नैनीताल: उत्तराखंड का नैनीताल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक विविधता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है. यहां मनाए जाने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव शहर की इसी विरासत को जीवंत रखते हैं. इन्हीं में से एक है दुर्गा पूजा महोत्सव, जिसकी परंपरा अंग्रेजों के दौर से जुड़ी हुई है. नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत बंगाली समाज ने की थी. समय के साथ यह आयोजन केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने वाला उत्सव बन गया.
उत्तराखंड के नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार, नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत को समझने के लिए शहर के ऐतिहासिक विकास और तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था को जानना जरूरी है. नैनीताल का नगरीकरण वर्ष 1841 में शुरू हुआ था. वर्ष 1862 में इसे नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया. उस दौर में साल के छह महीने राजधानी लखनऊ और छह महीने नैनीताल में रहती थी. मई से अक्टूबर के अंत तक सचिवालय भी नैनीताल से संचालित होता था. इसी दौरान यहां बंगाली कर्मचारियों की अच्छी-खासी मौजूदगी थी, जिन्होंने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाया.
1864 के आसपास शुरू हुई दुर्गा पूजा की परंपरा
प्रोफेसर अजय रावत के मुताबिक, नैनीताल में दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1864 के आसपास मानी जाती है. उस समय सचिवालय में कार्यरत बंगाली कर्मचारी दशहरे के अवसर पर मां दुर्गा की पूजा का आयोजन करते थे. बंगाल में दुर्गा पूजा पहले से ही धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक मेलजोल का प्रमुख पर्व रही है. नैनीताल पहुंचे बंगाली समाज ने भी इस परंपरा को यहां जीवित रखा. उन्होंने बताया कि शुरुआत में आयोजन पर बंगाली समाज का प्रमुख प्रभाव था. वर्ष 1900 तक यह परंपरा मुख्य रूप से इसी समुदाय के इर्द-गिर्द केंद्रित रही, हालांकि, धीरे-धीरे स्थानीय लोग भी इससे जुड़ने लगे. विभिन्न समुदायों की भागीदारी बढ़ने के साथ दुर्गा पूजा ने सामूहिक स्वरूप ग्रहण किया और इसे ‘सर्वजनिन दुर्गा पूजा’ के रूप में पहचान मिली. इस तरह धार्मिक आयोजन के साथ-साथ यह नैनीताल की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया.
बंगाली पर्यटकों का रहता था इंतजार
नैनीताल में पर्यटन का इतिहास केवल गर्मियों की भीड़ और प्राकृतिक नजारों तक सीमित नहीं रहा है. एक दौर ऐसा भी था, जब अलग-अलग मौसम में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले पर्यटक शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहचान देते थे. प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में मुंबई और गुजरात से पर्यटक नैनीताल पहुंचते थे, जबकि गर्मियों के दौरान दिल्ली और हरियाणा के सैलानियों की आमद बढ़ जाती थी. वहीं, सितंबर से नवंबर तक बंगाली पर्यटकों का विशेष इंतजार रहता था. दुर्गा पूजा के आसपास बड़ी संख्या में बंगाली परिवार नैनीताल पहुंचते थे. इन पर्यटकों की मौजूदगी से शहर का माहौल उत्सवमय हो जाता था. बंगाली पर्यटकों के साथ स्थानीय लोगों का जुड़ाव केवल पर्यटन कारोबार तक सीमित नहीं था बल्कि उनके माध्यम से नैनीताल के युवाओं को नई संस्कृतियों, खानपान, रहन-सहन, थिएटर और हॉलीवुड फिल्मों के बारे में जानने का अवसर मिलता था. बंगाली पर्यटक ऑटम फेस्टिवल में भी हिस्सा लेते थे. इस तरह पर्यटन आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम बनता था.
कुमाऊं के दूसरे पर्यटन स्थलों तक पहुंचते थे सैलानी
नैनीताल आने वाले बंगाली पर्यटक आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों की सैर भी करते थे. कौसानी, रानीखेत, पिंडारी, मिलम और नारायण आश्रम जैसे स्थान उनकी यात्राओं का हिस्सा हुआ करते थे. पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और स्थानीय संस्कृति उन्हें आकर्षित करती थी. नैनीताल होटल एसोसिएशन के सचिव वेद साह बताते हैं कि दुर्गा पूजा से करीब 20 दिन पहले ही बंगाली पर्यटकों का पहुंचना शुरू हो जाता था. त्योहारों के दौरान मिलने वाली छुट्टियों में बड़ी संख्या में परिवार पहाड़ों का रुख करते थे. सितंबर से नवंबर के बीच कई बार नैनीताल का माहौल ‘मिनी बंगाल’ जैसा नजर आता था.
संस्कृति और पर्यटन के रिश्ते की कहानी है दुर्गा पूजा
नैनीताल में दुर्गा पूजा महोत्सव का इतिहास शहर की बहुसांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है. अंग्रेजों के दौर में बंगाली कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई यह परंपरा समय के साथ स्थानीय समाज का भी हिस्सा बन गई. आज दुर्गा पूजा श्रद्धा, सामुदायिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का संदेश देती है. यह आयोजन याद दिलाता है कि नैनीताल की पहचान केवल झीलों और पहाड़ों से नहीं, बल्कि उन परंपराओं से भी बनी है, जिन्होंने अलग-अलग समुदायों को एक-दूसरे के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.