UP Gram Pradhan Election: हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी 3 महीने में नहीं होंगे प्रधानी चुनाव? सुप्रीम कोर्ट क्यों जा सकती है योगी सरकार


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UP Gram Pradhan Election: यूपी में जैसे ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में तीन महीने के भीतर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने का निर्देश, वैसे ही पंचायत चुनाव की चर्चा ने तेजी पकड़ ली. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भले ही तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया हो. चुनाव होने तक मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने की बात भी कही हो. लेकिन अब सवाल है कि ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों के बीच सरकार इस समयसीमा पर क्या कदम उठाएगी. क्या सच में तीन महीने के अंदर ही पंचायत चुनाव हो जाएंगे? या सरकार समय लेने के लिए जा सकती है सुप्रीम कोर्ट? जान लेते हैं पूरी खबर.

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 3 महीने में भी नहीं होंगे प्रधानी चुनाव? जानिए SC क्यों जा सकती है योगी सरकारZoom

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों के चुनाव, हाईकोर्ट की समयसीमा और सरकार के संभावित कानूनी विकल्पों से जुड़ी खबर.

UP Gram Pradhan Election High Court Order: उत्तर प्रदेश में प्रधानी चुनाव की राह देख रहे ग्रामीणों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी खुशखबरी 14 अक्टूबर को दी है. इस फैसले के बाद गांवों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक पंचायत चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है. ग्राम प्रधान बनने की तैयारी कर रहे दावेदारों की नजर भी अब चुनाव की तारीखों पर टिकी है. लेकिन इस आदेश के साथ कई सवाल भी खड़े हो गए हैं. क्या यूपी में वाकई अगले तीन महीने के भीतर प्रधानी चुनाव हो जाएंगे? ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों के बीच सरकार के लिए अदालत की समयसीमा का पालन करना कितना आसान होगा? क्या योगी सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है? आइए, समझते हैं हाईकोर्ट के फैसले के बाद पंचायत चुनाव की राह में आगे क्या हो सकता है.

हाईकोर्ट ने तीन महीने में पंचायत चुनाव कराने का दिया आदेश

मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने इस अहम मामले पर अपना फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट तौर पर राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह निर्वाचन आयोग को बिना किसी देरी के जरूरी संसाधन, सुरक्षा बल और प्रशासनिक कर्मचारी मुहैया कराए ताकि समय सीमा में वोटिंग पूरी कराई जा सके. इस सख्त रुख के बाद राज्य सरकार के सामने एक बड़ी कानूनी और व्यावहारिक चुनौती खड़ी हो गई है.  इस आदेश के बाद पंचायत चुनाव को लेकर चल रहा इंतजार फिर चर्चा में आ गया है. अब सरकार और निर्वाचन आयोग के सामने तय समयसीमा के भीतर चुनाव की तैयारियां पूरी करने की चुनौती है. हालांकि, चुनाव की तारीखों का अंतिम कार्यक्रम राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से जारी किया जाना है.

प्रशासक व्यवस्था को हरी झंडी

अदालत ने सुनवाई के दौरान सरकार के उस पुराने फैसले को वैध माना है, जिसके तहत ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने पर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही गांवों का प्रशासक नियुक्त किया गया था. कोर्ट ने कहा कि जब तक मतदान की प्रक्रिया पूर्ण होकर नई पंचायतें अस्तित्व में नहीं आ जातीं. तब तक पुराने प्रधान ही गांवों में प्रशासक के तौर पर अपना कामकाज संभालते रहेंगे. इस आदेश से फिलहाल गांवों के विकास कार्यों के ठप होने का संकट टल गया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या तीन महीने में हो जाएंगे प्रधानी चुनाव?

क्या तीन महीने में हो जाएंगे प्रधानी चुनाव?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश में तीन महीने के भीतर ग्राम प्रधानों के चुनाव हो पाएंगे. इसके लिए केवल तारीख तय करना काफी नहीं होगा. चुनाव की प्रक्रिया, जरूरी प्रशासनिक तैयारियां और आरक्षण से जुड़े पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा. निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने के लिए कर्मचारियों और दूसरी व्यवस्थाओं का इंतजाम करना होगा. ऐसे में तय समयसीमा के भीतर पूरी प्रक्रिया संपन्न कराना सरकार और आयोग के लिए अहम होगा.

ओबीसी आरक्षण की बड़ी अड़चन

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव टलने या सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के पीछे सबसे बड़ा तकनीकी कारण पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण और ‘ट्रिपल टेस्ट’ है. सरकार द्वारा गठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए छह महीने का वक्त दिया गया था. आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह का कहना है कि वे 20 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट देने की पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन इसके बाद सीटों के आरक्षण की सूची फाइनल करने में कम से कम एक महीने का अतिरिक्त समय और लगेगा.

2027 के विधानसभा चुनाव का टकराव

उत्तर प्रदेश में साल 2027 का सबसे बड़ा विधानसभा चुनाव होना लगभग तय है. हाईकोर्ट की तीन महीने की डेडलाइन का सीधा मतलब है कि प्रधानी के चुनाव भी ठीक उसी दौरान कराने होंगे. एक साथ दो बड़े और संवेदनशील चुनाव कराना किसी भी राज्य के प्रशासनिक ढांचे के लिए बेहद पेचीदा काम है, जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने का खतरा भी बना रहता है.

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर के बयान के मुताबिक, सरकार अदालत के फैसले का पूरा सम्मान करती है, लेकिन इस समय निर्णय की कानूनी प्रतियों और संवैधानिक प्रावधानों का गहराई से अध्ययन किया जा रहा है. सचिवालय से जुड़े सूत्रों का दावा है कि भारी पुलिस बल की व्यस्तता, यूपी बोर्ड की परीक्षाएं और आरक्षण रिपोर्ट में लगने वाले समय को आधार बनाकर सरकार बहुत जल्द सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकती है. तो कुल मिलाकर अगर हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक हुआ तो तीन महीने के अंदर चुनाव हो जाएंगे. और अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट जाती है तो आगे की स्थिति अदालत के आदेश और मामले की सुनवाई पर निर्भर करेगी. तब तक सभी को अब चुनाव आयोग के आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा.



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