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Pakistan Nuclear Program: पाकिस्तान के गुप्त परमाणु नेटवर्क और उत्तर कोरिया से उसके संदिग्ध रिश्तों की टोह ले रही फ्रांस की खुफिया एजेंसी डीजीएसई और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच का खतरनाक टकराव अब बेनकाब हो गया है. पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कदीर खान के अंतरराष्ट्रीय जाल को काटने के लिए फ्रांसीसी जासूसों को खुली छूट दी गई थी.
पाकिस्तान की परमाणु गतिविधियों पर फ्रांस नजर रख रहा था. (सांकेतिक तस्वीर)
Pakistan Nuclear Network: अब्दुल कदीर खान के परमाणु नेटवर्क और उत्तर कोरिया से पाकिस्तान के कथित परमाणु संबंधों पर फ्रांस की नजर थी. इसी दौरान फ्रांसीसी जासूसों और ISI के बीच टकराव बढ़ने और एक एजेंट के रेडिएशन की चपेट में आने का मामला सामने आया है.
पाकिस्तान के परमाणु नेटवर्क पर फ्रांस की नजर
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर फ्रांस की खुफिया एजेंसी DGSE काफी सतर्क थी. पाकिस्तान के परमाणु बम के जनक कहे जाने वाले अब्दुल कदीर खान का नेटवर्क सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं था. उसके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और उत्तर कोरिया के साथ पाकिस्तान के कथित परमाणु संबंधों को लेकर भी चिंता थी. यही वजह थी कि अफगानिस्तान में जिहादी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के साथ सहयोग करने के बावजूद फ्रांस ने परमाणु तकनीक के प्रसार को रोकने के लिए इस्लामाबाद को अपनी प्राथमिकता में रखा.
फ्रांसीसी जासूसों को मिली थी खुली छूट
उस समय फ्रांस की खुफिया एजेंसी DGSE के इंटेलिजेंस प्रमुख पैट्रिक कालवर ने अपने अधिकारियों को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े गोपनीय रहस्यों का पता लगाने की खुली छूट दी थी. कालवर बाद में 2012 से 2017 तक फ्रांस की घरेलू सुरक्षा और काउंटर-इंटेलिजेंस एजेंसी के प्रमुख भी रहे. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने अपने अधिकारियों को सोवियत दौर का उदाहरण देते हुए बताया था कि केजीबी के जिन एजेंटों को दूसरे देशों से ज्यादा सक्रिय होने के कारण निकाल दिया जाता था, मॉस्को में उनका स्वागत सम्मान के साथ किया जाता था. इसके बाद फ्रांसीसी एजेंटों ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए अपने प्रयास तेज कर दिए.
ISI के साथ कैसे बढ़ा टकराव?
फ्रांसीसी एजेंटों की गतिविधियां पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के रडार पर आ गईं. रिपोर्ट के मुताबिक, कराची में तैनात फ्रांस की खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी को स्थानीय सूत्र भर्ती करने के बाद पाकिस्तान से निष्कासित कर दिया गया. इसके बाद ISI की बेहद गोपनीय एस विंग ने फ्रांसीसी एजेंटों पर निगरानी बढ़ा दी. इस विंग की जिम्मेदारियों में गुप्त अभियान चलाना भी शामिल बताया गया है.
इसी दौरान फ्रांसीसी एजेंट जेरोम के रेडिएशन के संपर्क में आने का मामला सामने आया. कुछ सुरक्षा सूत्रों ने इस घटना के समय और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के भीतर एक महत्वपूर्ण सूत्र की भर्ती के बीच संबंध होने की आशंका जताई. हालांकि, इस मामले में सुरक्षा सूत्रों के बीच एकमत नहीं है और यह स्पष्ट नहीं है कि रेडिएशन के संपर्क में आने के पीछे कोई जानबूझकर की गई कार्रवाई थी या नहीं.
रेडियोधर्मी सामग्री ने बढ़ाई चिंता
इस मामले का एक और अहम पहलू रेडियोधर्मी सामग्री से जुड़ा था. रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांसीसी खुफिया एजेंसी को एक ऑपरेशन के दौरान रेडियोधर्मी सामग्री मिली थी. इसे सुरक्षित तरीके से संभालना बेहद जरूरी था, क्योंकि इसके अनजाने में फैलने से एजेंसी के कर्मचारियों और कार्यालयों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था. उस समय खुफिया एजेंसी के कार्यालयों में सुरक्षा जांच की व्यवस्था आज जैसी सख्त नहीं थी. यहां तक कि बिना जांच वाले पैकेट भी सीधे कर्मचारियों की मेज तक पहुंच सकते थे. ऐसे में रेडियोधर्मी सामग्री के गलती से फैलने की आशंका ने सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ा दी थीं.
परमाणु रहस्य, जासूसी और सुरक्षा का सवाल
यह पूरा मामला पाकिस्तान के परमाणु नेटवर्क, उत्तर कोरिया के साथ उसके कथित संबंधों और अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों के बीच चल रही खींचतान की ओर इशारा करता है. फ्रांस के लिए चुनौती सिर्फ परमाणु तकनीक के संभावित प्रसार पर नजर रखना नहीं थी, बल्कि अपने एजेंटों और संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी थी.