ईरान में ईशनिंदा कानून के तहत 23 साल की अकाउंटिंग की स्टूडेंट नजमेह अमीनी को मृत्युदंड दिए जाने की खबरें सामने आईं. वहीं दूसरी तरफ साउदी अरब की सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के मामले में एक श्रीलंकन नागरिक की मौत की सजा रद्द कर दी है. श्रीलंका के 27 साल के प्रवासी मजदूर अनोजन शिवराजा ने फेसबुक पर एक कमेंट किया था, जिसके बाद मौत की सजा सुनाई गई थी. शिवराजा को सितंबर में इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी. तभी से श्रीलंकन सरकार कूटनीतिक और कानूनी स्तर पर अपने नागरिक को बचाने की कोशिशों में लगी थी.
क्या है ये पूरा मामला?
श्रीलंकाई नागरिक अनोजन शिवराजा, सऊदी अरब में प्रवासी मजदूर के रूप में काम करते थे. बीबीसी के मुताबिक फेसबुक पर हुई बहस के दौरान मुस्लिम लड़की ने शिवलिंग को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी जिसके जवाब में शिवराजा ने तमिल भाषा में पैगंबर मोहम्मद का अपमान करते हुए टिप्पणी की थी. हालांकि उन्होंने तुरंत अपनी टिप्पणी को हटा दिया था. इसी कमेंट को इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा माना गया. इसके बाद अल-अहसा की आपराधिक अदालत ने शुरुआत में उन्हें 5 साल की जेल और 30 लाख सऊदी रियाल के जुर्माने की सजा सुनाई थी. शिवराजा ने अपना कमेंट जल्द ही हटा दिया था और माफी मांगते हुए एक वीडियो भी पोस्ट किया था. लेकिन कमेंट का स्क्रीनशॉट उनके नियोक्ता और सऊदी अधिकारियों तक पहुंच गया. अनोजन को जुलाई में गिरफ्तार किया गया और सितंबर में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई.
अब क्या होगा शिवराजा के साथ?
श्रीलंका के अखबार ‘द मॉर्निंग’ की रिपोर्ट के मुताबिक, शिवराजा का पांच साल की जेल और जुर्माने वाला पुराना फैसला भी रद्द हो गया है. लेकिन अभी उनकी रिहाई दूर है. ये केस दोबारा सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेजा जा सकता है. इस श्रीलंकाई नागरिक की सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा भले ही रद्द हो गई है पर अभी भी सारे आरोप हटाए नहीं गए हैं. शुरुआत में अल-अहसा क्रिमिनल कोर्ट ने उन्हें पांच साल की जेल और 30 लाख सऊदी रियाल का जुर्माना भरने की सजा सुनाई थी. अभी आगे इनके साथ क्या होगा, इसकी पूरी जानकारी नहीं है.
साउदी अरब में कैसे रद्द होती है मौत की सजा?
साउदी अरब में मौत की सजा रद्द या घटाने के तीन रास्ते होते हैं. पहला है अपील और सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा, दूसरा सजा घटाने की अर्जी और तीसरा हत्या के मामलों मं पीड़ित पक्ष की माफी मिलने पर.
अपील और सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा: साउदी में मौत की सज़ा वाले फैसले को अपीलीय अदालत और फिर सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा से गुजरना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट यदि सबूत, कानूनी प्रक्रिया या सजा की मात्रा में गंभीर कमी पाता है, तो वह फैसला रद्द कर सकता है या नया फैसला सुना सकता है. शिवराजा के मामले में यही हुआ. अपीलीय अदालत से मिली मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा है.
क्षमादान या सज़ा घटाने की अर्जी: कुछ अपराधों में अभियुक्त राजा से रॉयल पार्डन या सजा घटाने की अर्जी कर सकता है. अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अपराधों में मौत की सज़ा को कम करने का अधिकार है और विशेष परिस्थितियों में राजकीय क्षमादान भी संभव है.
‘क़िसास’ मामलों में पीड़ित पक्ष की माफी: हत्या जैसे मामलों में, जिन्हें ‘क़िसास’ कहा जाता है, पीड़ित के परिवार की सहमति से सज़ा रद्द हो सकती है. परिवार चाहे तो आरोपी को माफ कर दे, या ‘दियाह’ यानी “खून के पैसे” के बदले में माफी दे दे.
पहले भी रद्द हुई मौत की सजा, पर ये मामला अलग
साउदी अरब में ईशनिंदा जैसे आरोपों में मृत्युदंड रद्द होना बहुत दुर्लभ है, क्योंकि ऐसे मामलों में आमतौर पर शरिया-आधारित व्याख्या और सख्त सज़ा की प्रवृत्ति रही है. इससे पहले भी कुछ विदेशी नागरिकों की मौत की सजा को साउदी में रद्द किया गया है. पर वो सभी मामले हत्या से जुड़े थे. लेकिन शिवराजा का मामला दुर्लभ है, क्योंकि ये ईशनिंदा का है. साल 2011 में साउदी अरब में भारतीय नागरिक रामेश चंद्रन की सजा भी रद्द की गई थी. चंद्रन को हत्या के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन अपील के बाद सज़ा रद्द हो गई और वे रिहा हुए.
भारत में कैसे माफ होती है मौत की सजा?
भारत में मौत की सजा को लेकर काफी सख्त और कड़े नियम हैं. भारत में मृत्युदंड संवैधानिक है और दिया जा सकता है, लेकिन इसे देना इतना आसान नहीं है. भारत में मौत की सजा दुर्लभतम यानी रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही दी जाती है. मौत की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जाए जहां सुधार की कोई संभावना न बची हो.
सेशन कोर्ट या जिला अदालत में मिली फांसी या मौत की सजा को पहले समीक्षा के लिए हाई कोर्ट भेजा जाता है. अगर हाई कोर्ट में भी ये सजा बरकरार रखी जाती है तो आरोपी के पास सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का विकल्प होता है. अगर सुप्रीम कोर्ट भी मौत की सजा ही सुनाती है तो राष्ट्रपति के पास दया की अर्जी डाली जा सकती है. यानी पूरी प्रक्रिया को ऐसे समझ सकते हैं.
1. सेशन कोर्ट: मौत की सजा सुनाता है.
2. हाई कोर्ट: मामले की समीक्षा करता है और सजा की पुष्टि, बदलाव या उसे रद्द करने का फैसला कर सकता है.
3. सुप्रीम कोर्ट: आरोपी अपील या उपलब्ध अन्य कानूनी उपाय अपना सकता है.
4. दया याचिका: न्यायिक विकल्पों के बाद संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के समक्ष दया याचिका का विकल्प हो सकता है. BNSS की धारा 472 में मौत की सजा के मामलों में दया याचिका की प्रक्रिया का प्रावधान है.
अनोजन का मामला बताता है कि विदेश में रहने वाले प्रवासी मजदूर भी उस देश के कानूनों के दायरे में आते हैं. सोशल मीडिया पर किया गया कमेंट, भले ही बाद में हटा दिया जाए, जांच और कानूनी कार्रवाई का आधार बन सकता है.