यहां सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले दूध के पैकेट मावा कारोबारियों को बेचने का मामला सामने आया है. आरोप है कि बच्चों के हिस्से का दूध स्कूलों तक पहुंचने या बच्चों को मिलने के बजाय मावा बनाने के काम में इस्तेमाल करने के लिए बेच दिया गया. इस मामले में तीन दिन पहले चार शिक्षकों और दो मावा कारोबारियों को गिरफ्तार किया गया था. अब सूत्रों के अनुसार, राज्य के अलग-अलग स्कूलों में तैनात 116 अन्य शिक्षक भी पुलिस की जांच के दायरे में हैं.
बच्चों को मिलना था दूध, भट्टियों तक पहुंचा पाउडर
चीथवाड़ी में मावा बनाने वाली भट्टियों में दूध पाउडर की बड़ी मात्रा बेचे जाने की बात सामने आई है. सामोद पुलिस थाना अधिकारी हेमराज सिंह के अनुसार, यहां करीब 5,000 किलो दूध पाउडर बेचने की जानकारी मिली है. पिछले दिनों पुलिस ने वहां से 3,000 किलो दूध पाउडर बरामद किया था. अब इस मामले को केवल दूध के पैकेटों की खरीद-बिक्री के रूप में देखना काफी नहीं होगा. सवाल यह है कि बच्चों को पोषण देने के लिए तय दूध आखिर उन तक पहुंचा या नहीं. अगर सरकारी योजना के तहत दिया जाने वाला दूध गलत तरीके से बाजार में बेचा गया, तो इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ सकता है जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है. माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं तो उन्हें भरोसा रहता है कि वहां पढ़ाई के साथ बच्चों की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाएगा. ऐसे में दूध के पैकेट बेचने का मामला सामने आने के बाद यह भरोसा भी सवालों के घेरे में है.
पुलिस ने इस मामले में सरकारी स्कूलों के चार शिक्षकों कन्हैया लाल, सुरेश कुमार, सुरेंद्र कुमार और जगदीश प्रसाद को गिरफ्तार किया है. इनके साथ मावा कारोबारियों रामस्वरूप और मनोज को भी गिरफ्तार किया गया है. पुलिस मामले में पूछताछ कर रही है और दूध पाउडर की खरीद-बिक्री से जुड़ी कड़ियों को जोड़ने में जुटी है. पूछताछ में सामने आया कि दूध के पैकेट भीलवाड़ा स्थित एसबीजी प्राइवेट लिमिटेड के गोदाम से लाए गए थे. अब पुलिस की जांच का दायरा बढ़ने के साथ यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि दूध पाउडर कहां से आया, किसके जरिए कारोबारियों तक पहुंचा और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही.
116 शिक्षक भी जांच के दायरे में
इस मामले का दायरा अब छह गिरफ्तार लोगों तक सीमित नहीं बताया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, अलग-अलग सरकारी स्कूलों में तैनात 116 शिक्षक भी पुलिस की जांच के दायरे में हैं. हालांकि, जांच में नाम आने का मतलब यह नहीं है कि इन सभी शिक्षकों ने दूध बेचने में भूमिका निभाई है. उनकी भूमिका और जिम्मेदारी पुलिस की जांच के बाद ही साफ होगी. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी योजना के तहत बच्चों के लिए भेजे जाने वाले दूध की निगरानी कैसे हुई और इतनी बड़ी मात्रा में दूध पाउडर मावा कारोबारियों तक कैसे पहुंचा. पुलिस की जांच से इस पूरे मामले की और जानकारी सामने आने की उम्मीद है.
हर बच्चे के हिस्से में तय है दूध की मात्रा
सरकारी व्यवस्था के तहत कक्षा एक से पांच तक के प्रत्येक छात्र के लिए रोज 15 ग्राम दूध पाउडर दिया जाता है. वहीं, कक्षा छह से आठ तक के बच्चों के लिए प्रतिदिन 20 ग्राम दूध पाउडर तय है. मात्रा सुनने में कम लग सकती है, लेकिन जब यही व्यवस्था हजारों बच्चों के लिए लागू होती है, तो कुल मात्रा काफी बड़ी हो जाती है. इसीलिए इस योजना में दूध की खरीद, भंडारण और बच्चों तक वितरण का हिसाब रखना जरूरी है. अगर दूध पाउडर बच्चों को देने के बजाय दूसरी जगह बेचने का आरोप सही साबित होता है, तो यह सरकारी योजना के उद्देश्य को नुकसान पहुंचाने वाला मामला होगा. चीथवाड़ी से सामने आई घटना ने एक जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है: बच्चों के पोषण के लिए आने वाली चीजों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? माता-पिता शिक्षकों पर भरोसा करते हैं और सरकार की योजनाओं से उम्मीद रखते हैं. अब पुलिस की जांच से यह साफ होना बाकी है कि इस मामले में कितने लोग शामिल थे और बच्चों के हिस्से का दूध किन रास्तों से कारोबारियों तक पहुंचा.