लॉस एंजिल्स के मेयर चुनाव की दौड़ अब अपने निपटारे वाले मोड़ पर आ पहुंची है. अमेरिका के इस दूसरे सबसे बड़े और पावरफुल शहर की कमान किसके हाथ में जाएगी? एक तरफ हैं मौजूदा मेयर करेन बास, जो अपने लंबे राजनीतिक अनुभव बावजूद कुर्सी बचाने के लिए दुनिया भर के जुगाड़ लगाने को मजबूर हैं. और दूसरी तरफ हैं नित्या रमन, भारतीय मूल की एक ऐसी तेज-तर्रार एक्टिविस्ट, जिन्होंने चुनाव मैदान में आखिरी मोमेंट में एंट्री ली LA की राजनीति हिलाकर रख दी है. पॉलिटिकल इस बात से हैरान हैं कि नई एंट्री होते ही चुनावी सर्वे और ट्रेंड्स चीख-चीख कर बोलने लगे हैं कि नित्या रमन इस रेस में बहुत आगे निकल गई हैं.
कौन हैं नित्या रमन? केरल से हार्वर्ड और जमीनी राजनीति का सफर
केरल की गलियों से निकलकर हार्वर्ड और एमआईटी (MIT) के परिसरों से होती हुई लॉस एंजिल्स के सिटी हॉल तक का सफर तय करने वाली नित्या रमन की ये कहानी सिर्फ एक चुनाव जीतने भर की नहीं है. ये कहानी है उस बदलाव की, जो पुरानी स्टाइल वाली राजनीति को चुनौती दे रहा है.
1981 में केरल में जन्मी नित्या रमन जब बहुत छोटी थीं, तब उनका परिवार अमेरिका आकर बस गया था. उनका एजुकेशनल बैकग्राउंड बेहद शानदार रहा है. उन्होंने दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में शुमार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और उसके बाद मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) से अर्बन प्लानिंग में मास्टर डिग्री हासिल की.
नित्या सिर्फ एयर-कंडीशनित कमरों में बैठकर नीतियां बनाने वाली अफसर नहीं हैं. उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत जमीनी स्तर के संघर्षों से की. लॉस एंजिल्स की सबसे बड़ी और कॉम्प्लेक्स समस्याओं में से एक, बेघर होने का संकट से सीधे जूझने के लिए उन्होंने SELAH नेबरहुड होमलेस गठबंधन की सह-स्थापना की. उन्होंने सड़कों पर रहने वाले बेघर लोगों के बीच जाकर काम किया, उनकी तकलीफों को समझा और फिर सिस्टम से सवाल पूछने शुरू किए.
साल 2020 में उन्होंने तब एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की जब वो लॉस एंजिल्स सिटी काउंसिल के लिए चुनी गईं. वो उस काउंसिल में पहुंचने वाली पहली दक्षिण एशियाई और पहली एशियाई-अमेरिकी महिला बनीं.
LA में आखिरी वक्त का मास्टरस्ट्रोक और व्यवस्था के खिलाफ बगावत
इस साल फरवरी में जब नॉमिनेशन की आखिरी तारीख नजदीक थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि कोई बड़ा उलटफेर होगा. लेकिन तभी नित्या रमन ने मेयर पद के चुनाव में कूदने का ऐलान कर दिया. उनका ये फैसला चौंकाने वाला इसलिए भी था क्योंकि शुरुआती दौर में वो खुद मौजूदा मेयर करेन बास का समर्थन कर रही थीं.
सिटी काउंसिल का हिस्सा होने के बावजूद, नित्या ने खुद को सत्ता के पुराने और सुस्त ढर्रे के खिलाफ एक मजबूत ‘चैलेंजर’ के रूप में पेश किया. उनका सीधा और बेबाक आरोप है कि लॉस एंजिल्स का सिटी हॉल और प्रशासनिक तंत्र अंदरूनी नाकामियों, लालफीताशाही और पुराने पड़ चुके तरीकों से जूझ रहा है. उन्होंने अपने पूरे चुनाव अभियान को 3 सबसे बुनियादी मुद्दों पर फोकस किया है.
- किफायती आवासीय व्यवस्था : आम नागरिकों और किराएदारों को आसमान छूते किराए से राहत दिलाना.
- शहरी बुनियादी ढांचा: खस्ताहाल सड़कों से लेकर आपातकालीन सेवाओं और सुरक्षा तंत्र को दुरुस्त करना.
- होमलेस संकट का स्थायी समाधान: सिर्फ दिखावो के लिए टेंट हटाने के बजाय जवाबदेही तय करना और लंबे समय तक टिकने वाले आवास उपलब्ध कराना.
आखिरी डिबेट: बास का आक्रामक वार और रमन की रणनीति
हाल ही में हुई आखिरी टीवी डिबेट में दोनों नेताओं के बीच जबरदस्त जुबानी जंग देखने को मिली. इस डिबेट ने साफ कर दिया कि मुकाबला कितना कड़ा है.
डिबेट की शुरुआत में ही नित्या रमन ने एक मनोवैज्ञानिक दांव चला. उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के उस मशहूर ऐतिहासिक सवाल को दोहराया, जिसने अमेरिकी मतदाताओं को झकझोर कर रख दिया था. कैमरे की तरफ सीधे देखते हुए रमन ने जनता से पूछा ‘क्या आप चार साल पहले की तुलना में आज बेहतर स्थिति में हैं’?
पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि लॉस एंजिल्स के आम लोगों के लिए इसका जवाब साफ तौर पर ‘ना’ है. बास के पिछले चार साल के कार्यकाल में बेघर संकट और हालिया पलिसाडेस फायर जैसी त्रासदियों ने शहर के लोगों को नाउम्मीद किया है. रमन ने इसी निराशा के खिलाफ उम्मीद और सकारात्मकता का संदेश दिया.
दूसरी ओर, मौजूदा मेयर करेन बास ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया. बास ने अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए रमन को आड़े हाथों लिया और उन्हें ‘प्राइम टाइम के लिए तैयार नहीं’ करार दिया. बास के तीखे हमलों के चलते डिबेट के कुछ पलों में रमन थोड़ी रक्षात्मक मुद्रा में भी नजर आईं, जिसे उनके विरोधियों ने मुद्दा बनाने की कोशिश की.
नित्या के सामने चुनौतियां और विरोधियों के तीखे सवाल
नित्या रमन की ये राह फूलों की सेज नहीं है. उनके राजनीतिक सफर और इस चुनाव के दौरान उनके सामने कई गंभीर सवाल भी खड़े किए गए हैं.
बदलते बयानों के आरोप: विरोधियों का कहना है कि रमन ने एक वक्त पर पुलिस विभाग (LAPD), मेंशन टैक्स और होमलेसनेस से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर समय-समय पर अपने रुख बदले हैं.
काउंसिल का समर्थन न मिलना: LA की राजनीति में मेयर को अकेले फैसले लेने की छूट नहीं होती; उसे सिटी काउंसिल के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है. दिलचस्प बात ये है कि सिटी काउंसिल के 15 में से 13 सदस्यों का समर्थन करेन बास के साथ है. यहां तक कि ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ अमेरिका’ (DSA), जिसके समर्थन से रमन कभी राजनीति में आगे बढ़ी थीं, इस बार उनके साथ खुलकर खड़ा नहीं है.
क्या इतिहास रचने जा रही हैं नित्या रमन?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये मुकाबला आखिरी वोटिंग तक सांस रोक देने वाला होगा. अगर 3 नवंबर को बास के पुराने समर्थक, यानी बुजुर्ग और स्थापित वर्ग के मतदाता बड़ी संख्या में पोलिंग बूथों पर पहुंचते हैं, तो बास बाजी संभाल सकती हैं. लेकिन अगर बदलाव की चाह रखने वाले युवा, प्रगतिशील मतदाता और कामकाजी वर्ग के लोग बड़ी तादाद में बाहर निकलते हैं, तो नित्या रमन का लॉस एंजिल्स की पहली एशियाई-अमेरिकी महिला मेयर बनना लगभग तय माना जा रहा है.
केरल की माटी से उठकर अमरीकी महाद्वीप के दूसरे सबसे बड़े शहर की राजनीति का सेंटर बन जाना इस बात का सबूत है कि लगन और जमीनी मुद्दों पर पकड़ हो तो हर दीवार गिराई जा सकती है. अब देखना ये है कि लॉस एंजिल्स की जनता पुराने अनुभव पर भरोसा करती है या नित्या रमन के बदलाव के उस वादे पर मुहर लगाती है, जो LA की तस्वीर बदलने का दावा कर रहा है.