चंदौली: जिले के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र के नियमताबाद ब्लॉक स्थित मवई कला गांव में स्वयं सहायता समूह महिलाओं की जिंदगी बदलने का जरिया बन रहे हैं. गांव की गीता देवी वर्ष 2019 से समूह सखी के रूप में महिलाओं को बचत, स्वरोजगार और सरकारी योजनाओं से जोड़ने का काम कर रही हैं. उनके मार्गदर्शन में महिलाएं सब्जियों की खेती, दुकान, बकरी पालन और अन्य छोटे कारोबार के जरिए अपनी आजीविका मजबूत कर रही हैं. हालांकि, गंगा में आने वाली बाढ़ और फसल बर्बाद होने पर आर्थिक सहायता न मिलने की समस्या आज भी उनके सामने बड़ी चुनौती है.
सीआरपी दीदियों से मिली प्रेरणा
गीता देवी ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि वर्ष 2019 में गांव में सीआरपी (सामुदायिक संसाधन व्यक्ति) दीदियां आई थीं. उन्होंने महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाने, नियमित बचत करने और बैंक में खाता खुलवाने के फायदे बताए. साथ ही स्टार्टअप फंड, रिवॉल्विंग फंड (आरएफ) और सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ) जैसी आर्थिक सहायता के बारे में जानकारी दी. गीता देवी ने बताया कि पहले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी. समूह से जुड़ने के बाद धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा. महिलाओं ने समूह से मिलने वाली सहायता और उपलब्ध संसाधनों के सहारे खेती-बाड़ी तथा छोटे कारोबार शुरू किए. इससे उनकी आमदनी बढ़ी और कर्ज चुकाने में भी मदद मिली.
10 नए समूह बनाने का लक्ष्य
गीता देवी अब तक 15 स्वयं सहायता समूह गठित कर चुकी हैं. उनका लक्ष्य आने वाले समय में 10 और समूह बनाना है, ताकि अधिक से अधिक ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जा सके. वह महिलाओं को नियमित बचत करने और समूह की सदस्य बनने के लिए प्रेरित करती हैं. उन्होंने कहा कि समूह से जुड़ने के बाद जरूरत के मुताबिक महिलाएं आर्थिक मदद लेकर अपना काम शुरू कर सकती हैं. कोई ब्यूटी पार्लर चला रही है, तो कोई दुकान खोल रही है. कई महिलाएं खेती और बकरी पालन के जरिए भी कमाई कर रही हैं. गीता देवी ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत उन्हें काम के आधार पर प्रोत्साहन राशि भी मिलती है. वह चाहती हैं कि महिलाओं की मेहनत और काम के अनुरूप उनकी आमदनी में और वृद्धि हो.
चार बीघे जमीन पर कर रही खेती
समूह सखी गीता देवी खुद भी खेती करती हैं. उन्होंने बताया कि वह दूसरे की जमीन किराये पर लेकर सब्जियों की खेती कर रही हैं. इसके लिए वह करीब एक हजार रुपये प्रति बिस्वा सालाना किराया देती हैं. उनके पति दिनेश भी खेती के काम में पूरा सहयोग करते हैं. गीता देवी ने बताया कि लगभग 4 बीघे जमीन पर खेती करने में करीब 50 हजार रुपये तक का खर्च आ जाता है. फसल और बाजार का भाव अनुकूल रहने पर सब्जियों की बिक्री से करीब एक लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है. हालांकि, यह बिक्री की रकम है और इसमें से खेती की लागत निकालनी पड़ती है. मौसम, बाजार भाव और प्राकृतिक आपदाओं के कारण मुनाफे में उतार-चढ़ाव भी आता है. वह खेत में मौसम के हिसाब से खीरा, करेला, भिंडी, नेनुआ, लौकी, गोभी, पालक, धनिया, शिमला मिर्च, तरबूज और खरबूजे जैसी फसलें उगाती हैं. उनकी कोशिश रहती है कि खेत खाली न रहे और पूरे साल किसी न किसी सब्जी की खेती होती रहे. तैयार सब्जियों को मुगलसराय की सब्जी मंडी में बेचकर परिवार की आजीविका चलाई जाती है.
गंगा की बाढ़ से बर्बाद होती है फसल
खेती में अच्छी कमाई की संभावनाओं के बावजूद गीता देवी और उनके पति के सामने सबसे बड़ी समस्या गंगा में आने वाली बाढ़ है. बाढ़ का पानी खेतों में भरने से खड़ी फसल और बीज तक बर्बाद हो जाते हैं, ऐसे में दोबारा खेती शुरू करने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है. दिनेश मौर्या ने लोकल 18 से बताया कि जमीन किराये पर लेकर खेती करने वाले किसानों को नुकसान होने पर मुआवजे का लाभ नहीं मिल पाता. उन्होंने कहा कि कई बार जमीन के मालिक को सहायता मिल जाती है, लेकिन खेती में पैसा लगाने वाले किरायेदार किसान खाली हाथ रह जाते हैं. परिवार चाहता है कि सरकार ऐसे किसानों के लिए भी आर्थिक सहायता की व्यवस्था करे, ताकि उनके बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च प्रभावित न हो.