OPINION: राहुल गांधी जी! आपकी नेहा बोरा तो ‘खतरनाक’ निकली, कुछ बोलेंगे या यूं ही चुप्प रहेंगे?

OPINION: राहुल गांधी जी! आपकी नेहा बोरा तो ‘खतरनाक’ निकली, कुछ बोलेंगे या यूं ही चुप्प रहेंगे?


एसआईआर (SIR) में गड़बड़ी का गंभीर आरोप लगाकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक के साथ मिलकर ताबड़तोड़ धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक नया और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है. वामपंथी छात्र संगठन ‘आइसा’ (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा का इस आंदोलन की ‘पोस्टर गर्ल’ के रूप में उभरना. सवाल यह उठता है कि क्या विरोध की राजनीति अब लोकतांत्रिक सीमाओं को लांघकर अराजकता की राह पर चल पड़ी है?

राहुल गांधी के मार्च में नेहा बोरा का विशेष रसूख

12 अक्टूबर को हुए एक मार्च के दौरान, नेहा बोरा के लिए रास्ता बनाने के लिए राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार तक को धक्का देते नजर आए. इतना ही नहीं, राहुल गांधी ने उन्हें अपनी सुरक्षा के कड़े पहरे के बीच, बहन प्रियंका गांधी के करीब जगह दी और गठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उन्हें अलग से बोलने का मंच प्रदान किया.

प्रदर्शन में शामिल हुए NSUI के छात्रों को भी नेहा बोरा के मुकाबले वो तवज्जो नहीं दी.

कांग्रेस के पास अपना स्थापित छात्र संगठन NSUI मौजूद है, जिसके कार्यकर्ता लगातार सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं और पुलिस की लाठियां खा रहे हैं. इसके बावजूद, राहुल गांधी की ओर से नेहा बोरा जैसी छात्र नेता को अपने आंदोलन का चेहरा बनाना कई बड़े सवाल खड़े करता है, जिसके तार और विचार देश के बाहर की घटनाओं से जुड़े दिखते हैं.

इंडिया ब्लाक के नेताओं के सामने भी राहुल नेहा बोरा को अलग ही तवज्जो देते दिखे.

नेहा बोरा का विवादित बयान:

सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी. आपको बधाई कि आपने इस देश के लोगों के प्रति अपना समर्थन और एकजुटता दिखाई है. हम जानते हैं कि बांग्लादेश में यह आंदोलन लोकतंत्र और वोटिंग के अधिकार के लिए शुरू हुआ था.

बांग्लादेशी मॉडल और अराजकता की आशंका

नेहा बोरा का एक वीडियो सामने आने के बाद सियासी पारा चढ़ गया है, जिसमें वह यह कहती नजर आ रही हैं कि उन्हें भारत में धरना-प्रदर्शन करने की प्रेरणा बांग्लादेश में हुए आंदोलन से मिली है. इसी संदर्भ में, बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने तीखा प्रहार करते हुए कहा-

नेहा बोरा जो राहुल गांधी के पूरे धरना-प्रदर्शन की पोस्टर गर्ल हैं. जैसा बांग्लादेश के अंदर हुआ, वह वैसा ही भारत के अंदर करना चाहती हैं. इससे यह साबित होता है कि राहुल गांधी का मकसद राजनीतिक प्रतिरोध नहीं है, उनका मकसद भारत के अंदर संविधान और लोकतंत्र को तबाह करना है.

यही नहीं, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का एक बयान भी चर्चा में है, जिसमें वह कहते सुने गए- ‘हमारे पास ऑप्शन क्या है, हम क्रांति करा लें, लेकिन उसमें बहुत सारा खून-खराबा होगा.’ जब विरोध के नाम पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सोचना लाजिमी हो जाता है कि क्या देश में लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में सत्ता परिवर्तन का कोई खतरनाक एजेंडा तैयार किया जा रहा है?

प्रतीकों की राजनीति और विदेशी फंडिंग के आरोप

विवाद सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदर्शन के दौरान पहने जाने वाले प्रतीकों पर भी सवाल उठ रहे हैं. नेहा बोरा की आरे से पहनी गई टी-शर्ट पर बने सिंबल (एनीमे सीरीज से जुड़ा प्रतीक) का इस्तेमाल दुनिया के कई देशों में हिंसक प्रदर्शनों और सरकारों को अस्थिर करने के अभियानों में किया जा चुका है.

दूसरी ओर, अमेरिकी सिंगर मैरी मिल्बेन ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कड़ा रुख अपनाते हुए विपक्षी नेताओं पर विदेशी फंडिंग और अराजकता फैलाने के प्रयास का आरोप लगाया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अराजकता कभी नहीं जीतती और भारत को किसी बाहरी समर्थन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डेढ़ अरब भारतीयों का अटूट आशीर्वाद प्राप्त है.

विरोध लोकतांत्रिक हो, अराजकता नहीं

आज देश में चुनावी सुधार और एसआईआर जैसे मुद्दों पर बहस होना स्वाभाविक और लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन जब विरोध के मंच पर खड़े चेहरे विदेशी क्रांतियों की तर्ज पर देश में उथल-पुथल मचाने की बात खुलेआम कहें, और मुख्य विपक्षी दल के नेता खामोशी से उन्हें शह दें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है.

राहुल गांधी को देश की जनता को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या उनका राजनीतिक संघर्ष संविधान के दायरे में है, या फिर इसके पीछे किसी बड़े षड्यंत्र की पटकथा लिखी जा रही है? देश लोकतंत्र और कानून से चलता है, अराजकता और विदेशी तख्तापलट के सपनों से नहीं.

राहुल गांधी से सीधा सवाल

राहुल गांधी इस वक्त लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं. यह एक संवैधानिक पद है. 2024 के लोकसभा चुनाव में जनता ने उन्हें जरूरी जिम्मेदारी सौंपी है. अगर राहुल गांधी लोकतंत्र और भारतीय संविधान के मर्म को समझ पाए होंगे तो उन्हें भली-भांति मालूम होना चाहिए कि नेता प्रतिपक्ष का पद कई मायने में सरकार से ज्यादा बढ़कर हो जाती है. जनता ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष इसलिए बनाया है कि वह सरकार की गलत नीतियों पर आवाज उठाएं और जनहित के मुद्दों को सरकार तक पहुंचाएं. लेकिन राहुल गांधी पिछले कुछ समय से जिस राह पर दिख रहे हैं उसपर सवाल उठना लाजिमी है.

लगातार चुनावों में हार मिलने के बाद वह मुख्य चुनाव आयोग को ही निशाने पर लिए हुए हैं. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, लेकिन राहुल गांधी फैसले का इंतजार करने के बजाय सड़क पर उतरकर पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं. चलिए उनके इस रवैये को भी मान लें तो यह उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है. लेकिन अब नेहा बोरा का वीडियो सामने आने के बाद सीधा सवाल उठता है कि राहुल गांधी लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में नहीं आ पा रहे हैं तो क्या वह सड़कों पर उतरकर और जनता को उकसाकर सत्ता पाना चाहते हैं. उनके आंदोलन की पोस्टर गर्ल नेहा बोरा का बयान तो इसी ओर इशारा करता है. राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं इसलिए उन्हें देश की जनता के सामने आकर तमाम उठ रहे सवालों का जवाब देना चाहिए.



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