Baki Mata Temple: शारदीय नवरात्रि में देशभर के देवी मंदिरों में मां दुर्गा की आराधना की जा रही है. तो वही, मध्य प्रदेश के खरगोन का करीब 300 साल से भी अधिक पुराना बाकी माता मंदिर भी अपनी अनूठी परंपराओं के कारण आस्था का केंद्र बना हुआ है. शक्ति की चौपाल के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में एक ही चबूतरे पर पिंडी रूप में नौ देवियां, आठ भैरव, तीन रुद्र, हनुमानजी और शीतला माता विराजित हैं. यहां माता को फूल-मिठाई के साथ एक खास परंपरा के तहत आठ औषधीय सामग्रियों से तैयार पान के बीड़े और ज्वार की धानी का भोग लगाया जाता है. नवरात्रि में यह प्रसाद व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को बांटा जाता है.
बाकी माता मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों तक हर दिन दोपहर की महाआरती के बाद माता को औषधीय पान के बीड़े का भोग लगाया जाता है. इसके बाद इसे व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है. मंदिर में यह परंपरा करीब 293 वर्षों से चली आ रही है. नवरात्रि के दौरान रोजाना लगभग 500 से 700 पान के बीड़े वितरित किए जाते हैं.
इस विशेष पान को तैयार करने में दालचीनी, जायफल, लौंग, इलायची, जायपत्री, मिश्री, पिपरमेंट और जेष्ठिमधु जैसी आठ औषधियों का इस्तेमाल किया जाता है. माता को पान के साथ ज्वार की धानी भी अर्पित की जाती है. मान्यता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को ऊर्जा मिलती है, पेट की गर्मी शांत होती है और थकान कम महसूस होती है.
ब्रह्म मुहूर्त में कुंड पर स्नान, फिर माता के दर्शन
मंदिर में दर्शन की परंपरा भी दूसरे मंदिरों से बेहद अलग है. नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर परिसर स्थित पवित्र कुंड (झिरी)के पानी से स्नान करते हैं. इसके बाद गीले वस्त्रों में ही माता के दर्शन करते हैं. सुबह 5 बजे से 9 बजे तक कुंड पर स्नान करने वाले भक्तों की भीड़ लगी रहती है. सुबह 8 बजे से देवी का अभिषेक किया जाता है. इसके बाद दिनभर श्रद्धालु माता की पूजा-अर्चना और परिक्रमा करते हैं. नवरात्रि के दौरान मंदिर रात 12 बजे तक खुला रहता है, जिससे भक्त देर रात तक माता के दर्शन कर सकते हैं.
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ
नवरात्रि के दौरान मंदिर में पूजा-अर्चना का विशेष क्रम रहता है. दोपहर 1 बजे के बाद श्रृंगार आरती होती है. फिर माता को औषधीय पान के बीड़े का भोग लगाया जाता है. वहीं, रात 8:30 बजे कालिदास द्वारा रचित महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ किया जाता है. का दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते है.
1732 से विराजित हैं नौ देव शक्तियां
पुजारी सुबोध जोशी बताते है कि, मान्यताओं के अनुसार, यहां नौ देव शक्तियां वर्ष 1732 से पिंडी स्वरूप में विराजित हैं. सभी देवियां पास के झीरे से प्रकट हुई थीं. इस जलस्रोत को श्रद्धालु पवित्र मानते हैं. मान्यता है कि इसके पानी में स्नान करने से मानसिक शांति मिलती है और रोग दूर होते हैं. कहा यह भी जाता है कि, इस तरह मंदिर सिर्फ दो ही स्थानों पर है. पहला खरगोन में ओर दूसरा ओंकारेश्वर में मौजूद है.
संस्कृत, गुजराती और मराठी परंपराओं का संगम
बाकी माता मंदिर में अलग-अलग भाषाओं की धार्मिक परंपराएं भी देखने को मिलती हैं. यहां संस्कृत में महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का पाठ होता है, गुजराती में गरबा गाए जाते हैं और मराठी में माता की आरती की जाती है. शारदीय नवरात्रि के दौरान पूजा-पाठ, अभिषेक, श्रृंगार आरती और पारंपरिक गरबा के जरिए मंदिर में देवी आराधना की जाती है.