियों ने जांच की है.डीएचएफएल से जुड़े मामलों में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की जांच भी सामने आ चुकी है.इनमें यस बैंक और उसके पूर्व प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी राणा कपूर से जुड़े वित्तीय लेनदेन भी शामिल रहे हैं.

3700 करोड़ रुपये का लेनदेन

डीएचएफएल से जुड़े एक पुराने मामले में सीबीआई ने मार्च 2020 में केस दर्ज किया था.यह मामला साल 2018 के दौरान यस बैंक और डीएचएफएल के बीच हुए वित्तीय लेनदेन से जुड़ा था.सीबीआई के आरोपों के मुताबिक यस बैंक ने अप्रैल से जून 2018 के बीच डीएचएफएल की ओर से जारी शॉर्ट टर्म डिबेंचर में करीब 3700 करोड़ रुपये का निवेश किया था.इसके अलावा यस बैंक ने डीएचएफएल समूह की एक कंपनी को 750 करोड़ रुपये का टर्म लोन भी मंजूर किया था.जांच एजेंसी ने इन लेनदेन में कथित अनियमितताओं और संबंधित व्यक्तियों को फायदा पहुंचाए जाने के आरोपों की जांच की थी.सीबीआई ने आरोप लगाया था कि इन वित्तीय लेनदेन के बदले यस बैंक के तत्कालीन एमडी और सीईओ राणा कपूर को करीब 600 करोड़ रुपये का कथित अनुचित लाभ पहुंचाया गया था.



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