मेरठ : मेरठ के बहुचर्चित सौरभ राजपूत केस में मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने इस जघन्य हत्याकांड में सिर्फ फांसी की सजा ही नहीं सुनाई. बल्कि उन्हें इस जुर्म में सात-सात साल की सजा भी अलग से दी है. उन पर 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी अलग से लगाया गया है. अगर वह जुर्माने की इस रकम को भर पाने में नाकाम रहते हैं, तो उन्हें एक-एक महीने की अतिरिक्त कारावास की सजा भी भुगतनी होगी. अब आप सोच रहे होंगे कि इन दोनों को तो मृत्युदंड दिया गया है, तो सात साल की सजा अलग से कैसे? चलिए इसे तकनीकी रूप से समझते हैं, क्योंकि इन सवालों का जवाब आपराधिक कानून की बारीकियों में छिपा है.
दरअसल, किसी एक घटना में एक से अधिक अपराध किए गए हों, तो अदालत हर अपराध के लिए अलग-अलग सजा सुनाती है. सौरभ हत्याकांड में भी ऐसा ही हुआ है. यहां दोनों हत्या और सबूत मिटाने से जुड़े अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए, लिहाजा उन्हें अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के तहत सजा दी गई है.
हत्या के लिए मृत्युदंड, सबूत मिटाने के लिए सात साल की सजा
मेरठ की जिला अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 103(1) के साथ धारा 3(5) के तहत हत्या के अपराध में मृत्युदंड की सजा सुनाई है. इस क्राइम के लिए दोनों पर 50-50 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया गया है. अब मृत्युदंड की सजा हाईकोर्ट की पुष्टि के अधीन है.
इसके अलावा दोनों को बीएनएस की धारा 238(a) के तहत 7-7 साल के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा भी दी गई है. जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में एक महीने के अतिरिक्त कारावास भी काटना होगा.
टेक्निक्ली देखें तो यहां ध्यान देने वाली बात है कि हत्या और सबूत मिटाना कानून की नजर में अलग-अलग अपराध हैं. इसलिए अदालत ने एक ही मामले में दोनों अपराधों के लिए अलग-अलग सजा दी है.
क्या है BNS की धारा 103(1)?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) हत्या के अपराध के लिए सजा तय करती है. इसके तहत दोषी को मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा और जुर्माना दिया जा सकता है.
वहीं, धारा 3(5) एक इरादे से किए गए आपराधिक कृत्य में शामिल लोगों की संयुक्त जिम्मेदारी से संबंधित है. आसान भाषा में समझें तो अगर कई लोग एक नियत को आगे बढ़ाने के लिए अपराध करते हैं, तो कानून की शर्तें पूरी होने पर हर शख्स को उस अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.
सबूत मिटाने के अपराध में अलग सजा क्यों?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 238 का संबंध अपराध के सबूत गायब करने, मिटाने या अपराधी को कानूनी सजा से बचाने के इरादे से गलत जानकारी देने से है. इसकी धारा 238(a) में 7 साल तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.
चलिए इसे अब एक एग्जांपल से समझते हैं. मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने हत्या की और उसके बाद अपराध छिपाने के लिए लाश या दूसरे सबूतों को गायब करने की कोशिश की. ऐसे हालात में हत्या करना एक क्राइम है, जबकि सबूत मिटाने का काम अलग अपराध बन सकता है. अगर अदालत में दोनों अपराधों के जरूरी तत्व साबित हो जाते हैं, तो दोनों के लिए अलग-अलग सजा सुनाई जा सकती है. यही वजह है कि हत्या के लिए मृत्युदंड मिलने के बावजूद सबूत मिटाने के अपराध में सात साल की सजा अलग से दोनों को दी गई है.