समंदर का सिकंदर कैसे बन रहा भारत? INS कलवरी से INS मंगरोल तक, नेवी के पास कितने वारशिप और पनडुब्बियां हैं?

समंदर का सिकंदर कैसे बन रहा भारत? INS कलवरी से INS मंगरोल तक, नेवी के पास कितने वारशिप और पनडुब्बियां हैं?


भारत का एक बड़ा हिस्सा समुद्र से जुड़ा हुआ है. इसमें बंगाल की खाड़ी से लेकर हिंद महासागर और अरब सागर तक का इलाका शामिल है. देश की समुद्री ताकत केवल बड़े वारशिप, एयरक्राफ्ट कैरिअर और मिसाइल्स तक सीमित नहीं है. हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए भारतीय नौसेना सतह पर तैनात युद्धपोत के साथ ही साथ पानी के अंदर ऑपरेशन करने वाली पनडुब्बियों पर भी लगातार निवेश कर रही है. चीन की बढ़ती समुद्री मौजूदगी, पाकिस्तान की नौसैनिक तैयारी और समुद्री व्यापार रास्तों की सुरक्षा के लिहाज से यह क्षमता भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसी रणनीति में INS कलवरी (INS Kalvari) जैसी आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां स्पेशल रोल निभाती हैं. वहीं INS मंगरोल (INS Mangrol) को भी बेड़े में शामिल किया गया है. हमारे समुद्री बेड़े में कितने जहाज शामिल हैं? इनमें कितने वारशिप हैं और कितने सबमरीन हैं?

इस साल नेवी में कितने नए युद्धपोत शामिल हुए?
इंडियन नेवी से जुड़ी ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय नौसेना ने इस साल 2026 में अब तक 10 जहाज कमीशन किए हैं. इनमें आधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट, ऐंटी पनडुब्बी वारशिप और अन्य नौसैनिक प्लेटफॉर्म शामिल हैं. 2026 में शामिल प्रमुख शिप में INS महेंद्रगिरि, INS धुनागिरी, INS अग्रय, INS संशोधक, INS मालवन, INS अंजदीप और INS मंगरोल शामिल हैं.

इन सभी के रोल एक-दूसरे से अलग हैं. उदाहरण के लिए, स्टील्थ फ्रिगेट लंबी दूरी के समुद्री अभियानों में उपयोगी हैं, जबकि छोटे पनडुब्बी रोधी युद्धपोत तटीय इलाकों में पानी के नीचे छिपे खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए बनाए जाते हैं.

यहां पर खास बात यह है कि कमीशन किए गए जहाजों की संख्या और नेवी के कुल बेड़े की संख्या अलग-अलग आंकड़े हैं. किसी एक साल में शामिल हुए 10 जहाजों को कुल 151 जहाजों के अतिरिक्त जोड़कर नहीं गिनना चाहिए, क्योंकि कुल बेड़े की संख्या में पहले से ही सर्विस में मौजूद पोत शामिल होते हैं.

INS कलवरी क्या है, भारत के पास ऐसी कितनी पनडुब्बियां हैं?

INS कलवरी भारतीय नौसेना की आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बी है. यह फ्रांस की नौसैनिक तकनीक पर आधारित स्कॉर्पीन डिजाइन की पनडुब्बी है, जिसे भारत में प्रोजेक्ट-75 के तहत बनाया गया है. इसको मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में तैयार किया गया. इसे दिसंबर 2017 में भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया था.

पनडुब्बी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वो पानी के अंदर रहकर दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों पर नजर रख सकती है. जरूरत पड़ने पर यह टॉरपीडो और एंटी-शिप हथियारों से हमला भी कर सकती है. इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, दुश्मन की ऐक्टिविटी का पता लगाने और रणनीतिक समुद्री इलाकों में सीक्रेट अभियान चलाने के लिए किया जा सकता है.

पनडुब्बी 

भारत के पास कलवरी क्लास की कितनी पनडुब्बियां हैं?

भारत ने प्रोजेक्ट-75 के तहत कलवरी क्लास की टोटल 6 पनडुब्बियां बनाई हैं. रक्षा मंत्रालय के उपलब्ध डिटेल के अनुसार पनडुब्बी INS कलवरी को दिसंबर 2017 में कमीशन किया गया. INS खंडेरी को सितंबर 2019 में, INS करंज को मार्च 2021 में, INS वेला को नवंबर 2021 में, INS वागीर को जनवरी 2023 में, INS वाघशीर को जनवरी 2025 में कमीशन किया गया.

इस तरह भारत के पास कलवरी क्लास की 6 पनडुब्बियां हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की कुल पनडुब्बियों की संख्या भी छह ही है. भारतीय नौसेना के पास कलवरी क्लास के अलावा अन्य पारंपरिक पनडुब्बियां भी हैं. इसके अलावा भारत की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों की कैपिसिटी भी अलग-अलग कैटिगरी में आती है.

डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां सामान्य तौर पर अपनी बैटरियां चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के करीब आती हैं या स्नॉर्कल का इस्तेमाल करती हैं. परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों की पानी के अंदर लंबे समय तक बने रहने की क्षमता अधिक होती है. दोनों प्रकार की पनडुब्बियां अलग-अलग स्ट्रेटिजिक जरूरतें पूरी करती हैं.

INS मंगरोल क्या है? नौसेना को कैसे ताकत देगा?

INS मंगरोल को लेकर सबसे अहम फैक्ट यह है कि यह पनडुब्बी नहीं है , बल्कि पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे मुकाबला करने के लिए बनाया गया युद्धपोत है. इसे 12 अक्टूबर 2026 को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया. यह माहे क्लास का तीसरा एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है. इसका कंस्ट्रक्शन कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है. इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है. यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी वारशिप बनाने की क्षमता और डिफेंस प्रोडक्शन में आत्मनिर्भरता को दिखाती है.

INS मंगरोल का मुख्य काम क्या है?

INS मंगरोल को खासतौर पर तटीय और हल्के समुद्री इलाकों में ऑपरेशन करने के लिए तैयार किया गया है. ऐसे क्षेत्रों में बड़े युद्धपोतों की तुलना में छोटे और अधिक फुर्तीले जहाज कई अभियानों में उपयोगी साबित हो सकते हैं. इसके कुछ प्रमुख काम हैं. वो क्या क्या हैं, आइए समझते हैं.

  • पनडुब्बियों का पता लगाना: आधुनिक सोनार और सेंसर की मदद से पानी के अंदर मौजूद संदिग्ध हरकतों का पता लगाना.
  • एंटी-सबमरीन ऑपरेशन: जरूरत पड़ने पर टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेट जैसे हथियारों से पानी के अंदर मौजूद खतरे का मुकाबला करना.
  • समुद्री निगरानी: तटीय क्षेत्र और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर निगरानी रखना.
  • कम तीव्रता वाले समुद्री अभियान: लिमिटेड स्तर के समुद्री सुरक्षा अभियानों में भाग लेना.
  • माइन वारफेयर से जुड़े काम: समुद्री बारूदी सुरंगों से संबंधित अभियान में मदद करना.

मंगरोल नाम कहां से आया?
यह तीन डीजल इंजन से चलने वाली वाटरजेट प्रोपल्शन यूनिट से लैस है, जिससे इसे समुद्री क्षेत्रों में बेहतर मोबिलिटी मिलती है. INS मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर और मछली पकड़ने के प्रमुख बंदरगाह मंगरोल के नाम पर रखा गया है. यह नाम पहले भारतीय नौसेना में सेवा दे चुके INS मंगरोल (M85) की परंपरा को भी आगे बढ़ाता है. पुराना पोत एक माइनस्वीपर था, जो अप्रैल 2004 तक सर्विस में रहा.

भारत के पास कितने वारशिप और पनडुब्बियां हैं?
इस बारे में सबसे ताजा जानकारी यह बताती है कि भारतीय नौसेना के बेड़े में कुल 151 की संख्या है. इसमें 131 सरफेस जहाज, 20 पनडुब्बियां हैं. वहीं अभी 42 निर्माणाधीन जहाज भी हैं. इसके आंकड़े टाइम्स ऑफ इंडिया की लेटेस्ट रिपोर्ट में नौसेना के वेस्टर्न कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के हवाले से लिखे गए हैं.

इन आंकड़ों के अनुसार, भारतीय नौसेना के पास 151 नौसैनिक प्लेटफॉर्म हैं, जिनमें 131 सतही जहाज और 20 पनडुब्बियां शामिल हैं. इसलिए यदि सवाल यह है कि भारत के पास कुल कितने नौसैनिक प्लेटफॉर्म हैं, तो इस रिपोर्ट के अनुसार जवाब 151 है. इसमें 131 जहाज और 20 पनडुब्बियां हैं.

हालांकि, यहां एक तकनीकी अंतर समझना जरूरी है. 131 सतही जहाजों को हर कंडीशन में 131 बड़े वारशिप कहना सही नहीं होगा. नौसेना के बेड़े में फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर, एयरक्राफ्ट कैरिअर और अन्य लड़ाकू जहाजों के अलावा सर्वे, निगरानी के साथ ही खास अभियानों के लिए बनाए गए पोत भी होते हैं. कुल संख्या इस बात पर डिपेंड करती है कि काउंटिंग में किस तरह के प्लेटफॉर्म शामिल किए गए हैं.

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारतीय शिपयार्ड में 42 जहाज निर्माणाधीन हैं. इसके अलावा 69 अन्य जहाजों, 6 पनडुब्बियों और 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट के लिए हरी झंडी दी जा चुकी है. इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी प्लेटफॉर्म अभी नौसेना के बेड़े में शामिल हो गए हैं.

नेवी की ताकत में स्वदेशी रोल
भारत की नौसैनिक रणनीति का एक बड़ा हिस्सा देश में ही युद्धपोतों और पनडुब्बियों का कंस्ट्रक्शन करना है. इसका फायदा केवल नए जहाजों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है. इससे तकनीकी क्षमता, मरम्मत की सुविधा, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और संकट के समय विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलती है.

रक्षा मंत्रालय के दिसंबर 2025 के डिटेल के मुताबिक, देश में 51 बड़े जहाज निर्माणाधीन थे, जिनकी कुल अनुमानित लागत लगभग 90 हजार करोड़ रुपये थी. यह आंकड़ा उस समय की स्थिति को दर्शाता है. इसे अक्टूबर 2026 की निर्माणाधीन जहाजों की संख्या के साथ सीधे नहीं मिलाना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों आंकड़ों की तारीख अलग है.

INS मंगरोल जैसे छोटे पनडुब्बी रोधी पोत और INS महेंद्रगिरि जैसे आधुनिक स्टील्थ फ्रिगेट इसी रणनीति का हिस्सा हैं. एक पोत तटीय इलाकों में पानी के अंदर छिपे हुए खतरे का मुकाबला करने के लिए है, जबकि दूसरा लंबी दूरी के समुद्री अभियानों और कई लेयर वाली रक्षा के लिए बनाया गया है.

हिंद महासागर का महत्व क्या है?
भारत के लिए हिंद महासागर का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश का व्यापार, ऊर्जा सप्लाई और कई महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियां समुद्री रास्तों पर निर्भर करती हैं. नौसेना का काम केवल युद्ध की स्थिति में दुश्मन से मुकाबला करना नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार रास्तों की सुरक्षा, समुद्री डकैती के खिलाफ ऐक्शन, निगरानी और आपदा के समय सहायता देना भी है.

भारतीय नौसेना की असली ताकत केवल जहाजों की कुल संख्या से नहीं मापी जा सकती. आधुनिक हथियार, सोनार और रडार, पनडुब्बी रोधी क्षमता, प्रशिक्षित चालक दल, समुद्र में लंबे समय तक तैनात रहने की क्षमता और स्वदेशी निर्माण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. INS कलवरी पानी के अंदर सीक्रेट अभियान चलाने की क्षमता का उदाहरण है, जबकि INS मंगरोल उस खतरे को पहचानने और उससे मुकाबला करने की क्षमता को मजबूत करता है. दोनों मिलकर भारत की समुद्री सुरक्षा के अलग-अलग लेकिन एक-दूसरे से जुड़े पहलुओं को मजबूती देते हैं.



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