क्या आप जानते हैं कि जब काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कोई भारतीय विमान उड़ान भरने वाला होता है तो यात्रियों की अतिरिक्त जांच की जाती है. यह जांच एयरपोर्ट पर मौजूद भारतीय अथॉरिटी करती है. इसके लिए हवाई अड्डे पर भारतीय सुरक्षाकर्मी एक स्क्रीनिंग प्वाइंट के साथ मौजूद रहते हैं. यह कोई नई व्यवस्था नहीं है, पिछले 26 साल से लगातार ऐसा हो रहा है जो अब बोर्डिंग प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा बन गया है. इसके लिए एयरपोर्ट पर हर समय 12 से 15 सुरक्षा कर्मचारियों की तैनाती होती है, जिनमें मुख्य जांच का काम करने वाले छह से आठ कर्मी भारतीय होते हैं.
दुनिया में नेपाल अकेला ऐसा एयरपोर्ट है, जहां इस तरह की व्यवस्था लागू है. दरअसल इसकी शुरुआत हुई थी 24 दिसंबर 1999 की इस घटना के बाद जिसने दुनिया को हिला दिया था. ये वही तारीख थी जब कंधार विमान अपहरण कांड हुआ था. इंडियन एयरलाइंस की फ्लाई IC814 ने कांठमांडू से ही उड़ान भरी थी, जिसमें 190 लोग सवार थे.
इस विमान को 5 आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था. विमान को अमृतसर, लाहौर और दुबई के बाद अफगानिस्तान के कंधार में उतारा गया था. एक सप्ताह तक चले इस बंधक संकट का अंत एक सप्ताह बाद जेल में बंद तीन आतंकियों को छोड़ने के साथ हुआ था. इनमें मसूद अजहर भी शामिल था. इस घटना के बाद भारत सरकार ने इंडियन एयरलाइंस से काठमांडू के लिए अपनी सभी उड़ानें रद्द करने को कह दिया था.
5 महीने तक रद्द रही थी काठमांडू की उड़ान
सरकार के कहने पर इंडियन एयरलाइंस ने काठमांडू की उड़ानें निलंबित कर दीं. 5 महीने तक यह व्यवस्था रही. यात्रियों के लिहाज से यह फैसला मुसीबत भरा था. काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब 7 मई 2000 को नेपाल के तत्कालीन विदेश मंत्री चक्र प्रसाद बस्तोला भारत आए तो निलंबित उड़ानें फिर शुरू करने पर सहमति बनी. इंडियन एयरलाइंस ने 1 जून को काठमांडू के लिए अपनी सेवा फिर से शुरू की. हालांकि इससे पहले एक अहम बदलाव किया गया. इसके बाद ही काठमांडू एयरपोर्ट पर भारतीय विमानों में सफर करने वाले यात्रियों की दोहरी जांच की व्यवस्था लागू हुई. भारत के अलावा कोई भी ऐसी एयरलाइंस नहीं है, जिसके लिए वहां विशेष व्यवस्था लागू हो.
मुश्किल वक्त से गुजरे थे द्विपक्षीय संबंध
हाल ही में कांठमांडू पोस्ट ने इस मसले पर एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इस व्यवस्था पर सवाल उठाया है.रिपोर्ट में पूर्व अधिकारियों, पूर्व राजदूतों और सुरक्षा विशेषज्ञों के हवाले से ये पता लगाने की कोशिश की गई है कि इस व्यवस्था को शुरू करने का आधिकारिक आधार क्या था? रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि नेपाल सरकार से कई बार जानकारी मांगे जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस समझौते के बारे में नहीं बताया गया.
रिपोर्ट में भारत में तैनात रहे नेपाल के पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय का कहना है कि मेरे हिसाब से ऐसा करने की मौखिक सहमति दी गई थी. वास्तव में क्या समझौता था इसे देखना चाहिए. उनके मुताबिक भारतीय विमान हाईजैक होने के बाद भारत की ओर से एयरपोर्ट की सुरक्षा पर सवाल उठाए गए थे और सेवाएं निलंबित कर दी गई थीं. उनके मुताबिक भारत का गुस्सा समझ में आता है, लेकिन नेपाल की सुरक्षा व्यवस्था पर संदेह पैदा करना सही नहीं है. यह अस्थायी व्यवस्था थी जो स्थायी हो गई.
नेपाल में बढ़ी सुरक्षा, मगर खत्म क्यों नहीं हुई व्यवस्था?
वर्तमान में काठमांडू 30 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस की उड़ानें संचालित कर रही है. इनमें भारत की दो एयरलाइनें एयर इंडिया और इंडिगो शामिल हैं. एयरपोर्ट पर सिर्फ इन दो एयरलाइंस के यात्रियों की ही दोहरी जांच होती है.
नेपाल एयरपोर्ट प्रबंधन के मुताबिक बीते 26 साल में काठमांडू एयरपोर्ट की सुरक्षा में विस्तार किया गया था. 2000 में यहां 100 पुलिसकर्मियों की तैनाती थी जो अब बढ़कर 500 से ज्यादा हो चुकी है. 30 एक्सरे मशीनें, 20 वॉक थ्रू मेटल डिटेक्टर और 80 हैंडहेल्ड डिटेक्टर लगे हैं. 500 से ज्यादा सीसीटीवी काम कर रहे हैं. हालांकि नेपाल की विमानन सुरक्षा आज भी कमजोर मानी जा रही है.
पिछले साल नेपाल में ही प्रकाशित एक उच्च स्तरीय रिपोर्ट में कहा गया था कि एयरपोर्ट पर सुरक्षा जिम्मेदारी एजेंसियों के समन्वय की कमी से जूझ रही है. पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनिल कुमार सिन्हा की देखरेख में तैयार की रिपोर्ट में कहा गया था की हवाई अड्डे पर कई निकाय हैं, लेकिन समग्र सुरक्षा कमजोर है. अभी भी यात्रियों की बार-बार जांच और मैन्युअल तलाशी जैसी पारंपरिक स्क्रीनिंग प्रक्रिया है.