Uttarkashi Red Rice: उत्तरकाशी का लाल चावल अब सिर्फ पहाड़ के खेतों में उगने वाला पारंपरिक अनाज नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय संस्कृति की नई पहचान बन रहा है. कभी करीब 60 रुपये प्रति किलो बिकने वाला लाल चावल आज लगभग 140 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है. लाल चावल की खेती से जुड़ी सैकड़ों महिला किसान अब इसे अपनी आजीविका का मजबूत आधार बना रही हैं. लेकिन बढ़ती पहचान के बीच ग्रामीणों की मांग है कि सरकार लाल चावल का उचित मूल्य निर्धारित करे, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का पूरा लाभ मिल सके.
लाल चावल को मिला जीआई टैग
उत्तरकाशी के पुरोला विकासखंड में लाल धान की खेती पीढ़ियों से होती आ रही है. पहाड़ की मिट्टी, पारंपरिक खेती और स्थानीय जलवायु में तैयार होने वाला यह चावल अपने रंग, स्वाद और विशिष्ट पहचान के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि अब यह स्थानीय रसोई से निकलकर बड़े बाजारों तक अपनी जगह बना रहा है. लाल चावल को 8 नवंबर 2023 को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिला था. बता दें, उत्तरकाशी में लाल चावल केवल खेती नहीं, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का हिस्सा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष पुरोला, मोरी और नौगांव विकासखंडों में करीब 30,600 कुंतल लाल धान का उत्पादन हुआ था.
इसकी खेती लगभग 1,700 हेक्टेयर क्षेत्रफल में की गई और करीब 3,497 किसान इससे जुड़े रहे. इस वर्ष लाल धान की खेती का क्षेत्रफल बढ़ने की जानकारी है और अब किसान कटाई की तैयारी में जुटने लगे हैं. लाल चावल के उत्पादन और कारोबार में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. अनुमान के अनुसार, करीब 700 से 800 महिला किसान इससे जुड़े रोजगार और स्वरोजगार के माध्यम से अपनी आय बढ़ा रही हैं.
‘रेड राइस लेडी’ की प्रेरणा और FPO का संबल
नौगांव विकासखंड के कोटियाल गांव की स्वतंत्री बधानी, जिन्हें स्थानीय स्तर पर ‘रेड राइस लेडी’ के नाम से पहचान मिली है, पारंपरिक अनाजों को बढ़ावा देने में जुटी हैं. वह लाल चावल के साथ मंडुवा, झंगोरा और कौणी जैसे पहाड़ी अनाजों की खेती करती हैं और अन्य किसानों को भी इनके उत्पादन के लिए प्रेरित कर रही हैं. उनके प्रयासों से नौगांव के साथ पुरोला और मोरी के रामासेराई क्षेत्र में भी पारंपरिक अनाजों की खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है. स्थानीय स्तर पर लाल चावल की मांग बढ़ी है और यह सामान्य तौर पर करीब 140 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है.
इससे जुड़े कारोबार से सालाना 15 लाख रुपये से अधिक का व्यवसाय होने की जानकारी है. महिला किसान उत्पादक संगठनों यानी FPO के माध्यम से किसानों को संगठित करने, सामूहिक रूप से उपज एकत्र करने और बाजार तक पहुंच बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है. इससे किसानों को बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और अपनी उपज का बेहतर मूल्य हासिल करने के अवसर मिल सकते हैं.
प्राकृतिक आपदाएं और फसल बीमा का सुरक्षा कवच
खेती में मेहनत के साथ जोखिम भी जुड़ा है. पहाड़ों में मौसम का अचानक बदलना, अत्यधिक बारिश, प्राकृतिक आपदाएं और फसल को होने वाला नुकसान किसानों की आमदनी पर सीधा असर डालता है. ऐसे में फसल बीमा किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी UNDP वर्ष 2018 से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के साथ तकनीक आधारित फसल बीमा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है. इसका उद्देश्य तकनीक के इस्तेमाल से फसल नुकसान का बेहतर आकलन, बीमा व्यवस्था में सुधार और किसानों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की प्रक्रिया को मजबूत करना है.
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक 92.47 करोड़ से अधिक किसान आवेदन दर्ज हुए हैं और पिछले दस वर्षों में 12.72 करोड़ किसानों को 2.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बीमा दावों का भुगतान किया गया है. उत्तराखंड में इस योजना के तहत 23.44 लाख किसान आवेदन दर्ज होने और 12.19 लाख किसान आवेदनों पर 1,476.92 करोड़ रुपये के बीमा दावों का भुगतान किए जाने के आंकड़े उपलब्ध हैं. हालांकि, लाल चावल उगाने वाले प्रत्येक किसान को योजना का लाभ स्वतः मिलना तय नहीं है. इसके लिए संबंधित फसल, क्षेत्र और बीमा की अधिसूचित शर्तों के अनुसार पात्रता जरूरी है.
दामों में उछाल के बीच मूल्य निर्धारण की मांग
ग्रामीणों के मुताबिक, करीब चार साल पहले लाल चावल लगभग 60 रुपये प्रति किलो बिकता था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से इसके दाम में तेजी आई और आज इसकी कीमत करीब 140 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. यानी बाजार में इसकी कीमत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. मंडुवा, झंगोरा और अन्य पारंपरिक अनाजों की मांग और बेहतर दाम मिलने से भी किसानों को उम्मीद जगी है. लेकिन किसानों का कहना है कि केवल बाजार में मांग बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है.
उत्पादन लागत, मेहनत और परिवहन खर्च को देखते हुए लाल चावल का उचित मूल्य सुनिश्चित होना भी जरूरी है. ग्रामीण सरकार से मांग कर रहे हैं कि लाल चावल का मूल्य निर्धारित करने की व्यवस्था बनाई जाए, ताकि किसानों को हर साल बाजार में अनिश्चित कीमतों का सामना न करना पड़े. लाल चावल की गुणवत्ता बनाए रखने, इसकी शुद्धता की पहचान, बेहतर पैकेजिंग, प्रसंस्करण और संगठित विपणन व्यवस्था विकसित करने से भी किसानों को लाभ मिल सकता है. महिला FPO और स्थानीय उत्पादक समूह इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
लाल चावल में पाए जाते हैं फाइबर और खनिज तत्व
उत्तरकाशी के ग्रामीण इलाकों में लाल धान की खेती का महत्व केवल आमदनी तक सीमित नहीं है. धान की कटाई और मड़ाई कई गांवों में सामुदायिक परंपरा और उत्सव का रूप ले लेती है. परिवार और रिश्तेदार एकत्र होते हैं, पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं और मिल-जुलकर मेहनत का उत्सव मनाया जाता है. खेतों में तैयार हुई फसल घर तक पहुंचने का यह सफर पहाड़ के सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा है. लाल चावल की बढ़ती बाजार मांग ग्रामीणों के लिए जहां आर्थिक अवसर लेकर आई है, वहीं इसकी पारंपरिक खेती को बचाए रखना सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने जैसा भी है. लाल चावल की एक और विशेषता इसका पोषण मूल्य है. इसकी कई किस्मों में लाल रंग देने वाले प्राकृतिक यौगिक, फाइबर और खनिज तत्व पाए जाते हैं.