Kotgadi Mandir: कुमाऊं की पहाड़ियों में बसा मां कोटगाड़ी धाम, जहां 5 पुश्त पुराने अन्याय की भी होती है सुनवाई


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उत्तराखंड का मां कोटगाड़ी धाम, जहां 5 पुश्त पुराने अन्याय की भी होती है सुनवाई

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Maa Kotgadi Devi Temple: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में मां कोटगाड़ी देवी का एक ऐसा मंदिर है, जहां लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं. मान्यता है कि जब कहीं न्याय नहीं मिलता, तो मां के दरबार में अर्जी लगाने से इंसाफ की उम्मीद पूरी होती है. यही वजह है कि इस मंदिर को न्याय की देवी के धाम के रूप में जाना जाता है. यहां तक कि लोग अपने मुकदमों से जुड़े फैसले भी स्टांप पेपर पर लिखकर देवी के चरणों में अर्पित करते हैं. इतिहास की कई किताबों में भी इस मंदिर और इससे जुड़ी मान्यताओं का जिक्र मिलता है. आखिर क्या है मां कोटगाड़ी देवी के मंदिर की खासियत और क्यों यहां न्याय की आस लेकर पहुंचते हैं लोग, जानिए.

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उत्तराखंड का मां कोटगाड़ी धाम, जहां 5 पुश्त पुराने अन्याय की भी होती है सुनवाईZoom

कुमाऊं की पहाड़ियों में बसा मां कोटगाड़ी धाम

Maa Kotgadi Devi Temple: देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो कई मंदिर है. जिनकी मान्यता जग जाहिर है. लेकिन आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जहां लोग अपनी परेशानियां लेकर पहुंचते हैं. इसका नाम है कोटगाड़ी देवी मंदिर, जो पिथौरागढ़ जिले में स्थित है. यहां भक्त अपनी परेशानियां लेकर पहुंचते हैं. स्थानीय मान्यता है कि जब किसी को कहीं से न्याय नहीं मिलता, तो वह मां के दरबार में अपनी फरियाद लगाता है. यहां तक कि कुछ लोग अपनी शिकायत और न्यायालय के फैसले से जुड़ी बातें भी लिखकर मंदिर में जमा करते हैं. पांखू क्षेत्र में स्थित इस मंदिर को मां कोकिला देवी के नाम से भी जाना जाता है. अपनी इसी मान्यता के कारण यह मंदिर लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है.

मां कोटगाड़ी देवी को न्याय की देवी के रूप में पूजा जाता है. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं का जिक्र इतिहास से जुड़ी कई किताबों में भी मिलता है. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. डी.डी. शर्मा के हवाले से इतिहासकार प्रो. अजय रावत ने अपनी पुस्तक ‘उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास’ में इस मंदिर और यहां की परंपराओं के बारे में लिखा है. मान्यता है कि यहां पांच पीढ़ी पहले हुए अन्याय की फरियाद भी लगाई जाती है.

न्याय की देवी रूप में पूजी जाती हैं मां कोटगाड़ी
स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, मां कोटगाड़ी देवी के दरबार में अन्याय और अत्याचार से परेशान लोग न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. इतिहासकार डॉ. डी.डी. शर्मा के हवाले से लिखे गए विवरण के मुताबिक, यहां के लोगों की आस्था मां कोटगाड़ी के न्याय को लेकर वैसी ही है, जैसी चितई और घोड़ाखाल के गोलू देवता के प्रति देखने को मिलती है. जहां कुछ लोग न्यायालय के फैसलों को स्टांप पेपर पर लिखकर मंदिर में जमा करते हैं और देवी से न्याय की गुहार लगाते हैं. लोगों का विश्वास है कि मां के दरबार में उनकी फरियाद सुनी जाती है. इसी मान्यता के चलते दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

पिथौरागढ़ मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर है मंदिर
मां कोटगाड़ी देवी का मंदिर पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर है. थल से पांखू गांव तक पहुंचने के बाद मंदिर के लिए लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. यह मंदिर कुमाऊं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अहम हिस्सा है. यहां की मान्यताएं पीढ़ियों से लोगों की आस्था से जुड़ी हुई हैं. नवरात्र के दौरान भी श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

स्वप्न में देवी की इच्छा के बाद हुई मंदिर की स्थापना
इतिहासकारों के इन लेख में मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक मान्यता का भी जिक्र मिलता है. इसके अनुसार, कोटगाड़ा जाति के एक व्यक्ति को सपने में देवी ने अपनी इच्छा बताई थी. इसी के बाद मंदिर की स्थापना की गई. यह मान्यता भी मंदिर से जुड़ी लोककथाओं का हिस्सा है.

नवरात्र की अष्टमी पर होता है विशेष आयोजन
मंदिर में चैत्र और आश्विन महीने की नवरात्र के दौरान अष्टमी को विशेष लोकोत्सव आयोजित किया जाता है. इसके अलावा भाद्रपद मास में ऋषि पंचमी, कार्तिक महीने की पंचमी, कार्तिक पूर्णिमा और बैसाखी जैसे अवसरों पर भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं. कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. इन धार्मिक अवसरों पर मंदिर में पूजा-पाठ और परंपराओं का विशेष महत्व रहता है. मां कोटगाड़ी देवी का यह धाम आज भी लोगों के लिए आस्था, लोकविश्वास और न्याय की उम्मीद का प्रतीक बना हुआ है.



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