भारत ने एक हीरा खो दिया. कोझिकोड से उस समय बुरी खबर आई जब देसी धान के जनक पद्मश्री चेरुवायल रमन का निधन हो गया. अपनी 3 एकड़ जमीन में देसी धान की 55 किस्में उगाकर उन्हें अगली पीढ़ियों के लिए बीज के रूप में बचाने वाले इस किसान ने 74 साल की उम्र में आखिरी सांस ली.इ न्हें देशी धान का संरक्षक या भारत का जीवित धान जीन बैंक भी कहा जाता था. सरकार ने इनके अभूतपूर्व कामों के लिए इन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया था.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार देशी धान की किस्मों को बचाने वाले पद्मश्री चेरुवायल रमन का 74 वर्ष की आयु में निधन हो गया. इनका कोझिकोड मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दिल की बीमारी का इलाज चल रहा था, तभी इन्होंने अंतिम सांस ली.
कहां हुआ जन्म
बता दें कि चेरुवायल रमन का जन्म 1952 में वायनाड जिले के कम्माना गांव के पास कुरिच्या आदिवासी समुदाय में हुआ था. बचपन से ही उन्हें जमीन और खेती से गहरा लगाव था. अपने चाचा की देखरेख में इन्होंने खेती करना सीखा और फिर उसे अपना जीवन बना लिया. 1989 में जब इनके चाचा का निधन हो गया तो परिवार की खेती की पूरी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर आ गई. खेती करते हुए इन्होंने देखा कि कई ऐसी पारंपरिक किस्में हैं जो विलुप्त होती जा रही हैं. इन्होंने सोचाा कि इन्हें बचाया जाना चाहिए, नहीं तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी और इन किस्मों को कभी देख भी नहीं पाएंगी. उसी दिन से उन्होंने पश्चिमी घाट की मिट्टी, बीज और पारंपरिक खेती की विरासत को बचाने का संकल्प लिया.
160 धान की किस्में उगाईं
वर्ष 2000 में इन्होंने अकेले ही एक बड़ा मिशन शुरू किया और धान की किस्मों को बचाने की ठानी. वायनाड में कभी करीब 160 तरह की धान की किस्में उगाई जाती थीं, लेकिन आधुनिक खेती और व्यावसायिक फसलों की वजह से आधी से ज्यादा किस्में लुप्त हो चुकी थीं. लिहाजा रमन ने देशी बीजों को बचाने के लिए काम शुरू किया.
3 एकड़ जमीन में बचाईं 55 दुर्लभ देसी धान की किस्में
रमन ने कम्माना में अपनी तीन एकड़ जमीन को कृषि-जैव विविधता का अभयारण्य बना दिया. पिछले दो दशकों में इन्होंने 55 से ज्यादा दुर्लभ देसी धान की किस्मों को बचाया. इनमें थोंडी, मन्नुवेलियन, कनाली, चेट्टुवेलियन, पलवेलियन, चानलथोंडी जैसी पारंपरिक किस्में शामिल हैं. इसके अलावा जीरकसल, गंधकसल और कायमा जैसी सुगंधित किस्में भी उन्होंने संरक्षित कीं. धान के अलावा उन्होंने कई देशी पेड़, मसाले और जड़ी-बूटियों को भी बचाया.
लोग कहते थे नेल्लाचन
स्थानीय लोग उन्हें ‘वीथाचन’ और ‘नेल्लाचन’ नाम से पुकारते थे, जिनका मतलब है बीजों के पिता और धान के पिता. वे आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जैविक खेती के तरीके अपनाते थे. उनका बीज बांटने का तरीका बहुत अनोखा और निस्वार्थ था. वे किसी भी किसान को मुफ्त में देसी बीज देते थे, बशर्ते वह जैविक खेती करने का वादा करे. बदले में वे सिर्फ इतना कहते थे कि फसल कटने के बाद उतने ही बीज वापस लौटा दिए जाएं, ताकि यह चक्र चलता रहे.
2023 में सरकार ने किया सम्मानित
उनके काम को देश-विदेश में सराहना मिली. 2023 में केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. इसके अलावा उन्हें कृषि मंत्रालय का राष्ट्रीय प्लांट जीनोम सेवियर अवॉर्ड, 2016 का जीनोम कंजर्वेशन अवॉर्ड और केरल कृषि विभाग का कर्षक ज्योति अवॉर्ड भी मिला. 2011 में हैदराबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता सम्मेलन में उन्होंने भारतीय किसानों का प्रतिनिधित्व किया. लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों में भी उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था.
एक आम किसान की ताकत दिखाई
रमन की विरासत सिर्फ बीज बचाने तक सीमित नहीं थी बल्कि उन्होंने दिखाया कि एक आम किसान भी पर्यावरण और पारंपरिक ज्ञान को कैसे बचा सकता है. उनके काम ने कई किसानों को प्रेरित किया कि वे भी देसी किस्मों की ओर लौटें.
परिवार में कौन-कौन?
उनके निधन से वायनाड और पूरे देश के कृषि प्रेमियों में शोक की लहर है. वे अपनी पत्नी गीता, चार बच्चों रमणी, रमेश, राजेश और रेजिता और परिवार के अन्य सदस्यों को छोड़ गए हैं. सही मायने में चेरुवायल रमन का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं है. यह उस पीढ़ी का अंत है जिसने बिना किसी बड़े संसाधन के, सिर्फ जुनून और समर्पण से देश की कृषि विरासत को बचाए रखा.